गोनू झा की कहानियाँ

गोनू झा के स्वर्ग बजाहट
चोर कें छकेलैन/पकड़बेलैन गोनू झा
गोनूक बिलाड़ि
गोनूक इनाम
गोनूक कबुला
गोनूक सपना
गोनूझाक पटौनी
गोनूक बड़द
गोनूक खेती-बाड़ी
गोनूक नोकर
फेर छकायल चोर
गोनूक ढ़ाकी

गोनू झा के स्वर्ग बजाहट
गोनू झा एकटा राजाक दरबारी रहथि । ओ बहुत चतुर छलथि आओर राजाक राज-काज मे मदद करैत छलथि आओर हुनकर खूब मनोरंजन करैत छलथि ।

राजा हुनका बहु मानैत छलथिन्ह संगहि आओर लोक सेहो खूब मानैत छलैन्ह । हुनक उन्नति देखि कऽ सभ दरबारी डाह करैत छल आओर हुनका मिटा देबाक उपाय सोचैत छल । ओहि मे एकटा हजमो छल । ओकरा अपना ज्ञानक घमण्ड रहै । ओ गोनू झा के मिटेबाक बीड़ा उठेलक ।

गामक बाहर राजा के पिताक समाधि छल, राजा प्रतिदिन अपना पिताक समाधि पर फूल चढ़ावय जाय छलथि । पिता पर हुनकर अटूट श्रद्धा छल, हजमा जकर फायदा उठाबय चाहैत छल आओर एकटा चाल चलल ।

एक दिन राजा जखन पिताक समाधि पर फूल चढ़ाबेय गेला तखन ओहि पर एकटा पुर्जा राखल भेटलैन्ह । पुर्जा मे लिखल रहैय-ब‍उआ अहाँ हमर बहुत भक्‍त छी हम अहाँ सँ अत्यन्त प्रसन्‍न छी । स्वर्ग मे हमरा पूजा-पाठ करबा मे बहुत दिक्‍कत होयत अछि ताहि लेल अहाँ शीघ्र गोनू झा के हमरा लग पठा दियऽ । गाम के पूरब मे जे श्मशानक मे ईंटक ढेरि अछि ओहि पर हुनका बैसा हुनका उपर दस पाँज पुआर राखि ओहि मे आगि लगा देबई तऽ ओ सीधे हमरा लग पहुँचि जैता । हम किछु दिनक बाद हुनका वापस भेज देब ।

शुभाशीर्वाद
अहाँक स्वर्गीय पिता

पुर्जा पढ़िकय राजा चकरेला, एहन आश्‍चर्यक बात तऽ ओ कतहु देखने नहि छलथि । ओ मोने-मोने बहुत तर्क वितर्क करय लगला ।

गोनू झाक शत्रु के ई चाल अछि या पिता जीक आज्ञा निश्‍चय नई कय सकला । ओहि दिन दरबार मे आबि राजा पुर्जा के हाल सबके सुनेलनि, सभ दरबारी खुश भऽ गेल । कियो कहय लागल-गोनू झा बहुत भाग्यवान छथि ताहि लेल स्वर्ग मे महाराजा याद कैलथिन्ह । क्यो बाजय – गोनू झा कतेक बड़का पुण्यात्मा छथि जे जीवैत स्वर्ग जैता । कियो डाह करैत बाजल- हमरा सभक सौभाग्य कहाँ ! नहिं तऽ सहर्ष जैबाक लेल तैयार भऽ जैतहुँ ।

एहि पर हजमा बाजल महाराज जिनक आदेश एलन्हि हुनके जैबाक चाही नई तऽ महाराज के मोन मे दुःख हेतैन्ह । साधारण लोक सँ काज नई हेत‍इ तें तऽ गोनू झा के बुलाहट भेलैन्ह ।

इमहर राजा बड़ सोच मे पड़ि गेला, कतऊ दुष्ट सभ मिलकय गोनू झा के मारबाक षड्‍यन्त्र तऽ नहि रचलक अछि या ठीके पिताजी ई पुर्जा भेजने छथि । ओना अक्षर पिताजीक लिखावट सँ मिलैत अछि । अन्त मे किंकर्तव्यबिमूढ़ भऽ ओ गोनू झा सँ विचार- विमर्श कयला ।

गोनू झा एखन तक सब चुपचाप सुनि रहल छलथि । दरबारिक षडयन्त्रक अनुभव हुनका भऽ गेल छलैन्ह आ ओ एहि सँ बचबाक लेल सोचि रहल छला । हुनक कुशाग्र बुद्धि किछुये काल मे समाधान ढूंढि निकाललक । ओ कहलथिन्ह – महाराज हम स्वर्ग जैबाक लेल तैयार छी परन्च तीन शर्त अछि ।

१. हमरा तीन मास के समय देल जाय ।

२. जखन तक हम स्वर्ग सँ नहि घूमि कय आबी हमरा परिवार के सभ मास दस हजार टाका पारिश्रमिक के रूप मे देल जाय ।

३. एहि समय हमरा पचास हजार टाका देल जाय, जाहि सँ घरक सभ इन्तजाम कय कऽ जाय ।

राजा चकित भय कहलखिन-की अहाँ स्वर्ग जायब? की अहाँ एहि बात के सत्य मानैत छी ?

