चल मुसाफ़िर

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
अपने पहाड़ ग़ैर के गुलज़ार हो गए
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
आँसुओं से धुली ख़ुशी की तरह
आग को गुलज़ार करदे, बर्फ़ को दरिया करे
आया ही नहीं हम को आहिस्ता गुज़र जाना
इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ
इस ज़ख्मी प्यासे को इस तरह पिला देना
उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर
उनको आईना बनाया
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में
कहाँ आँसुओं की ये सौगात होगी
किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना
किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊँगा
कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
कोई जाता है यहाँ से न कोई आता है
कोई फूल धूप की पत्तियों में
ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में
ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे
ख़ुश्बू को तितलियों के परों में छिपाऊंगा
गज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखायेंगे
ग़मों की आयतें शब भर छतों पे चलती हैं
गुलों की तरह हमने ज़िन्दगी को इस क़दर जाना
चल मुसाफ़िर बत्तियां जलने लगीं

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जायेगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझे चाहेगा

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लायेगा

ना जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आयेगा

मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ
अगर वो आया तो किस रास्ते से आयेगा

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले लगा लिया वो दूर हो गया

कागज में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

महलों में हमने कितने सितारे सजा दिये
लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया

तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना
आईना बात करने पे मज़बूर हो गया

सुब्हे-विसाल पूछ रही है अज़ब सवाल
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया

कुछ फल जरूर आयेंगे रोटी के पेड़ में
जिस दिन तेरा मतालबा मंज़ूर हो गया

अपने पहाड़ ग़ैर के गुलज़ार हो गए
अपने पहाड़ ग़ैर के गुलज़ार हो गये
वे भी हमारी राह की दीवार हो गये

फल पक चुका है शाख़ पर गर्मी की धूप में
हम अपने दिल की आग में तैयार हो गये

हम पहले नर्म पत्तों की इक शाख़ थे मगर
काटे गये हैं इतने कि तलवार हो गये

बाज़ार में बिकी हुई चीजों की माँग है
हम इस लिये ख़ुद अपने ख़रीदार हो गये

ताजा लहू भरा था सुनहरे गुलाब में
इन्कार करने वाले गुनहगार हो गये

वो सरकशों के पाँव की ज़ंजीर थे कभी
अब बुज़दिलों के हाथ में तलवार हो गये

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
किश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा

बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुमने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा

क़ातिल के तरफ़दार का कहना है कि उसने
मक़तूल की गर्दन पे कभी सर नहीं देखा

आँसुओं से धुली ख़ुशी की तरह
आंसुओं से धुली ख़ुशी की तरह
रिश्ते होते हैं शायरी की तरह

जब कभी बादलों में घिरता है
चाँद लगता है आदमी की तरह

किसी रोज़न किसी दरीचे से
सामने आओ रोशनी की तरह

सब नज़र का फ़रेब है वर्ना
कोई होता नहीं किसी की तरह

खूबसूरत, उदास, ख़ौफ़जदा
वो भी है बीसवीं सदी की तरह

जानता हूँ कि एक दिन मुझको
वक़्त बदलेगा डायरी की तरह

आग को गुलज़ार करदे, बर्फ़ को दरिया करे
आग को गुलज़ार करदे, बर्फ़ को दरिया करे
देखने वाला तेरी आवाज़ को देखा करे

उसकी रहमत ने मिरे बच्चे के माथे पर लिखा
इस परिन्दे के परों पर आस्माँ सज़दा करे

एक मुट्ठी ख़ाक थे हम, एक मुट्ठी ख़ाक हैं
उसकी मर्ज़ी है हमें सहरा करे, दरिया करे

दिन का शहज़ादा मिरा मेहमान है, बेशक रहे
रात का भूला मुसाफ़िर भी यहाँ ठहरा करे

आज पाकिस्तान की इक शाम याद आई बहुत
क्या ज़ुरूरी है कि बेटी बाप से परदा करे

आया ही नहीं हम को आहिस्ता गुज़र जाना
आया ही नहीं हमको आहिस्ता गुज़र जाना
शीशे का मुक़द्दर है टकरा के बिखर जाना

तारों की तरह शब के सीने में उतर जाना
आहट न हो क़दमों की इस तरह गुज़र जाना

नश्शे में सँभलने का फ़न यूँ ही नहीं आता
इन ज़ुल्फ़ों से सीखा है लहरा के सँवर जाना

