जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद की कवितायें

एक परिचय

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के प्रसिध्द और प्रतिष्ठित ‘सुंघनी साहू’ परिवार में हुआ। बाल्यावस्था में ही माता-पिता स्वर्गवासी हुए। मिडिल पास करके ‘प्रसाद ने 12 वर्ष की अवस्था में स्कूल छोड दिया और घर पर ही संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फारसी आदि की शिक्षा ली। प्रसाद ने खडी बोली को शुध्द और सशक्त साहित्यिक भाषा का स्वरूप दिया। इनकी शैली में अनुभूति की गहनता, लाक्षणिकता, गीतिमयता, सौंदर्य चेतना आदि छायावादी काव्य के समस्त लक्षण उपस्थित हैं। इन्हें ‘हिंदी का रवींद्र कहते हैं। इनकी मुख्य कृतियां ‘चंद्रगुप्त, ‘स्कंदगुप्त आदि लगभग 12 नाटक, ‘आकाशदीप, ‘आंधी (कहानी संग्रह), ‘कंकाल, ‘तितली (उपन्यास) तथा ‘आंसू, ‘झरना, ‘लहर (काव्य संग्रह), ‘कामायनी (महाकाव्य) हैं। ‘कामायनी इनकी श्रेष्ठ कृति और हिंदी का गौरव ग्रंथ है। दार्शनिक पृष्ठभूमि पर लिखा यह प्रबंध-काव्य छायावादी कविता की सर्वोच्च उपलब्धि है। ‘कामायनी पर इन्हें मरणोपरांत ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला था।

छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक। एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। ४८ वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएं।

काव्य साहित्य में कामायनी बेजोड कृति है । विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन करने वाले इस महामानव ने ४८ वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएं लिख कर हिंदी साहित्य जगत को सवांर सजाया । १४ जनवरी १९३७ को वाराणसी में निधन, हिंदी साहित्याकास में एक अपूर्णीय क्षति।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में कहानी को आधुनिक जगत की विधा बनाने में प्रसाद का योगदान अन्यतम है। वाह्य घटना को आन्तरिक हलचल के प्रतिफल के रूप में देखने की उनकी दृष्टि, जो उनके निबंधों में शैवाद्वैत के सैद्धांतिक आधार के रूप में है, ने कहानी में आन्तरिकता का आयाम प्रदान किया है। जैनेन्द्र ओर अज्ञेय की कहानियों के मूल में प्रसाद के इस आयाम को देखा जा सकता है।

‘काव्य और कला’, ‘रहस्यवाद’ और ‘यथार्थवाद और छायावाद’ उनके सबसे महत्त्वपूर्ण निबंध जिनमें विवेक और आनन्दवादी धारा के सांस्कृतिक विकास क्रम के साथ-साथ उन्होंने अपने समय के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का तर्क संगत और संतोष-जनक उत्तर दिया है। संस्कृति, पुरातत्व वर्तमान यथार्थ उनके इन निबंधों में जीवित हैं। अपने समय के आलोचकों की स्थापना – विशेषकर रामचन्द्र शुक्ल की स्थापना – का वे अपने निबंधों में न केवल उत्तर देते हैं बल्कि सपुष्ट प्रमाणों के साथ उत्तर देते हैं।

रचना – कर्म :

काव्य :- कानन कुसुम्, महाराना का महत्व्, झरना, आंसू, कामायनी, प्रेम पथिक कहानी – संग्रह :- छाया,प्रतिध्वनि, आकाशदीप,आंधी नाटक :- स्कंदगुप्त,चंद्रगुप्त,ध्रुवस्वामिनी,जन्मेजय का नाग यज्ञ , राज्यश्री,कामना उपन्यास :– कंकाल,तितली, इरावती

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