मोनू झा कहलखिन – महाराज हम सचमुच स्वर्ग जायब । अहाँ चिन्ता जुनि करी । उदास भाव सँ राजा गोनू झाक शर्त मानि लेलथिन । सभ दरबारी के आनन्द आओर आश्चर्य के भाव रहै । हजमा अपना जीत पर हँसि रहल छल । तीन मासक बाद राज्यक सभ लोक गांव के पुवारी कातक श्मशान पर पहुँचल जे आई गोनू झा स्वर्ग जैता । सब प्रजा दुःखी छल, राजा सेहो ओतय पहुँच कानि रहल छला । परन्च गोनू झा के मुख कनिको मलीन न‍ई भेल छल ओ हँसिते माँटिक ढेरि पर बैस गेला आओर पुआर सँ हुनका झाँपि देल गेल एवं आगि लगा देल गेल । ई देखि राजा आओर सभ दरबारी कानि रहल छलथि ओतहि हजमा प्रसन्‍न भऽ रहल छल । एहि घटनाक छः मास बीति गेल छल, गोनू झा एखन तक लौट कय घर नहि आयल छलथि । ई सोचि राजा बहुत दुःखी रहैत छलाह आओर गोनू झा बिना दरबारो मे मन न‍ई लगैत छलैन्ह ।

एक दिन राजा दरबार मे गोनू झाक चर्च करैत रहथि तऽ ओतबहि मे एक दरबारी सूचना देलक जे गोनू झा आबि रहल छथि । लोक आश्‍चर्य सँ चकित रहथि जे एहि खबर के झूठ मानी वा सत्य । ओतबहि मे गोनू झा अबेत देखाय लगलाह । गोनू झा पहिने सँ बेसी मोटा गेल छलथि । किछु लोक हुनका भूत बूझि भागि रहल छल, लेकिन राजा स्तम्भित छलथि ।

गोनू झा आबि राजा के प्रणाम केलखिन आओर एकटा पुर्जा राजा के दय देलखिन । किछु कालक बाद राजा कहलखिन- गोनू झा ! की अहाँ सचमुच जीवित छी?

गोनू झा हँसिकय कहलखिन- महाराज एखन तक तऽ जीवित छी । ई देखि हजमाक प्राण सुखि गेल आओर ओ डरे पसीना सँ तर-बतर भऽ रहल छल ।

गोनू झा कहलखिन- महाराज ! हम स्वर्ग सँ आबि रहल छी । अहाँक पिता ओतय बहुत खुश छथि । परंतु हुनका हजामत कराबय मे तकलीफ छैन्ह, केश-दाढ़ी सभ बढ़ि गेल छैन्ह, ताहि लेल ओ हजाम के भेजय वास्ते ई पुर्जा भेजने छथि । एहि पुर्जा मे एयह बात लीखि पठेने छथि ।

गोनू झाक बात सुनतहि हजमा भागय लागल । लेकिन सिपाही ओकरा धऽ पकड़लक । आब तऽ हजमाक दशा बिगड़ि गेल, सब दरबारी आश्‍चर्य सँ अवाक्‌ छल । राजा कहलखिन- ओहि बेर जखन गोनू झा जाय छलथि तऽ तू बढ़ि- चढ़ि कय बाजेत छलें तऽ एखन डर किये होयत छ‍उ ?

हजमा देखलक जे आब पोल खोलय पड़त, नहि तऽ मारल जायब । तें ओ थरथराईत बाजल-सरकार हमरा क्षमा करू । गोनू झा के स्वर्ग बजाबऽ वला पत्र हम लिखने छलहु ! स्वर्ग सँ कोनो पत्र नहि आयल छल ।

गोनू झा कोनो जादू – टोना जनेत छथि तें आगि सँ बचि गेला, परंच हम तऽ जरि कय मरि जायब । आब तँ राजा आश्‍चर्य एवं क्रोध सँ लाल भय गेला आओर गोनू झा के पुछलखिन की बात अछि सच-सच कहू ।

गोनू झा कहलखिन- महाराज ओहि पत्र के देखिते हम बूझि गेल छलहुँ जे हमरा संगे कियो चक्रचालि खेल रहल अछि । तें अपना बचय के उपाय सोचि स्वर्ग गेनाई स्वीकार केने छलहुँ ।

तीन मासक समय लय कऽ हम ओहि माँटिक ढेरी सँ अपना घर तक सुरंग बना लेने छलहुँ आओर जखन हमरा पुआर सँ झाँपि देलक तऽ हम सुरंगक रस्ते अपना घर पहूँच गेलहुँ ।

ओमहर सब बुझलक जे आब गोनू झा जरि कय मरि गेला आओर हमर दुश्मन सभ खुशी मनाबय लागल छल । एमहर हमरा गुप्त रूप सँ पता लागल जे ई सब पूरा हजमाक षडयंत्र छल ।

ओना इ सब बिना प्रमाण के कहित‍उँ तऽ अहां लोकनि के फूसि लागैत तें प्रमाणक संग अहाँ सब के बतेलहुँ ।

राजा आओर सब दरबारी गोनू झा के बुद्धि पर दंग छलाह । ओतहि हजमा के कठोर दण्ड भेटल । संगहि गोनू झा के काफी इनाम भेटलैन्ह ।
चोर कें छकेलैन/पकड़बेलैन गोनू झा
गोनू झा रहथि सतर्क लोक । यद्यपि ओ कोनो धनवान लोक नहि रहथि तथापि गौंआ आ अनगौंआ कें लगैक जे हो ने हो हुनका लग कोनो गाड़ल संपत्ति जरूर छनि । आ तें गामक वा अरोस-पड़ोस गामक चोर सभ हिनका घर मे चोरी करबाक युक्ति बनौलक । किछु दिन मंत्रणा कयलाक बाद दू तीन गोटे सबेरे हुनका दलानक एकटा झुरमुट मे नुका रहल । हुनका ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलनि जे चोर हमरा घर तक आबि चुकल अछि आ तें चोर सभ कें छकेबाक लेल ओ झुरमुट सँ कनिये हटि कें खाट लगेलनि आ बैसि गेलाह ओतय । ओ पनबट्टी आ एक बाल्टी पानि आंगन सँ मंगेलनि आ बैसि गेलाह खाट पर । ओ पान खाथि आ पीक झुरमुट पर फेकथि । पुन: कुरड़ा करथि आ फेर ओएह प्रक्रिया – पान खायब आ कुरड़ा करब । ई क्रम बड़ी राति धरि चलैत रहल । जहन ओ रातिक भोजनक लेल समय पर नहि अयलाह तँ पत्नी दलान पर पहुँचलीह आ देखैत छथि जे एतय तँ तेसरे खेला भऽ रहल अछि ।