भर जायेंगे आँखों में आँचल से बँधे बादल
याद आएगा जब गुल पर शबनम का बिखर जाना

हर मोड़ पे दो आँखें हम से यही कहती हैं
जिस तरह भी मुमकिन हो तुम लौट के घर जाना

पत्थर को मिरा साया, आईना सा चमका दे
जाना तो मिरा शीशा यूँ दर्द से भर जाना

ये चाँद सितारे तुम औरों के लिये रख लो
हमको यहीं जीना है, हमको यहीं मर जाना

जब टूट गया रिश्ता सर-सब्ज़ पहाड़ों से
फिर तेज हवा जाने किस को है किधर जाना

इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ
इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ
मेरा उसूल है, पहले सलाम करता हूँ

मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ

मैं अपनी जेब में अपना पता नहीं रखता
सफ़र में सिर्फ यही एहतमाम करता हूँ

मैं डर गया हूँ बहुत सायादार पेड़ों से
ज़रा सी धूप बिछाकर क़याम करता हूँ

मुझे ख़ुदा ने ग़ज़ल का दयार बख़्शा है
ये सल्तनत मैं मोहब्बत के नाम करता हूँ

इस ज़ख्मी प्यासे को इस तरह पिला देना
इस ज़ख़्मी प्यासे को इस तरह पिला देना
पानी से भरा शीशा पत्थर पे गिरा देना

इन पत्तों ने गर्मी भर साये में हमें रक्खा
अब टूट के गिरते हैं बेहतर है जला देना

छोटे क़दो-क़ामत पर मुमकिन है हँसे जंगल
एक पेड़ बहुत लम्बा है उसको गिरा देना

मुमकिन है कि इस तरह वहशत में कमी आये
इन सोये दरख़्तों में तुम आग लगा देना

अब दूसरों की ख़ुशियाँ चुभने लगीं आँखों में
ये बल्ब बहुत रोशन है इस को बुझा देना

बारीक कफ़न पहने तुम छत पे चली आओ
जब भीड़ सी लग जाये ये परदा उठा देना

वो जैसे ही दाख़िल हो सीने से मिरे लग कर
तुम कोट के कालर पर एक फूल लगा देना

इस बदमज़ा चाये में सब ज़ायके पायेंगे
इक सोने के चमचे को हर कप में चला देना

उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर
उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर
नीले बादल के इक गाँव में जायेंगे
धूप माथे पे अपने सजा लायेंगे
साये पलकों के पीछे छुपा लायेंगे

बर्फ पर तैरते रोशनी के बदन
चलती घड़ियों की दो सुइयों की तरह
दायरे में सदा घूमने के लिये
आहिनी महवरों पर जड़े जायेंगे

जब ज़रा शाम कुछ बेतकल्लुफ़ हुई
बरगज़ीदा फ़रिश्तों के पर नुच गये
रात का टेप सूरज बजा दे अगर
मोम के पाक़ चेहरे पिघल जायेंगे

सुरमई हड्डियों, ख़ाक़ी अश्जार ने
लौटने वालों का ख़ैर मक़दम किया
हमने तो ये सुना था कि इन लोगों पे
चाँद तारे बहोत फूल बरसायेंगे

मुख़तलिफ़ पेच में इक कसी शख़्सियत
याद का फूल बन कर बिखर जायेगी
धूप के चमचमाते हुए हाथ जब
नीम के फूल सड़कों पे बरसायेंगे

उनको आईना बनाया
उसको आईना बनाया, धूप का चेहरा मुझे
रास्ता फूलों का सबको, आग का दरिया मुझे

चाँद चेहरा, जुल्फ दरिया, बात खुशबू, दिल चमन
इन तुम्हें देकर ख़ुदा ने दे दिया क्या-क्या मुझे

जिस तरह वापस कोई ले जाए अपनी छुट्टियाँ
जाने वाला इस तरह से कर गया तन्हा मुझे

तुमने देखा है किसी मीरा को मंदिर में कभी
एक दिन उसने ख़ुदा से इस तरह माँगा मुझे

मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रखकर चल दिया
कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महवे- ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

ये ग़ज़ल है जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रौशनी, कभी बे-चिराग़ ये घर न हो

कभी दिन की धूप में झूम कर, कभी शब के फूल को चूम कर
यूँ ही साथ-साथ चले सदा, कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब आ, ज़रा और दिल के करीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं, कि बिछड़ने का कभी डर न हो

कहाँ आँसुओं की ये सौगात होगी
कहाँ आँसुओं की ये सौगात होगी
नए लोग होंगे नयी बात होगी

मैं हर हाल में मुस्कराता रहूँगा
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी

