इसलिए बौड़म जी इसलिए – अशोक चक्रधर

पुस्तक की भूमिका

देते हुए एन.डी.टी.वी. का हवाला,
एक दिन घर पर आई
रेवती नाम की बाला।
प्यारी सी उत्साही कन्या
शहंशाही काठी में स्वनामधन्या।
यानि करुणा-मानवता की
निर्मल नदी,
विचारों में अग्रणी इक्कीसवीं सदी।

नए प्रस्ताव की
झुलाते हुए झोली,
रेवती बोली-
हमारे ‘गुड मार्निंग इंडिया’ में
एक सैक्शन है ‘फ़नीज़’,
आप उसमें जोक्स जैसी
कुछ कविताएं सुनाइए प्लीज़।

कोई सद्भाव से आए घर की दहलीज़
तो मना कैसे कर सकता था
ये नाचीज़।
झट से राज़ी हो गया,
फ़ौरन ‘हां जी’ हो गया।
इस ‘हां जी’ के पीछे थी एक बात और,
प्रणय राय को मानता हूं
भारत में छोटे परदे पर
सूचना-संचार का सिरमौर।
विनम्र, तेजस्वी, शालीन,
संतुलित, त्वरित सधी हुई तत्कालीन
धीर-गम्भीर भाषा,
आंखों में भविष्यत् के लिए
घनघोर आशा।
न बड़बोलापन है न लफ़्फ़ाजी,
इसलिए भी हो गई
मेरी शीघ्र ‘हां जी’।

फिर स्मिता शिबानी के साथ
रखी गई मुलाकात,
हास्य को लेकर हुई
संजीदा बहस-बात।
थोड़ी-थोड़ी हिन्दी, ज़्यादा अंग्रेज़ी,
एक-एक बात मैंने मन में सहेजी।
चमत्कृत सा हतप्रभ सा सुनता रहा,
मेरी बारी आई तो मैंने कहा-
जहां तक मैंने आपकी ज़रूरतें समझी हैं,
उसके अनुरूप मेरे पास
एक चरित्र बौड़म जी हैं।
लक्ष्मण के कॉमन मैन जैसे,
और सुनें तो हसें
सोचें तो रोएं !

शिबानी बोली-
चलिए शूट करते हैं
वक्त क्यों खोएं ?

तो लगभग एक साल से
बौड़म जी अपने विभिन्न रूपों में
छोटे परदे पर आ रहे हैं,
मुझसे एक सम्भ्रांत मज़दूर चेतना से
कविताएं लिखवा रहे हैं।

ये बात मैंने आपको इसलिए बताई

कि इन कविताओं में
एन.डी.टी.वी. की डिमाण्ड पर
माल किया गया है सप्लाई।
इस सकंलन में
ऐसी बहुत सी कविताएं नहीं हैं
जो उन्होंने परदे पर दिखाईं,
लेकिन ऐसी कई हैं
जो अब तक नहीं आईं।
कुछ बढ़ाईं, कुछ काटीं,
कुछ छीली, कुछ छांटीं।
कुछ में परिहास है, कुछ में उपहास है
कुछ में शुद्ध अहसास है,
कहीं सुने-सुनाए का विकास है
कहीं प्राचीन को नया लिबास है
पर एक बात ख़ास है-
कि पचासवीं वर्षगांठ है ये आज़ादी की
इसलिए कविताओं की संख्या भी पचास है।
कितने प्यारे हैं हमारे सुधीर भाई
जिन्होंने बौड़म जी की एक-एक तस्वीर
बड़ी मौहब्बत से बनाई,
और धन्य है नरेन्द्र जी का अपनापा
कि पुस्तक को त्वरित गति से छापा
अब आपके पास है पुस्तक
पुस्तक में कविताएं,
चलें पन्ने पलटें और ग़ौर फरमाएं।
प्रतिक्रिया भी दें इनकों पढ़ने के बाद,
धन्यवाद !