पत्नी लग मे बेसैत पुछलथिन – की अहाँ आई भोजन नहि करबैक । पत्नी के लग मे बैसबैत गोनू हुनका आँचर सँ मुँह पोछि लेलाह । पत्नी तमसाइत बजलीह जे ई की कयल । नवे साड़ी के खराब कय देल । गोनू बजलाह जे अहाँ तँ एक बेर मे तमसा गेलहुँ आ ई महानुभाव सभ तँ साँझे सँ हमर पानक पीक आ कुरड़ा के सहि रहल छथि आ तैयो एको बेर सगबगेलाह नहि । चोर सभ कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलैक जे गोनू हमरा सभ कें देखि लेलैन आ ओ सभ बाहर निकलि हुनका पयर पर खैसि पड़ल । गोनू ओकरा सभ कें माफ कऽ देलनि ।

परंतु चोर सभ एहि अपमान कें बर्दास्त नहि कऽ सकल आ किछु दिनक बाद फेर हुनका घर मे चोरि करक लेल आयल । एहि बेर ओ सभ घरक अगल-बगल मे नुका रहल आ राति होयबाक इंतजार करय लागल । सतर्क गोनू फेर बुझि गेलाह जे चोर सभ आबि चुकल अछि आ एहि बेर शायद बिना चोरी कयने नहि रहत । ओ जानि -बूझि कें पत्नी सँ संपत्ति आदिक गप्प करब शुरू कयलनि ।

गोनू – आई काल्हि समय बड़ खराब भऽ गेल अछि आ तें लोक कें सतर्क रहबाक चाही । पता नहि कोन दोग सँ चोर आयत आ सभटा सामान निपत्ता कय देत ।
पत्नी – अपना घर मे अछिये की जे चोर लेत ।

गोनू – से किएक कहैत छी । बाप-पुरषाक देल गहनाक पोटरी जे अछि ।
पत्नी – परन्तु एहि विषय मे हमरा अहाँ कहाँ कहलहुँ ।
गोनू – कहितौ कोना? अहाँक पेट मे बात नहि रहैत अछि आ भेद खुजैत देरी समान निपत्ता ।
पत्नी – तहन आबो तँ कहू जे ओ पोटरी कतय रखने छी ।
गोनू – घर मे राखब तँ चोर लऽ जायत आ तें बाड़ी मे जे आमक गाछ अछि ताहि पर अढ़ मे राखि देने छियैक ।

चोर सभ सभटा सुनिते रहय । लपालप पहुँचल आमक गाछ लग । टॉर्च सँ ऊपर देखलक तँ मोटरी देखेलैक । दनादन ऊपर चढ़ल आ गेल ओतय । परन्तु ई तँ घोरनक छत्ता छल । सभ चित्कार करैत ओतय सँ पड़ायल आ एहि व्यथे कईक मास धरि ओछाओन धेने रहल ।

चोरो सभ हारि मानय वला नहि छल । ओ सभ फेर गोनूक घर मे चोरि करबाक योजना बनेलक । एहि बेर ओ सभ सदल-बल पहुँचल । संगे मे किछु हथियारो लेलक ताकि जरूरत पड़ला पर एकर उपयोग कय कें गोनूक घर मे चोरि कय सकी । ओ सभ येनकेन प्रकारेण हुनक घर मे घुसि गेल आ धरनि पर जा कऽ नुका रहल आ राति हेबाक इंतजार करय लागल । गोनू कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलैन जे एहि बेर ई सभ सदल-बल आयल अछि । तें ओ किछु और युक्ति सोचय लगलाह । अकस्मात ओ पत्नी सँ प्रश्न केलनि जे यदि अपना सभ कें पहिल बेटा होयत तँ ओकर की नाम रखबैक । पत्नी बेस नाराज भेलीह जे बेटा भेल नहिये आर नाम राखि लेब । तथापि गोनू नहि मानलनि । ओ बेटाक नाम रखबाक जिद्द करय लगलाह । हारि कें पत्नी कहलखिन जे बेटाक नाम बापे रखैत छैक से अहीं कोनो नाम राखि लिय । सोचि बिचारि कें गोनू पहिल बेटाक नाम ‘भुटकुन’ रखलनि । आब पत्नी सुतबाक उपक्रम करय लगलीह, ता गोनू फेर गप्प शुरू कयलनि ।
गोनू – जँ दोसर बेटा होयर तँ की नाम रखबैक?
पत्नी – बेटा भेल एकोटा नहि आ नाम दोसरोक रखैत छी ।
गोनू – नाम राखि लेबा मे की हर्ज?
पत्नी -तहन एक्केटा-दूटाक कियाक चारि-पाँच टाक नाम एकहि बेर राखि लिय ।
गोनू – हमरो तँ सएह विचार छल ।
पत्नी – तहन जल्दी सँ सभक नाम कहू जे हम सूती, अन्यथा अहाँ सुतैये नहि देब ।
गोनू -दोसरक नाम मंगनू, तेसरक नाम चुल्हाई आ चारिमक नाम चोर रखबै ।
पत्नी – तखन इहो कहिये दिय जे यदि सभटा आँगन सँ बाहर रहत तँ केना बजेबैक सभटा कें?
गोनू – भुटकुन, मंगनू, चुल्हाई चोर हौ ।

