चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियाँ

एक परिचय

चंद्रधर शर्मा गुलेरी

चंद्रधर शर्मा गुलेरी

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ऐसे अकेले कथा लेखक थे जिन्होंने मात्र तीन कहानियां लिखकर कथा साहित्य को नई दिशा और आयाम प्रदान किये । गुलेरी जी की ‘उसने कहा था’ कहानी आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने समय में । अगर गुलेरी जी का नाम हटाकर इसे आज भी किसी पत्र-पत्रिका में छाप दिया जाए तो आज की परिवर्तित कहानी की टेकनीक में सहज फिट हो जाएगी । यही इस कहानी की अमरता का एक खास गुण है ।

‘सुखमय जीवन’ व ‘बुद्धू का काँटा’ और ‘उसने कहा था’ के अतिरिक्त नए शोधकार्यों के प्रकाश में आने के फलस्वरूप वे एक उत्कृष्ट कोटि के निबंध लेखक, प्रखर समा लोचक, उद्भट भाषाशास्त्री, निर्भीक पत्रकार एवं सफल कवि सिद्ध होते हैं । यह स्वयं में चौंकाने वाला विषय है कि आजकल कई विद्वान गुलेरी जी के कतिपय निबंधों को कहानियों का नाम देकर उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में छापकर गुलेरी जी को नहीं स्वयं स्थापित होने का दंभ भर रहे हैं जो अच्छा नहीं है ।

अपने ऐसे कथात्मक पुट के लिए निबंधों को गुलेरी जी ने कभी कहीं भी कहानी नहीं कहा है । उन्होंने अपने समय में उन्हें निबंध विधा में रखकर छापा है, टिप्पणियों के रूप में लिखा है । यही नहीं गुलेरी जी की कहानी ‘बुद्धू का काँटा’ को पनघट नाम देकर व्यर्थ उछाला गया । यहीं इस प्रक्रिया व नाटक का अंत नहीं हुआ और ‘उसने कहा था’ कहानी के रफ ड्राफ्ट कुछ अंश को ‘हीरे का हीरा’ को नई कहानी तथा ‘धर्मपरायण रीछ’ को कहानी की संज्ञा देकर इधर-उधर छपवा डाला गया ।

गुलेरी जी के पूर्वज मूलतः गुलेर जिला कांगड़ा से थे । इनके पिता पंडित शिवराम आजीविका से बंधे जयपुर चले गए । शिवराम शास्त्री जी के यहाँ गुलेरी जी का जन्म 7 जुलाई, 1883 ई. को हुआ था । अपनी माता श्रीमती लक्ष्मी के प्रति गुलेरी जी सदैव श्रद्धावनत रहे । गुलेरी जी का संस्कृत, पाली, प्राकृत, हिंदी, बांग्ला, अंगरेज़ी, लैटिन और फ्रैंच आदि भाषाओं पर अच्छा खासा तथा एक समान अधिकार था । जब गुलेरी जी दस वर्ष के ही थे कि इन्होंने एक बार संस्कृत में भाषण देकर भारत धर्म महामंडल के विद्वानों को आश्चर्य चकित कर दिया था । पंडित कीर्तिधर शर्मा गुलेरी का यहाँ तक कहना था कि वे पाँच वर्ष में अंगरेज़ी की टैलीग्राम अच्छी तरह पढ़ लेते थे । इन्होंने सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की । बी.ए. की परीक्षा में सर्वप्रथम रहे । सन् 1904 ई. में गुलेरी जी मेयो कॉलेज अजमेर में अध्यापकी करने लगे । अध्यापक के रूप में उनका बड़ा मान-सम्मान था । अपने शिष्यों में वे लोकप्रिय तो थे ही इसके साथ अनुशासन और नियमों का वे सख्ती से अनुपालन करते थे । उनकी आसाधारण योग्यता से प्रभावित होकर पंडित मदनमोहन मालवीय ने उन्हें बनारस बुला भेजा और हिंदु विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद दिलाया ।

निबंधकार के रूप में भी चंद्रधर जी बडे प्रसिद्ध रहे हैं । इन्होंने सौ से अधिक निबंध लिखे हैं । सन् 1903 ई. में जयपुर से जैन वैद्य के माध्यम से समालोचक पत्र प्रकाशित होना शुरु हुआ था जिसके वे संपादक रहे । इन्होंने पूरे मनोयोग से समालोचक में अपने निबंध और टिप्पणियाँ देकर जीवंत बनाए रखा । इनके निबंधों के अधिकतर विषय- इतिहास, दर्शन, धर्म, मनोविज्ञान और पुरातत्व संबंधी ही हैं । ‘शैशुनाक की मूर्तियाँ’ ‘देवकुल’ ‘पुरानी हिंदी’, ‘संगीत’, ‘कच्छुआ धर्म’, ‘आँख’, ‘मोरेसि मोहिं कुठाऊँ’ और ‘सोहम्’ जैसे निबंधों पर उनकी विद्वता की अमिट छाप मौजूद है ।

गुलेरी जी कवि भी थे, यह लोग बहुत कम जानते हैं । ‘एशिया की विजय दशमी’, ‘भारत की जय’, ‘वेनॉक बर्न’, ‘आहिताग्नि’, ‘झुकी कमान’, ‘स्वागत’, ‘रवि’, ‘ईश्वर से प्रार्थना’ और ‘सुनीति’ इनकी कतिपय श्रेष्ठ कविताएँ हैं । ये रचनाएँ गुलेरी विषयक संपादित गंथों में संकलित हैं । उनकी उपलब्ध खड़ी बोली की कविताओं में राष्ट्रीय जागरण और उद्बोधन का स्वर अधिक मुखर हुआ है । यही नहीं ब्रिटिश साम्राज्य की कटु आलोचना, आक्रोश, ग्लानि आदि भावों का भव्य आकलन किया गया है ।

