गोपाल सिंह नेपाली

गोपाल सिंह नेपाली की कविताएं

राग और आग का कवि : गोपाल सिंह नेपाली: एक परिचय

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजे होंगे गान
निकलकर आँखों से चुपाचाप बही होगी कविता अनजान।

कविवर जयशंकर प्रसाद द्वारा कही गई ये उक्तियाँ आदि कवि वाल्मीकि के लिए कही गई वे पंक्तियाँ हैं, जो बिहार को साहित्य की आदि-भूमि होने का गौरव प्रदान करती हैं। आदि कवि वाल्मीकि के नाम पर बसा वाल्मीकि नगर और उसी की छत्रछाया में चंपारण (चम्पारण्य-विष्णुपुराण) के बेतिया में 11 अगस्त, 1911 को एक ऐसे उदीयमान, प्रतिभावान और यशस्वी कवि गीतकार का जन्म हुआ, जिसने अपने अपनी कविताओं और गीतों से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। बिहार के जिन हिंदी कवियों ने अपनी अप्रमेय साधना से हिंदी गीतों एवं कविता को जो सार्थक संपन्नता दी है, उनमें रामधारी सिंह ‘दिनकर’, आचार्य जानी वल्लभ शास्त्री और गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का नाम विशिष्ट रूप से लिया जाता है।

कविवर दिनकर की कविताओं में जहाँ राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ मुखर हैं, वहाँ शास्त्री जी के गीतों में शास्त्रीय संगीतात्मकता है। वहीं नेपाली जी के गीतों में सरसता ओर सहजता में साथ लोक-संस्कृति से परिपूर्ण संगीत है। कविवर नेपाली को उद्धृत करते हुए जानकी वल्लभ शास्त्री ने कहा भी है- ‘मिल्टन, कीट्स और शेली जैसे त्रय कवियों की प्रतिभा नेपाली में त्रिवेणी संगम की तरह उपस्थित है।’

कविवर विमल राजस्थानी ने उन्हें ‘राग और आग का कवि’ कहा है। अनेक मूर्धन्य साहित्यकारों ने उन्हें ‘गीतों का राजकुमार’ तक कहा है। नेपाली की रचनाओं में प्रकृति के कण-कण से तादात्मय स्थापित करने की प्रगाढ़ प्रवृति है, परिणामतः सुधिजन उन्हें ‘प्रकृति का कवि’ कह उठते हैं। उनकी रचनाओं में मौलसिरी, पंछी, हरीघास, पीपल, किरण, सरिता, बेर सबका अत्यंत सजीव चित्रण है। वारि बूंदों का रेखाँकन करते हुए कवि ने बड़ा ही उत्कृष्ट शब्द संयोजन किया है। यथा-

ये बूँदें हैं आकाश कुसुम, ये बूँदें पावलस के कुंकुम
मैंने देखा अपनी आँखों, इन बूँदों के सावन हो तुम।

कवि जब बसंत की शोभा को निरखता है तो गा उठता है-

मैं बसंत हूँ, कुंज-कुंज में, मेरा ही पीतांबर उड़ता
निर्झर की उद्दाम लहर में, मेरा यौवन फूट उमड़ता

नेपाली जी की रचनाओं में प्रकृति की सुषमा श्रृंगार से परिपूर्ण है। जब कवि कहता है-

‘नव वसंत वन में आता है, झुरमुट से पंछी गाता है
कोकिल का पंचम-स्वर वन के, मन की कली खिल जाता है।’

गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का जन्म यद्यपि बिहार के एक छोटे से कस्बे बितिया में हुआ लेकिन उन्होंने बचपन के दिन दिहरादून और मंसूरी के सुंदर प्राकृतिक परिवेश में गुज़ारे थे। इनके साथ चंपारण्य के निर्झर, घाटी आदि के मनभावन दृश्य भी उनके मानस पटल पर थे, इसलिए कवि के मन पर प्राकृतिक सौंदर्य के जादू का प्रभाव बचपन से ही अनायास पड़ता रहा। फलस्वरूप कवि एवं प्रकृति के बीच एक अटूट रिश्ता बनता गया। यही कारण है कि उनके काव्य में प्रकृति के प्रति दिव्य उत्साह मिलता है यथा-

सुबह-सुबह का सूर्य सलोना, चंदा आधी रात का
प्यारा-प्यारा नील गनन का, दीपक झंझावात का ।

स्वयं महाकवि पंत ने नेपाली जी की कविताओं का अवलोकन कर कहा था- ‘आपकी सरस्वती, स्नेह, सहदयता और सौंदर्य की सजीव प्रतिमा है।’ सुप्रसिद्ध कवि निराला जी ने नेपाली जी की रचनाओं को पढ़कर उन्हें ‘काव्याकाश का दैदीप्यमान’ सितारा कहा।