वस्तुत: ई सभ कियो गोनूक पड़ोसी छलाह । आवाज सुनतहि सभ कियो लाठी लऽ कऽ धमकैत गेलाह आ पुछलनि कहाँ यौ । गोनू कहलनि – हे सभ गोटे धरनि पर बैसल छल । एहि बेर चोरबा सभ जगहे पर पकड़ा गेल । ओ सभ धरनि पर सँ उतरैत गेल आ गोनूक पयर पर खसल आ फेर हुनका घर आ हुनका गाम मे चोरि नहि करबाक प्रतिज्ञा कयलक । गोनू ओकरा सभ कें माफ कऽ देलनि ।
गोनूक बिलाड़ि
गोनू झाक बुद्धिमत्ताक लोहा सभ कियो मानैत छल । अपन बुद्धिमत्तेक बल पर ओ मिथिलाक राजदरवार मे आदर पबैत छलाह । एक बेर मिथिला नरेशक मोन मे एकटा विचार आयल । ओ अपन सभ दरबारी के बजौलनि आ एक-एकटा विलाड़ि सभ कें दैत आदेश देलैन जे एहि बिलाड़ि के तीन महीन धरि पालू-पोषू आ तत्पश्चात्‌ जकर बिलाड़ि अधिक बलिष्ठ रहत, हुनका इनाम भेटत । नरेशक आदेश रहनि । सभ कियो आदेश मानबाक लेल विवश छलाह । सभ अपन-अपन बिलाड़ि लेलनि आ ओकर खूब पालन करय लगलाह जे कदाचित हमरे इनाम भेटि जायत ।

गोनू सेहो बिलाड़िक संग घर पहुँचलाह । ओहो ओकर सेवा-सुश्रुषा मे लागि गेलाह । घर मे महीस जे दूध दैन से बिलाड़िक भोजन मे चलि जाइक । दू-चारि दिन तँ ठीक लगलनि, परन्तु बाद मे गोनू कें ई बात ठीक नहि लगलनि जे महीस पोसी हम आ दूध पीबय ई बिलाड़ि । ओ एहि युक्ति मे लागि गेलाह जे कोन तरहें दूध बांचि जाय आ इनामो भेटि जाय । अंतत: हुनका एकटा उपाय सुझलनि ।

अगिला दिन भोरे ओ महीस दुहलाह । दूध औंटबेलाह । गरम-गरम दूधक लोहिया ओ आंगन मे रखलाह आ तत्पश्चात्‌ बिलाड़ि के बड़ प्रेम सँ चुचकारलाह । बिलाड़ि दूध देखैत देरी लगीच पहुँचल । गोनू बिलाड़ कें गरदनि सँ पकड़लाह आ गरम दूध मे ओकर मूड़ी डुबा देलनि । बिलाड़ि छटपटायल आ पुन: देह झाड़ि ओतय सँ भागल । आब बिलाड़ि दूध कें देखैत देरी भागि जाय । गोनू निश्चिंत भेलाह आ शान सँ दूध-दही अपने खाय लगलाह । धीरे-धीरे तीन महीनाक अवधि समाप्त भऽ गेल । ओ दिन आबि गेल जहिया मिथिला नरेश बिलाड़िक प्रतिपालनक लेल इनाम बँटताह । सभ कियो अपन-अपन बिलाड़िक संग उपस्थित भेलाह । गोनू सेहो अपन सामान्य बिलाड़ि कें लऽ दर्बार मे हाजिर भेलाह ।

सभक बिलाड़ि एक सँ एक बलिष्ठ रहैक । मिथिला नरेशक लेल निर्णय करब कठिन रहैन । परन्तु गोनूक बिलाड़ि सभ सँ कमजोर रहनि । नरेश गोनू सँ एकर कारण पुछलाह । गोनू बजलाह – महाराज! हमर बिलाड़ि तऽ दूध पीबिते नहि अछि तखन हम की करी? बिलाड़ि दूध नहि पीबैत अछि, एहि गप्प पर सहसा केकरो विश्वास नहि भेलैक । तथापि प्रमाणक लेल एकटा बर्तन मे दूध मँगाओल गेल । दूध के देखितहि गोनूक बिलाड़ि ओतय सँ भागय लागल । सौंसे राज-दरबार देखलक जे गोनूक कहब ठीक छनि । अंतत: मिथिला नरेश बजलाह – बिनु दूध पीने गोनूक बिलाड़ि ठीक छनि तें इनाम गोनू कें भेटबाक चाही । संपूर्ण राजदरबार अचंभित रहि गेल नरेशक निर्णय सँ ।

गोनूक इनाम
गोनू झा अपन बुद्धिमत्ता आ वाकपटुताक लेल नहि केवल मिथिले वरन्‌ अरोस-परोसक राज्य मे सेहो मशहूर रहथि । हुनक पहुँच राज दरवार धरि रहनि आ अपन एहि गुणक लेल सभ ठाम समादृत होथि । राज दरवार मे चाहे कोनो समस्या विशेष पर चर्चा हो या कोनो आन ठामक विद्वान सँ शास्त्रार्थक गप्प, सभ ठाम हुनक उपस्थिति अनिवार्य रहनि । शास्त्रार्थ वा अन्य क्रम मे ओ बेसीकाल इनाम सेहो पाबथि आ तें कतेको दरबारी सहित आन लोक सभ हुनक उन्नति सँ जरनि । एहने स्थिति एकटा द्वारपालक छल जे राज दरवारक मुख्य द्वार पर तैनात छल । गोनू झा कें कतेको इनाम आदि भेटलनि किन्तु ओ ओहि द्वारपाल के कहियो बख्शीश नहि देलाह आ तें ओ विशेष रूप सँ गोनू सँ नाराज रह।