पत्र-लेखक के रूप में भी गुलेरी जी की सिद्धहस्तता का परिचय मिलता है । पत्र-लेखन तबके साहित्यकारों के साथ सम्मतियों एवं प्रोत्साहन से परिपूर्ण रहता था । द्विवेदी युग के विशिष्ट साहित्यकारों – बाबू श्यामसुंदर दास, गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, रायकृष्णदास, अम्बिका प्रसाद बाजपेयी, मुंशी देवी प्रसाद, आचार्य राम चन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, कामता प्रसाद गुरु और मैथिलीशरण गुप्त आदि के साथ गुलेरी जी का पत्र-आदान-प्रदान था । इन पत्रों से गुलेरी जी की शोध विषयक जिज्ञासा और साहित्य की हर विधा की पकड़ का ठोस प्रमाण मिलता है ।

साहित्यकार के रुप में गुलेरी जी ने साहित्य की सभी विधाओं में जमकर लिखा है परंतु उनकी पहचान तथा ख्याति एक कथाकार के रुप में हुई है । उनकी लिखी तीन कहानियाँ ही प्रामाणिक हैं । वे हैं- 1. सुखमय जीवन 2. बुद्धू का काँटा तथा 3. उसने कहा था । ‘उसने कहा था’ कहानी आज भी उतनी ही नई तथा जिज्ञासापूर्ण है जितनी अपने समय में थी । सन् 1915 में यह कहानी सरस्वती पत्रिका में छपी थी । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस कहानी की प्रशंसा करते हुए अपने इतिहास की पुस्तक में लिखा है- ‘इसमें पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम यथार्थता के भीतर, भावुकता का चरमोत्कर्ष अत्यंत निपुणता के साथ संपुटित है । घटना उसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है पर उसके भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरुप झाँक रहा है- केवल झाँक रहा है । निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा । ….. इसकी घटनाएं ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं ।’ डॉ. नगेन्द्र ने तो उनकी तीनों कहानियों पर अपनी बेबाक टिप्पणी देते हुए ‘उसने कहा था’ को हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानी करार दिया है- ‘सुखमय जीवन में गुलेरी जी की कहानी कला का शैशव है, बुद्धू का काँटा में किशोरावस्था और उसने कहा था में आकर वह पूर्णतः पोषिता हो गई है ।’ गुलेरी जी की पहली कहानी सुखमय जीवन सन् 1911 में भारत मित्र पत्रिका में छपी थी ।

सुखमय जीवन का कथानक, रूप के प्रति आसक्ति और रोमांस के माध्यम से सामने आया है । इस कहानी में प्रेम का बाह्य-पक्ष ही चित्रित हुआ है । ‘बुद्धू का काँटा’ का कथानक अव्यक्त प्रेम के रूप में विभिन्न घटनाओं के माध्यम से आगे बढ़ता है । रघुनाथ को सांसारिक ज्ञान न होने के कारण स्त्री-समाज की जली-कटी सुननी पड़ती है । इस कहानी में कर्त्तव्य पहले बाद में प्रेम आता है । प्रेम, संवेदना और कर्त्तव्य की दृष्टि से ‘उसने कहा था’ कहानी अद्वितीय है । वास्तव में गुलेरी जी की तीनों कहानियाँ संयोग और घटनाओं से निर्मित हैं । परंतु घटनाएं ऐसी हैं जैसी रोज घटती हैं । उनमें कृत्रिमता का आभास न होकर हृदय को स्पर्श करने की क्षमता है । कहानी के छोटे-छोटे संवाद हैं । चुस्त-दुरूस्त हैं ।

कथाकार गुलेरी की कहानियों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वे युग से आगे बढ़कर अपनी कहानियों में रोमांस और सेक्स को ले आए । उस आदर्शवादी युग में इस प्रकार का वर्णन समाज-ग्राह्य नहीं माना जा सकता था । परंतु वे सैक्स के नाम पर झिझकने वाले पंडितों में से नहीं थे । उन्होंने यथार्थ जीवन जिया और उसका खुलकर वर्णन भी किय़ा । ‘सुखमय जीवन’ कहानी का यह अंश पठनीय है – चपलता कहिए, मैंने दौड़कर कमला का हाथ पकड़ लिया । उसके चेहरे पर सुर्खी दौड़ गई और डोलची उसके हाथ से गिर पड़ी । मैं उसके कान में कहने लगा । ‘बुद्धू का काँटा’ कहानी में भी एक प्रसंग आता है इसी तरह- ‘रघुनाथ ने एक हाथ उसकी कमर पर डालकर उसे अपनी ओर खींचना चाहा । मालूम पड़ा कि नदी के किनारे का किला, नींव से गल जाने से धीरे-धीरे धँस रहा है । भागवंती का बलवान् शरीर निस्सार होकर रघुनाथ के कंधे पर झूल गया ।’ अतएव यह कहना प्रासंगिक ही है कि जब कहानी घुटनों के बल सरक रही थी तो गुलरी जी की कहानियाँ पाँव के बल चलकर चौकड़ी भरने में समर्थ थीं । उन्होंने अनुपम कलापूर्ण कहानियाँ लिखकर युग को प्रेरित और गतिमान किया है । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी और हिंदी कथा साहित्य के मसीहा थे । एक यही ऐसा कारण है कि उनकी उसने कहा था कहानी का सिक्का आज भी जमा हुआ है । ऐसे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न सरस्वती पुत्र चंद्रधर शर्मा गुलेरी का 39 वर्ष की अल्पायु में 12 सितम्बर 1922 ई. को काशी में निधन हो गया ।

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