चराग़ों को आँखों में महफूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी

न तुम होश में हो न हम होश में है
चलो मयकदे में वहीं बात होगी

जहाँ वादियों में नए फूल आएँ
हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी

सदाओं को अल्फाज़ मिलने न पायें
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना
किताबें, रिसाले न अख़बार पढ़ना
मगर दिल को हर रात इक बार पढ़ना

सियासत की अपनी अलग इक ज़बाँ है
लिखा हो जो इक़रार, इनकार पढ़ना

अलामत नये शहर की है सलामत
हज़ारों बरस की ये दीवार पढ़ना

किताबें, किताबें, किताबें, किताबें
कभी तो वो आँखें, वो रुख़सार पढ़ना

मैं काग़ज की तक़दीर पहचानता हूँ
सिपाही को आता है तलवार पढ़ना

बड़ी पुरसुकूँ धूप जैसी वो आँखें
किसी शाम झीलों के उस पार पढ़ना

ज़बानों की ये ख़ूबसूरत इकाई
ग़ज़ल के परिन्दों का अशआर पढ़ना

किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊँगा
किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊँगा
ज़माना देखेगा और मैं न देख पाऊँगा

हयातो-मौत फ़िराको-विसाल सब यकजा
मैं एक रात में कितने दिये जलाऊँगा

पला बढ़ा हूँ अभी तक इन्हीं अन्धेरों में
मैं तेज़ धूप से कैसे नज़र मिलाऊँगा

मिरे मिज़ाज की ये मादराना फ़ितरत है
सवेरे सारी अज़ीयत मैं भूल जाऊँगा

तुम एक पेड़ से बाबस्ता हो मगर मैं तो
हवा के साथ बहुत दूर दूर जाऊँगा

मिरा ये अहद है मैं आज शाम होने तक
जहाँ से रिज़्क लिखा है वहीं से लाऊँगा

कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
कोई चिराग़ नहीं है मगर उजाला है
ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है

ग़ज़ब की धूप है इक बे-लिबास पत्थर पर
पहाड़ पर तेरी बरसात का दुशाला है

अजीब लहजा है दुश्मन की मुस्कराहट का
कभी गिराया है मुझको कभी सँभाला है

निकल के पास की मस्जिद से एक बच्चे ने
फ़साद में जली मूरत पे हार डाला है

तमाम वादी में, सहरा में आग रोशन है
मुझे ख़िज़ाँ के इन्हीं मौसमों ने पाला है

कोई जाता है यहाँ से न कोई आता है
कोई जाता है यहाँ से न कोई आता है
ये दिया अपने अँधेरे में घुटा जाता है

सब समझते हैं वही रात की क़िस्मत होगा
जो सितारा कि बुलन्दी पे नज़र आता है

बिल्डिंगें लोग नहीं हैं जो कहीं भाग सकें
रोज़ इन्सानों का सैलाब बढ़ा जाता है

मैं इसी खोज में बढ़ता ही चला जाता हूँ
किसका आँचल है जो कोहसारों पे लहराता है

मेरी आँखों में है इक अब्र का टुकड़ा शायद
कोई मौसम हो सरे-शाम बरस जाता है

दे तसल्ली जो कोई आँख छलक उठती है
कोई समझाए तो दिल और भी भर आता है

अब्र के खेत में बिजली की चमकती हुई राह
जाने वालों के लिये रास्ता बन जाता है

कोई फूल धूप की पत्तियों में
कोई फूल धूप की पत्तियों में, हरे रिबन से बंधा हुआ ।
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ ।

जिसे ले गई अभी हवा, वे वरक़ था दिल की किताब का,
कही आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ ।

कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई,
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ ।

मुझे हादिसों ने सजा-सजा के, बहुत हसीन बना दिया,
मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो, मेहन्दियों से रचा हुआ ।

वही शहर है वही रास्ते, वही घर है और वही लान भी,
मगर इस दरीचे से पूछना, वो दरख़्त अनार का क्या हुआ ।

वही ख़त के जिसपे जगह-जगह, दो महकते होंठों के चाँद थे,
किसी भूले बिसरे से ताक़ पर, तहे-गर्द होगा दबा हुआ ।

ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में
ख़ुशबू की तरह आया, वो तेज हवाओं में
माँगा था जिसे हमने दिन-रात दुआओं में

तुम छत पे नहीं आए, मैं घर से नहीं निकला
ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में

इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी
बिजली सी घटाओं में, ख़ुशबू सी हवाओं में

मौसम का इशारा है खुश रहने दो बच्चों को
मासूम मोहब्बत है फूलों की ख़ताओं में

भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली
मज़लूम परिन्दों की मासूम सभाओं में