एकबेर एहन संजोग भेल जे कोनो दोसर राज्यक विद्वान मिथिला दरबार मे पधारलथि आ एहि ठामक विद्वान लोकनि के कोनो विषय पर शास्त्रार्थ करबाक लेल चुनौती देलनि । यद्यपि गोनू दरबार मे उपस्थित नै छलाह, तथापि हुनक चुनौती कें स्वीकार कयल गेलनि । शास्त्रार्थ शुरु तँ भेल, परन्तु गोनूक अनुपस्थिति मे मिथिलाक विद्वान लोकनि पिछड़य लगलाह । ता गोनू के कतहु सँ खबरि भेलनि जे आई मिथिलाक प्रतिष्ठा दाव पर लागल अछि, तँ ओ तुरंत राज दरवार दिस विदा भेलाह ।

राज दरवारक मुख्य द्वार बन्न छल आ दरबार मे शास्त्रार्थ होयबाक कारणें प्राय: ककरो प्रवेशक अनुमति नहि छल । आ तें मौका देखि द्वारपाल गोनू कें सेहो रोकि देलक । गोनू ओकरा बुझेबाक प्रयास कयलनि जे हमरा भीतर जाय दयह, कारण आई अपना राज्यक प्रतिष्ठा दाँव पर लागल अछि । परन्तु ओ गोनू सँ बदला चुकेबाक एहन अवसर के हाथ सँ नहि जाय देबय चाहैत छल आ तें कतबो कहलाक बाद द्वार खोलबाक लेल राजी नहि भेल । गोनू कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलनि जे आखिर ई किएक द्वार नहि खोलि रहल अछि । ओ प्रसंग के बदलैत बजलाह । ठीक छै तों द्वार खोल । आई हमरा जे इनाम मे भेटत से हम तोरे देबौक । द्वारपाल प्रसन्नचित्त होईत द्वार खोलि देलक आ गोनू दरबार मे हाजिर भेलाह ।

हुनका पहुँचतहि शास्त्रार्थक रंग बदलि गेल आ पराजित होईत मिथिलाक विद्वान शास्त्रार्थ मे विजित भेलाह । वस्तुत: गोनू हारल बाजी कें पलटि देलनि आ सम्पूर्ण दर्बार मे हुनक चर्चा होमय लागल । चूँकि समय पर आबि कें गोनू मिथिलाक प्रतिष्ठाक रक्षा केलनि आ तें राजा हुनका १०० स्वर्ण मुद्रा इनाम देबाक घोषणा कयलनि । परंतु ई की? गोनू एहि इनाम कें लेबा सँ इन्कार कऽ देलनि । राजा कें भेलनि जे संभवत: राशि कम अछि आ तें गोनू इनाम नहि लय रहल छथि आ तें राजा पुन: १००० स्वर्ण मुद्रा इनामक घोषणा केलनि । परन्तु गोनू एहू बेर इनाम लेबा सँ इन्कार कऽ देलनि आ मन माफिक इनाम लेबाक बात कहलनि । राजा अपन स्वीकृति देलनि आ गोनू सँ अपन इच्छित इनामक विषय मे पुछलनि । परंतु गोनू इनाम मे २० सोंटा मारि मंगलनि । हुनक एहन इनामक मांग सूनि सभ कियो अचम्भित रहि गेल आ हुनका सँ पुनर्विचारक निवेदन कयल गेल । परन्तु गोनू अपन बात पर अडिग रहलाह । हारि कें राजा सिपाही कें हुनका २० सोंटा मारबाक आदेश देलनि ।

तखनहि गोनू बजलाह जे आई हम अपन इनाम मुख्य द्वार परहक द्वारपाल के गछने छियैक आ तें ई इनाम ओकरे देल जाय । तुरंत दूत मुख्य द्वार पर पहुँचल आ द्वारपाल सँ पुछलक जे गोनू आई तोरा अपन इनाम गछने छथुन से चलि कें लऽ ले । द्वारपाल बेस प्रसन्न भेल आ पहुँचल दरबार मे । परंतु एहि ठाम तँ दोसरे नजारा छल । ओकरा गोनू कें इनाम मे भेटल २० सोंटा खाय पड़लैक । ओहि दिन सँ ओ गोनुए नहि वरन्‌ आन ककरो सँ बख्शीश माँगब छोड़ि देलक ।
गोनूक कबुला
गोनू रहथि विद्वान लोक । ओ कखनो अंधविश्वास आ कि देवता-पितरक कबुला-पाती मे विश्वास नहि राखथि आ तें जन-सामान्य जकाँ देवता-पितर कें कोनो वस्तु आ कि नीक उपजा-बाड़ीक लेल कबुला-पाती नहि करथि । गाम मे लोक कहनि जे अहाँ के देवता-पितर पर विश्वासे नहि अछि । परन्तु हुनक कहब रहनि जे समय पर वारिश हौक आ समयानुसार धान आदि रोपल जाय, तँ नीक धान हेबे करतैक आ ताहि लेल कबुला-पातीक की प्रयोजन? तथापि एकबेर सभ कियो हुनक पाँछा पड़ि गेल जे अहूँ कबुला करियौ जे अहाँ के एतेक ने एतेक धान होयत तँ अहाँ देवता कें किछु ने किछु चढ़ेबनि । गोनू हारि कें गौंआ सभक समक्ष कबुआ केलनि जे हे देवता जँ हमरा नीक उपजा-बाड़ी होयत तँ हम अहाँ के ‘किछ” चढ़ा देब । संयोग सँ एहि बेर नीक वरषा भेलैक आ गोनू कें नीक जकाँ धान भेलनि । आब गौंआ सभ हुनका पाछाँ पड़ि गेल जे अहाँ कबुला पूरा करियौक ।