स्व. गोपाल सिंह नेपाली की रचनाओं में न केवल प्रकृति बल्कि जीवन के विविध पक्ष विभिन्न रंगों में हृदय को आकर्षित कर लेते हैं जब कवि गुनगुनाता है-

‘मगनयनी, पीकबैंनी तेरे, सामने बँसुरिया झूठी है
रग-रग में इतने रंग भरे घनश्याम बदरिया झूठी है’

तो लगता है हदय शब्दों के रथ पर सवार सौंदर्य के आकाश में विचरण कर रहा हो। किंतु कविवर नेपाली का काव्याकाश अत्यंत विस्तृत एवं विशाल है। उसमें न केवल राग है बल्कि आग भी है। वह अगर अबीर रस का चितेरा है तो वीर रस भी उसके काव्य की शक्ति है। भारत की स्वतंत्रता का समय और नेपाली की कविताओं का शंखनाद, मुर्दे में भी प्राण फूँकने की क्षमता दर्शाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु कवि फाख्ता है-

जंजीर टूटती न कभी अश्रुधार से,
दुख दर्द दूर भागने नहीं दुलार से

कवि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए देशवासियों का आह्वान करते लिखते हैं-

‘बहन तू बन जा क्रांतिकराली, मैं भाई विकराल बनूँ
तू बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ ।

उपरोक्त पंक्तियाँ नेपाली जी की काव्य शक्ति का एहसास कराने वाली वे पंक्तियाँ हैं, जो उन्हें राष्ट्रकवि कहने के लिए बाध्य कर देती हैं। कवि नेपाली की दष्टि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के नवनिर्माण की ओर जाती है तब वह बोल उठता है-

तुम कल्पना करो नवीन कल्पना करो,
तुम कामना करो, किशोर कामना करो।

नेपाली ने हिन्दी गीतों को न केवल नयी अर्थवत्ता दी बल्कि आम आदमी की अनुभूतियों से भी जोड़ा । जनता के कवि के रूप में नेपाली ने अपनी अलग पहचान बनाई। एक इतिहास बनाने वाले कवि की पहचान –

‘हम धरती क्या आकाश बदलने वाले हैं,
हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं।

स्वतंत्रता के बाद देश में अनुशासनहीनता का एक लंबा दौर चला बल्कि अनुशासनहीनता ने क्या राजनीति, क्या शिक्षा या क्या शासन प्रत्येक जगह अपनी जड़ें जमा ली तब कविवर नेपाली ने लिखा-

ओ राही दिल्ली जाना तो कहना अपनी सरकार से
चर्खा चलता है हाथों से शासन चलता है तलवार से।

इस भाँति कविवर गोपाल सिंह नेपाली बहुमुखी प्रतिभा के महान गीतकार हैं । उनकी रचनाओं का एक विशाल संसार है। कुछ मान्यताओं के अनुसार कविवर नेपाली केवल राग या प्रकति का गीतकार नहीं बल्कि आग और झंझा का भी कवि है। स्वाभिमान के साथ जीने वाले कवि ने समय से लड़ना सीखा था, हाथ पसारना नहीं। तभी तो कवि कह उठता है-

तुम सा लहरों में बह लेता, तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचना चलता तो मैं भी महलों में रह लेता
तुम राजनीति में लगे रहे, यहाँ लिखने में तल्लीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम।

अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध अपनी स्वाधीन कलम से संघर्ष करता कवि 1962 के भारत चीन युद्ध के समय अपनी रचनाओं से जब हुंकार भरा तो चीन के रेडियो ने उन्हें बहुत बुरा-भला कहा किंतु वनमैन आर्मी की उपाधि से विभूषित कवि ने अपनी रचनाओं से संपूर्ण राष्ट्र के जनमानस को चीन के विरुद्ध उद्वेलित करते हुए लिखा-

शंकल की पुरी, चीन ने सेना को उतारा
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

इस राष्ट्रीय काव्य-धारा की मूल प्रेरणा अपनी मातृभूमि के प्रति सहज के विरुद्ध जागरण का कार्य किया तो स्वाधीनता के पश्चात् देश की एकता अखंडता का शौर्य गान करने लगा। नेपाली जी जैसा कवि गीतकार मरता कहाँ है? वह तो अपने गीतों में अमर है। मत्यृंजय है वह अपनी रचनाओं से। ज़रूरत है नई पीढ़ी के साहित्यकार उन्हें आत्मसात करें और उनके गीतों के दर्पण में झाँककर कवि धर्म का निर्वाह करें।

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गोपाल सिंह नेपाली&rdquo पर एक विचार;

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