दादा बड़े भोले थे सबसे यही कहते थे
कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में

ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे
ख़ुश रहे या बहुत उदास रहे
ज़िन्दगी तेरे आस पास रहे

चाँद इन बदलियों से निकलेगा
कोई आयेगा दिल को आस रहे

हम मुहब्बत के फूल हैं शायद
कोई काँटा भी आस पास रहे

मेरे सीने में इस तरह बस जा
मेरी सांसों में तेरी बास रहे

आज हम सब के साथ ख़ूब हँसे
और फिर देर तक उदास रहे

ख़ुश्बू को तितलियों के परों में छिपाऊंगा
ख़ुश्बू को तितलियों के परों में छिपाऊँगा
फिर नीले-नीले बादलों में लौट जाऊँगा

सोने के फूल-पत्ते गिरेंगे ज़मीन पर
मैं ज़र्द-ज़र्द शाख़ों पे जब गुनगुनाऊँगा

घुल जायेंगी बदन पे जमी धूप की तहें
अपने लहू में आज मैं ऐसा नहाऊँगा

इक पल की ज़िंदगी मुझे बेहद अज़ीज़ है
पलकों में झिलमिलाऊंगा और टूट जाऊँगा

ये रात फिर न आएगी बादल बरसने दे
मैं जानता हूँ सुबह तुझे भूल जाऊँगा

जब रात के सुपुर्द मुझे करने आओगे
रूमाल रोशनी का हवा में उड़ाऊँगा

आँगन में नन्हें-नन्हें फरिश्ते लड़ेंगे जब
भूरी शफ़ीक़ आँखों में मैं मुस्कराऊँगा

गज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखायेंगे
गज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखायेंगे
रोयेंगे बहुत, लेकिन आँसू नहीं आयेंगे

कह देना समन्दर से, हम ओस के मोती हैं
दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आयेंगे

वो धूप के छप्पर हों या छाँव की दीवारें
अब जो भी उठायेंगे, मिलजुल के उठायेंगे

जब कोई साथ न दे, आवाज़ हमें देना
हम फूल सही लेकिन पत्थर भी उठायेंगे

ग़मों की आयतें शब भर छतों पे चलती हैं
ग़मों की आयतें शब भर छतों पे चलती हैं
इमाम बाड़ों से सैदानियाँ निकलती हैं

उदासियों को सदा दिल के ताक में रखना
ये मोमबत्तियाँ हैं, फ़ुर्सतों में जलती हैं

रसोई घर में ये अहसास रोज होता है
तिरी दुआओं के पंखे हवायें झलती हैं

अजीब आग है हमदर्दियों के मौसम की
ग़रीब बस्तियाँ बरसात ही में जलती हैं

ये उलझनें भी ज़रूरी हैं ज़िन्दगी के लिये
समन्दर में यूँ ही मछलियाँ मचलती हैं

गुलों की तरह हमने ज़िन्दगी को इस क़दर जाना
गुलों की तरह हमने ज़िन्दगी को इस क़दर जाना
किसी की ज़ुल्फ़ में एक रात सोना और बिखर जाना

अगर ऐसे गये तो ज़िन्दगी पर हर्फ़ आयेगा
हवाओं से लिपटना, तितलियों को चूम कर जाना

धुनक के रखा दिया था बादलों को जिन परिन्दों ने
उन्हें किस ने सिखाया अपने साये से भी डर जाना

कहाँ तक ये दिया बीमार कमरे की फ़िज़ा बदले
कभी तुम एक मुट्ठी धूप इन ताक़ों में भर जाना

इसी में आफ़िअत है घर में अपने चैन से बैठो
किसी की सिम्त जाना हो तो रस्ते में उतर जाना

चल मुसाफ़िर बत्तियां जलने लगीं
चल मुसाफ़िर बत्तियाँ जलने लगीं
आसमानी घंटियाँ बजने लगीं

दिन के सारे कपड़े ढीले हो गए
रात की सब चोलियाँ कसने लगीं

डूब जायेंगे सभी दरिया पहाड़
चांदनी की नद्दियाँ चढ़ने लगीं

जामुनों के बाग़ पर छाई घटा
ऊदी-ऊदी लड़कियाँ हँसने लगीं

रात की तन्हाइयों को सोचकर
चाय की दो प्यालियाँ हँसने लगीं

दौड़ते हैं फूल बस्तों को दबाए
पाँवों-पाँवों तितलियाँ चलने लगीं

चल मुसाफ़िर&rdquo पर एक विचार;

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