आब गोनू के फुरेबे ने करनि जे की कयल जाय । कोन वस्तु देवता के चढ़ाओल जाय । चूँकि ओ वस्तुक नाम नियत नहि केने रहथि तें हुनका लोक तरह-तरह के सलाह दैन । कियो कहनि जे पाई चढ़ाऊ, कियो कहनि जे छागर छढ़ाऊ तँ कियो किछु आन वस्तु चढ़ेबाक लेल कहनि । गोनू लाख सोचथि ‘किछ’ भेटबे ने करनि जे ओ देवता कें गछने रहथि । एही तारतम्य मे कतेको मास बीति गेल । यद्यपि गोनू निश्चिंत रहथि तथापि गौंआ सभ कहाँ मानय वला छल । ओ सभ सभ जखन-तखन गोनू के कबुला पूरा करबाक लेल टोकि दैन ।

गोनू एक दिन घुमैत-फिरैत दया बाबूक ओहिठाम गेलाह । हुनका देखितहि दया बाबू आव-भगत केलखिन आ जोर सँ बजलाह जे गोनू अयलाह अछि तें बैसैक लेल ‘किछ’ ला । आँगन सँ एकटा बचिया एकटा पिरही लेने आयल । आब गोनू के कबुला पूरा करबाक लेल ‘किछ’ भेट गेलनि । ओ कनिये काल मे उठलाह आ पिरही लैत दया बाबू सँ कहलाह जे हमरा बहुत दिन सँ कबुला पूरा करबाक लेल ‘किछ’क तलाश छल, से हमरा भेटि गेल । कृपा कय कें हमरा ई ‘किछ’(पिड़ही) देल जाय ताकि हम अपन कबुला पूरा कऽ सकी । ओ ठोकले ग्राम देवताक मंदिर गेलाह आ ओ पीढ़ी चढ़ा कऽ कयल गेल कबुला ‘किछ’ कें पूरा केलनि । हुनक एहि कारनामा पर सभ कियो हँसय लागल ।
गोनूक सपना
गोनू झा काली मायक बड्‌ड पैघ भक्त छलाह । ओना तँ संपूर्ण मिथिलांचल मे शक्तिपूजाक प्रधानता छैक, तथापि गोनू नित्य माताक पूजा करैत छलाह आ माताक प्रसादात्‌ ओ स्वस्थ आ प्रसन्नचित्त रहैत छलाह । हुनक बुद्धिमत्ताक लोहा नहि केवल गामे भरि मे वरन्‌ मिथिला राजदरबार सहित अन्यत्रो मानल जाईत छल । एकबेर स्वयं माता काली हुनक बुद्धिमत्ताक परीक्षा लेबाक निश्चय केलीह ।

माता काली स्वप्न मे गोनूक समक्ष प्रकट भेलीह आ अपन रूप अति भयंकर बना लेलनि । हुनका मात्र दूटा हाथ छलनि आ हजार गोट मूँह । गोनू उठलाह आ माता कें साष्टांग प्रणाम केलनि । किन्तु तत्क्षण किछु सोचि कें हुनका हँसी लागि गेलनि । हुनक शांत मुद्रा आ पुन: हँसीक आवाज सुनि माता काली कें कने अचरज भेलनि । ओ पुछि देलथिन्ह जे की अहाँ कें हमरा सँ डर नहि भेल? संगहि माता इहो प्रश्न केलनि जे अहाँ के हँसी किएक लागल? उत्तर मे गोनू बजलाह जे बाघ करबो भयंकर रहय, ओकरा देखि कें ओकर बच्चा नहि डेराईत अछि । आ हमहूँ तँ अहाँक पुत्र थिकहुँ तें अहाँ सँ डर लागबाक कोनो प्रश्ने नहि अछि । पुन: हँसीक विषय मे उत्तर देबा सँ पूर्व गोनू माता सँ क्षमा याचना कयलनि । माता हुनका क्षमा दान देलनि । तखन गोनू कहलाह जे हमरा एहि बातक आशंका बेर-बेर भऽ रहल अछि जे हमरा एकटा नाक अछि आ दूटा हाथ आ तखन जुकाम भऽ गेला पर नाक पोछैत-पोछैत परेशान भऽ जाइत छी आ अहाँ केँ १००० नासिका मे मात्र दूटा हाथ अछि, तँ जुकाम भऽ गेला पर अहाँ दूटा हाथ सँ १००० नासिका कोना पोछैत होयब ।

गोनूक ई उत्तर सूनि माता कें बड्‌ड हँसी लगलनि आ ओ बजलीह – गोनू अहाँ कें बुद्धिमत्ता आ वाकपटुता मे कियो नहि हरा सकत ई हमर आशीर्वाद अछि । ई कहि माता काली अदृश्य भऽ गेलीह ।
गोनूझाक पटौनी
गोनू झा खेती-पथारी सँ कम्मे मतलब राखथि । अधिकांश समय राज दरबार मे बीतैन । तथापि जे किछु पुरखा लोकनिक छोड़ल खेत रहनि ताहि पर खेती-बाड़ी करथि । ओहो खेत सभ अल्पे मात्रा मे रहनि आ जे रहैन से प्राय: घरे लग रहैन । एकबेर किछु गोटाक कहला पर ओ घर लगहक खेत मे गहूम बाग कऽ देलनि । बाग करबाक समय मे हाल रहैक आ तें जल्दीये गहूमक खेत भरि गेलैक । तथापि जेना कि अपेक्षित छल किछु मासक बाद एकरा पटायब जरुरी भऽ गेलैक । तथापि लग मे पटेबाक एक मात्र साधन हुनक इनार रहनि । ओ गाम मे जोनक वास्ते घूमय लगलाह जे कियो उचित बोनि लऽ कऽ हमर गहूम पटा देत । मुदा जखने कियो इनार सँ पानि घीचि के पटेबाक बात सुनै तँ ओ मना कऽ दैन । आब गोनू पड़लाह बेस फेर मे । पटौनीक बिना गहूमक पौध सभ मुरझाय लगलैक ।