पांच सीढ़ियां

बौड़म जी स्पीच दे रहे थे मोहल्ले में,
लोग सुन ही नहीं पा रहे थे हो-हल्ले में।
सुनिए सुनिए ध्यान दीजिए,
अपने कान मुझे दान दीजिए।
चलिए तालियां बजाइए,
बजाइए, बजाइए
समारोह को सजाइए !
नहीं बजा रहे कोई बात नहीं,
जो कुछ है वो अकस्मात नहीं।
सब कुछ समझ में आता है,
फिर बौड़म आपको जो बताता है
उस पर ग़ौर फरमाइए फिलहाल-
हमारी आज़ादी को पचास साल
यानि पांच दशक बीते हैं श्रीमान !
उन पांच दशकों की हैं
पांच सीढ़ियां, पांच सोपान।
इस दौरान
हम समय के साथ-साथ आगे बढ़े हैं,
अब देखना ये है कि
हम इन पांच सीढ़ियों पर
उतरे हैं या चढ़े हैं।
पहला दशक, पहली सीढ़ी-सदाचरण
यानि काम सच्चा करने की इच्छा,
दूसरा दशक, दूसरी सीढ़ी-आचरण
यानि उसके लिए प्रयास अच्छा।
तीसरा दशक, तीसरी सीढ़ी-चरण
यानि थोड़ी गति, थोड़ा चरण छूना,
चौथा दशक, चौथी सीढ़ी-रण
यानि आपस की लड़ाई
और जनता को चूना।
पांचवां दशक, पांचवीं सीढ़ी बची-न !
यानि कुछ नहीं
यानि शून्य, यानि ज़ीरो,
लेकिन हम फिर भी हीरो।

बताइए अब क्या करना है

कि बौड़म जी ने एक ही शब्द के जरिए
पिछले पांच दशकों की
झनझनाती हुई झांकी दिखाई।
पहले सदाचरण
फिर आचरण
फिर चरण
फिर रण
और फिर न !
यही तो है पांच दशकों का सफ़र न !

मैंने पूछा-
बौड़म जी, बताइए अब क्या करना है ?

वे बोले-
करना क्या है
इस बचे हुए शून्य में
रंग भरना है।
और ये काम
हम तुम नहीं करेंगे,
इस शून्य में रंग तो
अगले दशक के
बच्चे ही भरेंगे।

पचास साल का इंसान

पचास साल का इंसान
न बूढ़ा होता है न जवान
न वो बच्चा होता है
न बच्चों की तरह
कच्चा होता है।
वो पके फलों से लदा
एक पेड़ होता है,
आधी उम्र पार करने के कारण
अधेड़ होता है।

पचास साल का इंसान
चुका हुआ नहीं होता
जो उसे करना है
कर चुका होता है,
जवानों से मीठी ईर्ष्या करता है
सद्भावना में फुका होता है

शामिल नहीं होता है
बूढ़ों की जमात में,
बिदक जाता है
ज़रा सी बात में।
बच्चे उससे कतराते हैं
जवान सुरक्षित दूरी अपनाते हैं,
बूढ़े उसके मामलों में
अपना पांव नहीं फंसाते हैं।
क्योंकि वो वैल कैलकुलेटैड
कल्टीवेटैड
पूर्वनियोजित और बार बार संशोधित
पंगे लेता है,
अपने पकाए फल,
अपनी माया, अपनी छाया
आसानी से नहीं देता है।
वो बरगद नहीं होता
बल्कि अगस्त महीने का
मस्त लेकिन पस्त
आम का पेड़ होता है,
जी हां, पचास का इंसान अधेड़ होता है।

यही वह उमर है जब
जब कभी कभी अंदर
बहुत अंदर कुछ क्रैक होता है,
हिम्मत न रखे तो
पहला हार्ट-अटैक होता है।
झटके झेल जाता है,
ज़िन्दगी को खेल जाता है।
क्योंकि उसके सामने
उसी का बनाया हुआ
घौंसला होता है,
इसीलिए जीने का हौसला होता है।

बौड़म जी बोले-
पचास का इंसान
चुलबुले बुलबुलों का एक बबाल है,
पचास की उमर
उमर नहीं है
ट्रांज़ीशन पीरियड है
संक्रमण काल है।

तेरा इस्तेकबाल है

कि हमारी आज़ादी भी
पचास की पूरी होने आई।
उसका भी लगभग यही हाल है
अपने ऊपर मुग्ध है निहाल है
ऊपरी वैभव का इंद्रजाल है
पुरानी ख़ुशबुओं का रुमाल है
समय के ग्राउंड की फुटबाल है
एक तरफ चिकनी तो
दूसरी तरफ रेगमाल है
संक्रमण के कण कण में वाचाल है
फिर भी खुशहाल है
क्योंकि दुनिया के आगे
विशालतम जनतंत्र की इकलौती मिसाल है।
ओ आज़ादी।
उमरिया की डगरिया के
पचासवें स्वर्ण मील पत्थर पर
तेरा इस्तेकबाल है !

