मिर्ज़ा गालिब

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही
दिल-ए नादां तुझे हुआ क्‌या है
आईना क्यूँ न दूँ के तमाशा कहें जिसे
की वफ़ा हम से तो ग़ैर उस को जफ़ा कह्‌ते हैं
फिर कुछ इस दिल् को बेक़रारी है

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।

मुहब्बत में नही है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले ।

ख़ुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा ज़ालिम,
कहीं ऐसा ना हो यां भी वही काफिर सनम निकले ।

क़हाँ मैखाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़,
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले।

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही
इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही

ख़ार-ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है
शौक़ गुलचीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही

मय परस्ताँ ख़ूम-ए-मय मूंह से लगाये ही बने
एक दिन गर न हुआ बज़्म में साक़ी न सही

नफ़ज़-ए-क़ैस के है चश्म-ओ-चराग़-ए-सहरा
गर नहीं शम-ए-सियहख़ाना-ए-लैला न सही

एक हंगामे पे मौकूफ़ है घर की रौनक
नोह-ए-ग़म ही सही, नग़्मा-ए-शादी न सही

न सिताइश की तमन्ना न सिले की परवाह्
गर नहीं है मेरे अशार में माने न सही

इशरत-ए-सोहबत-ए-ख़ुबाँ ही ग़नीमत समझो
न हुई “ग़ालिब” अगर उम्र-ए-तबीई न सही

दिल-ए नादां तुझे हुआ क्‌या है

दिल-ए नादां तुझे हुआ क्‌या है
अख़िर इस दर्‌द की दवा क्‌या है

हम हैं मुश्‌ताक़ और वह बेज़ार
या इलाही यह माज्‌रा क्‌या है

मैं भी मुंह में ज़बान रख्‌ता हूं
काश पूछो कि मुद्‌द`आ क्‌या है

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर यह हन्‌गामह अय ख़ुदा क्‌या है

यह परी-चह्‌रह लोग कैसे हैं
ग़म्‌ज़ह-ओ-`इश्‌वह-ओ-अदा क्‌या है

शिकन-ए ज़ुल्‌फ़-ए अन्‌बरीं क्‌यूं है
निगह-ए चश्‌म-ए सुर्‌मह-सा क्‌या है

सब्‌ज़ह-ओ-गुल कहां से आए हैं
अब्‌र क्‌या चीज़ है हवा क्‌या है

हम को उन से वफ़ा की है उम्‌मीद
जो नहीं जान्‌ते वफ़ा क्‌या है

हां भला कर तिरा भला होगा
और दर्‌वेश की सदा क्‌या है

जान तुम पर निसार कर्‌ता हूं
मैं नहीं जान्‌ता दु`आ क्‌या है

मैं ने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब
मुफ़्‌त हाथ आए तो बुरा क्‌या है

आईना क्यूँ न दूँ के तमाशा कहें जिसे

आईना क्यूँ न दूँ के तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ के तुझसा कहें जिसे

हसरत ने ला रखा तेरी बज़्म-ए-ख़्याल में
गुलदस्ता-ए-निगाह सुवेदा कहें जिसे

फूँका है किसने गोशे मुहब्बत में ऐ ख़ुदा
अफ़सून-ए-इन्तज़ार तमन्ना कहें जिसे

सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डलिये
वो एक मुश्त-ए-ख़ाक के सहरा कहें जिसे

है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहाँ
शौक़-ए-इनाँ गुसेख़ता दरिया कहें जिसे

दरकार है शिगुफ़्तन-ए-गुल हाये ऐश को
सुबह-ए-बहार पंबा-ए-मीना कहें जिसे

“ग़ालिब” बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहें जिसे

की वफ़ा हम से तो ग़ैर उस को जफ़ा कह्‌ते हैं

की वफ़ा हम से तो ग़ैर उस को जफ़ा कह्‌ते हैं
होती आई है कि अच्‌छों को बुरा कह्‌ते हैं

आज हम अप्‌नी परेशानी-ए ख़ातिर उन से
कह्‌ने जाते तो हैं पर देखिये क्‌या कह्‌ते हैं

अग्‌ले वक़्‌तों के हैं यह लोग उंहें कुछ न कहो
जो मै-ओ-नग़्‌मह को अन्‌दोह-रुबा कह्‌ते हैं

दिल में आ जाए है होती है जो फ़ुर्‌सत ग़श से
और फिर कौन-से नाले को रसा कह्‌ते हैं

है परे सर्‌हद-ए इद्‌राक से अप्‌ना मस्‌जूद
क़िब्‌ले को अह्‌ल-ए नज़र क़िब्‌लह-नुमा कह्‌ते हैं

पा-ए अफ़्‌गार पह जब से तुझे रह्‌म आया है
ख़ार-ए रह को तिरे हम मिह्‌र-गिया कह्‌ते हैं

इक शरर दिल में है उस से कोई घब्‌राएगा क्‌या
आग मत्‌लूब है हम को जो हवा कह्‌ते हैं

देखिये लाती है उस शोख़ की नख़्‌वत क्‌या रन्‌ग
उस की हर बात पह हम नाम-ए ख़ुदा कह्‌ते हैं

वह्‌शत-ओ-शेफ़्‌तह अब मर्‌सियह कह्‌वें शायद
मर गया ग़ालिब-ए आशुफ़्‌तह-नवा कह्‌ते हैं

फिर कुछ इस दिल् को बेक़रारी है

फिर कुछ इस दिल् को बेक़रारी है
सीना ज़ोया-ए-ज़ख़्म-ए-कारी है

फिर जिगर खोदने लगा नाख़ून
आमद-ए-फ़स्ल-ए-लालाकारी है

क़िब्ला-ए-मक़्सद-ए-निगाह-ए-नियाज़
फिर वही पर्दा-ए-अम्मारी है

चश्म-ए-दल्लल-ए-जिन्स-ए-रुसवाई
दिल ख़रीदार-ए-ज़ौक़-ए-ख़्बारी है

वही सदरंग नाला फ़र्साई
वही सदगूना अश्क़बारी है

दिल हवा-ए-ख़िराम-ए-नाज़ से फिर
महश्रिस्ताँ-ए-बेक़रारी है

जल्वा फिर अर्ज़-ए-नाज़ करता है
रोज़-ए-बाज़ार-ए-जाँसुपारी है

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है

मिर्ज़ा गालिब&rdquo पर एक विचार;

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