एमहर चोर सभ गोनू सँ अपन बेर-बेर ठकेबाक बदला लेबाक एहो योजना बनेलल । जहिना एकबेर गोनू चोर सभ कें छका अपन खेत तैयार करबेने रहथि किछु तेहने सन जोगारक फिराक मे गोनू रहय लगलाह । एमहर चोरो सभ फिराक मे रहय जे कोनो ने कोनो प्रकारे एक बेर गोनूक घर मे चोरि करबाक मौका लागय । ओना धन प्राप्ति आश तँ रहबे करैक, सभ सँ बेसी चिन्ता रहैक गोनू सँ बेर-बेर भेल अपमानक बदला लेनाई ।

एहि बीच राज दरबार मे काजक अधिकताक कारणें गोनू कें घर अयबा मे कनेक अबेर भऽ जाईन । चोरो सभ ताहि मध्य अपन प्रोग्राम बनेलक । चूँकि ओ सभ राति आ सांझ मे जा कऽ छका चुकल छल आ तें एकटा अनुभवी चोर अभ्यागतक रूप मे सांझे गोनूक द्वारि पर पहुँच गेल । संजोग सँ गोनू ओहि दिन सबेरे घर आबि गेल रहथि । ओ चोर कोनो बाबाक रूप लेलक आ राति भरि गोनू कें अपना ओहिठाम ठहरय देबाक आग्रह केलक । ताहि समय मे अभ्यागतक आव-भगत होईत छल आ तें गोनू बाबाक आव-भगत मे लागि गेलाह । आँगन मे बाबाक आगमनक सूचना दऽ देल गेल । बाबा आ गोनू दुनू गोटे बैसि गेलाह नाना तरहक गप्प करय लेल ।

शनै:-शनै: गप्पक मुद्दा चोरीक समस्या पर आबि गेल जे आब केहेन जमाना आबि गेल अछि आ चोर सभक कारनामाक अणगिनत खिस्सा सभ बाबा गोनू कें सुनबय लगलाह । संगहि बाबा गप्पक क्रम मे गोनू द्वारा चोरि सँ बचबाक लेल कयल गेल इंतजामक विषय मे सेहो जानय चाहलनि । सतर्क गोनू कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलनि जे ई कोनो बाबा नहि वरन्‌ साक्षात्‌ चोरे महोदय छथि । गोनू तँ एकरे ताक मे रहथि जे चोर सभ कें छका कोना गहूमक पटौनी कराओल जाय । संजोग सँ मौका सामने रहनि ।

गप्पक सिलसिला कें दोसर दिस मोड़ैत गोनू बाबा सँ सम्पत्ति आदिक सुरक्षाक की इंतजाम कयल जाय तकर जिज्ञासा केलनि आ संगहि प्रकट रूप सँ कहलनि जे हमरा घर मे सोना-चांदीक सिक्काक अंबार अछि, कारण रोज-रोज दरबार सँ भेटिते रहैत अछि । ताहि पर बाबा सलाह देलनि जे सोना-चाँदी आदि के बिनु ताला लगेने राखक चाही, कारण चोरक ध्यान पहिने ताला लागल सामान पर जाइत छैक । बाबाक मूँह सँ चोर सभक गप्प सूनि गोनू बेस चिंतित भेलाह आ भोजन सँ पहिने एकरा सुरक्षित स्थान पर रहबाक गप्प कहि ओ आँगन चलि गेलाह । आँगन मे जाईतहि ओ घर मे उपलब्ध दू-चारि टा सिक्का के बेर-बेर खनखनाय के गनलनि आ पुन: एकटा मोटरी मे झूटमूठ किछु बान्हि बाहर अयलाह आ ढ़प्प दऽ मोटरी घर लगहक इनार मे खसा देलनि ।

बाबा जिज्ञासा केलनि जे अपने ई की कयल? गोनू उत्तर देलनि जे जहन सँ अहाँ मूँह सँ चोर सभक खिस्सा सभ सुनलौं हम तँ आतंकित भऽ गेलौं । अपन सभटा सोना-चांदीक सिक्का मोटरी मे बान्हि एहि इनार मे खसा देलियैक आ आब निश्चिंत सँ सूतब । ने घर मे किछु रहत आ ने चोर लऽ जायत । चोर के की पता जे सभटा कीमती सामान एहि इनार मे अछि । ई कहैत गोनू झा अपन चेहरा पर बेस खुशीक भाव प्रकट केलनि आ संगहि बाबा कें उचित सलाह देबाक लेल धन्यवाद सेहो देलनि ।

ता भोजनक समय भेल । बाबाक संग गोनू भोजन केलनि आ चल गेलाह सूतय । एमहर बाबा दलान पर सूतलाह आ निशाभाग राति होईत देरी अपन संगी सभ के इशारा सँ बजाय सभटा गप्प कहि देलनि । फेर की छल । सभ चोर मीलि कें लागल इनार कें उपछय । शनै:-शनै: हुनक गहूमक खेत पाटय लगलनि । जहन इनार पूरा सुखा गेलैक तँ चोर सभ कें मोटरी भेटि गेलैक । ओ सभ यत्न सँ मोटरी कें निकालि लत्ते-पत्ते ओतय सँ पड़ा गेल । मोटरी निकलैत-निकलैत गोनूक खेत नीक जेना पाटि गेलनि ।

