बशीर बद्र

बशीर बद्र मुहब्बत के शायर हैं और उनकी शायरी का एक-एक लफ्ज इसका गवाह है। मुहब्बत का हर रंग उनकी गजलों में मौजूद है। उनका पैगाम मुहब्बत है -जहाँ तक पहुँचे। यह संकलन उनकी समूची शायरी का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी लाजवाब भूमिका हिन्दी के प्रसिद्ध कवि सम्पादक कन्हैयालाल नंदन ने लिखी है।

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो।
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए।

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो.

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिन्दा न हों.

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी.

दुश्मनी का सफ़र इक क़दम दो कद़म
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएँगे.

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यों कोई बेवफ़ा नहीं होता.

जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौंसला नहीं होता.

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरया समन्दर से मिला, दरया नहीं रहता.

हम तो दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
हम जहाँ से जाएँगे, वो रास्ता हो जाएगा.

ज़िन्दगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

वारिसे मुल्के ग़ज़ल रोए तो रो लेने दो
गुस्ले अस्कीं से हुआ करती है तहरीरे-सुख़न।

ज़ेफ़र्क ताब क़दम एक मौज ए मैनाव
तकल्लुमश कि बजे चाँदनी में सितार।

जमी है देर से कमरे में ग़ीबतों की नशिस्त
फ़जा में गर्द है माहौल में कदूरत है।

क्या हुआ आज क्यों खैम-ए-जख़्म से
कज़-कुलाहाने-ग़म क्यों निकलने लगे।

मैं घर से जब चला तो किवाड़ों की ओट में
नर्गिस के फूल चाँद की बाँहों में छुप गए।

अब के आँसू आँखों से दिल में उतरे
रुख बदला दरिया ने कैसा बहने का

बीच बाज़ार में गा रहा था कोई
आओ न मेरी जाँ, चाँदनी चौक में

मुझे देर तक अपनी पलकों पै रख
यहाँ आते-आते ज़माने लगे

लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख जाए
यों याद तेरी शब भर सीने में सुलगती है

ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है

यूँ ही बेसबब न फिरा करो,
कोई शाम घर भी रहा करो

कभी पा के तुझको खोना कभी खो के तुझको पाना
ये जनम जनम का रिश्ता तेरे मेरे दरमियाँ हैं
उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे
मुझे रोक-रोक पूछा तेरा हमसफ़र कहाँ है

तमाम रात चराग़ों में मुस्कुराती थी
वो अब नहीं है मगर उसकी रोशनी हूँ मैं

मेरी छत से रात की सेज तक कोई आँसुओं की लक़ीर है
ज़रा बढ़ के चाँद से पूछना वो उसी तरफ़ से गया न हो
वो फ़िराक़ हो कि विसाल हो तेरी आग महकेगी एक दिन
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या जो चराग़ बन के जला न हो

यही अन्दाज़ है मेरा समन्दर फतह करने का
मेरी काग़ज़ की कश्ती में कई जुगनू भी होते हैं

मेरी निगाह जिधर गई ख़िजाँ ही मिली
न जाने कितने बरस हो गए न देखी बहार

एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊँगा
जिन्दगी मुझको तेरा पता चाहिए

बशीर बद्र&rdquo पर एक विचार;

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