आम की पेटी

गांव में ब्याही गई थी
बौड़म जी की बेटी,
उसने भिजवाई एक आम की पेटी।
महक पूरे मुहल्ले को आ गई,
कइयों का तो दिल ही जला गई।

कुछ पड़ौसियों ने द्वार खटखटाया
एक स्वर आया-
बौड़म जी, हमें मालूम है कि आप
आम ख़रीद कर नहीं लाते हैं,
और ये भी पता है कि
बेटी के यहां का कुछ नहीं खाते हैं।
हम चाहते हैं कि
आपका संकट मिटवा दें,
इसलिए सलाह दे रहे हैं कि
आप इन्हें पड़ौस में बंटवा दें।
हम लोग ये आम खाएंगे,
और आपकी बेटी के गुन गाएंगे।

श्रीमती बौड़म बोलीं-
वाह जी वाह !
अपने पास ही रखिए अपनी सलाह !
इन आमों को हम
बांट देंगे कैसे ?
बेटी को भेज देंगे इनके पैसे।
क्या बात कर दी बच्चों सी !

जवाब में बोला दूसरा पड़ौसी-
भाभी जी गुस्सा मत कीजिए,
देखिए ध्यान दीजिए !
ये गाँव के उम्दा आम हैं
लंगड़ा और दशहरी,
और हम लोग ठहरे शहरी।
इन आमों के तो
बाज़ार में दर्शन ही नहीं हुए हैं,
और अगर हो भी जाएं
तो भावों ने आसमान छुए हैं।
अब आपको कोई कैसे समझाए
कि अगर आपने ये आम खाए
तो मार्केट रेट लगाने पर
ये पेटी खा जाएगी पूरी तनख़ा
ऊपर से जंजाल मन का
कि बेटी को अगर भेजे कम पैसे,
तो स्वर्ग में स्थान मिलेगा कैसे ?

श्रीमती बौड़म फिर से भड़कीं
बिजली की तरह कड़कीं-
ठीक है, हमें नर्क मिलेगा मरने के बाद,
लेकिन आप चाहें
तो यहीं चखा दूं उसका स्वाद ?
पड़ौसी ये रूप देखकर डर गए,
एक एक करके अपने घर गए।

ये बात मैंने आपको इसलिए बताई,

कि बेटी की आम की पेटी
बौड़म दम्पति के लिए बन गई दुखदाई।
एक तो आमों की महक जानलेवा
फिर सुबह से किया भी नहीं था कलेवा।
हाय री बदनसीबी,
गुमसुम लाचार मियां-बीबी !
बार-बार पेटी को निहारते,
आखिर कब तलक मन को मारते !
अचानक बिना कुछ भी बोले,
उन्होंने पेटी के ढक्कन खोले।
जमकर आम खाए और गुठलियां भी चूंसीं,
एक दूसरे को समझाया-
ये सब बातें हैं दकियानूसी !
बेटी हमारी है
और ये पेटी भी हमारी है।
खुद खाएंगे
जिसको मन चाहेगा खिलाएंगे
पड़ौसियों को जलाएंगे,
और बेटी को सम्पत्ति में हिस्सा देंगे।
आमों के पैसे नहीं भिजवाएंगे।
ये आम ख़ास हैं नहीं हैं आम,
बेटी का प्यार हैं ये
और प्यार का कैसा दाम ?

बौड़म जी बस में

बस में थी भीड़
और धक्के ही धक्के,
यात्री थे अनुभवी,
और पक्के ।

पर अपने बौड़म जी तो
अंग्रेज़ी में
सफ़र कर रहे थे,
धक्कों में विचर रहे थे ।
भीड़ कभी आगे ठेले,
कभी पीछे धकेले ।
इस रेलमपेल
और ठेलमठेल में,
आगे आ गए
धकापेल में ।

और जैसे ही स्टाप पर
उतरने लगे
कण्डक्टर बोला-
ओ मेरे सगे !
टिकिट तो ले जा !

बौड़म जी बोले-
चाट मत भेजा !
मैं बिना टिकिट के
भला हूँ,
सारे रास्ते तो
पैदल ही चला हूँ ।

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