ओमहर चोर सभ अपन घर पहुँचल आ सभ मीलि कें मोटरी के खोललक । परन्तु ई की? एहि मे तँ एकोटा सिक्का नहि छल । चोर सभ फेर गोनूक हाथ सँ छका चुकल छल । ओ सभ अपन माथ पीटि कें रहि गेल । परन्तु आब पछतेला सँ की हो? समय हाथ सँ निकलि चुकल छल । भोर भऽ चुकल छल । एमहर राता-राती गोनूक गहूमक खेत पाटि जेबाक खबरि भोर होइत सौंसे गाम मे पसरि गेल । लोक कें ई बुझबा मे भांगठ नहि रहलैक जे गोनू कोना अपन खेत चोरबा सभ सँ पटबा लेलनि । पहिनहुँ तँ कयक बेर छकेने छ्लाह चोर कें गोनू झा ।
गोनूक बड़द
गोनू झा खेती-बाड़ी सँ कम्मे मतलब राखथि । राज दरबारक काज सँ फुर्सति नहि रहनि तथापि बाप-पुरखाक छोड़ल जमीन पर येनकेन प्रकारेण खेती करथि । एहि बेर किछु समय सँ हुनका खुट्‌टा पर बड़द नहि रहनि । खेती कोनो खास नहि रहनि आ तें गोनू बड़द कीनब आवश्यक नहि बुझथि । तथापि गौंआ सभ बेर-बेर पूछि दैन जे गोनू अपने बड़द कहिया लेबैक? ताहि समय मे खुट्‌टा पर मालजाल राखब सम्पन्नताक निशानी मानल जाइक आ एहना स्थिति मे गोनू कें बड़द कीनब अति आवश्यक भऽ गेलनि ।

एक दिन नियारि कें गोनू बड़न किनबाक हेतु भिनसरे गाम सँ चललाह । गाम सँ तीन कोस पर हाट रहैक । गोनू हाट पर पहुँचला आ बड़ी काल धरि घुमला-फिरलाक बाद एकटा बड़द पसिन्न केलनि आ ओकरा कीनि लेलाह । आब गोनू ओकर डोरी धेने गाम दिस विदा भेलाह । गामक सिमान पर अबैत-अबैत करीब चारि बाजि गेल । एम्हर रस्ता मे जे कियो देखैन से पूछि दैन जे बड़द कतेक मे भेल? कय दाँतक अछि? कय माटि बहल अछि? आदि-आदि । जबाव दैत-दैत गोनूक मोन अकच्छ भऽ गेल रहनि । आब गामक निकट छलाह आ स्वभावत: एहने प्रश्नक उम्मीद गोनू कें गामो मे छलनि । गोनू गामक पछवारि सिमान पर रहथि आ हुनक घर रहनि पुबारि टोल मे । एहना स्थिति मे पूरा गाम के कटैत हुनका अपन घर पर जेबाक रहनि । रस्ता मे जबाव दैत-दैत गोनू अकच्छ भऽ गेल रहथि आ तें ओ गामक सिमान पर कने काल विलमलाह आ किछु सोचय लगलाह ।

कनेक काल सोचलाक बाद तो लगे मे एकटा गाछ पर चढ़ि गेलाह आ चिकरय लगलाह – “लोक सभ दौगह हौ ! हैया बाघ छै हौ !…। बाघ हमरा घेर नेने अछि हौ !…” गोनूक ई आवाज सुनैत देरी सौंसे गामक लोक दौगल । जकरा जएह हाथ लगलैक, सएह हथियार लऽ लेलक । एवं क्रमेण गामक सिमान पर लगभग पूरा गामक मेला लागि गेल । मुदा सभ देखलक जे एतय कोनो बाघ नै छैक आ गोनू गाछक एकटा ठाढ़ि पर बैसि कऽ निश्चिंत सँ तमाकुल चुना रहल छथि ।
हुनक ई हावभाव देखि लोक कें ई बुझवा मे भांगठ नहि रहलैक जे गोनू हमरा सभ कें छका देलनि, परन्तु किएक? सभक मोन मे ई प्रश्न छलैक । आखिर किछु गोटा पुछिये देलखिन गोनू सँ जे अपने एना कोना चिकरय लगलहुँ? एतय तँ कोनो बाघ नहि अछि? की अहाँ दिने मे सपना तँ नहि देखैत छलहुँ?

उत्तर मे गोनू बजलाह – हम अपने सभ कें व्यर्थ मे परेशान कयल ताहि लेल सर्वप्रथम हम माँफी चाहैत छी । वस्तुत: हम आइये एकटा बड़द लेलहुँ अछि आ भरि रस्ता एकर दाम, गुण आदि कहैत-कहैत परेशान भऽ गेलहुँ अछि । बड़द अहाँ सोंझा मे गाछक नीचाँ बान्हल अछि । ई बड़द ६ दाँतक अछि, दू माटि बहल अछि, सय टका मे कीनल अछि…। चूँकि अपनहुँ सभ अलग-अलग सभ कियो एकरा विषय मे पुछबे करितहुँ तें हम उपयुक्त बूझल जे सौंसे गौंआ कें एके बेर मे बजा ली आ सभ कें एक बेर बजेबाक लेल एहि सँ दोसर उपाय की भऽ सकैत छल? गोनूक ई गप्प सूनि सभ कियो ठकाहा मारि कें हँसय लगलाह ।
गोनूक खेती-बाड़ी
गोनू रहथि पंडित लोक । खेती-बाड़ी सँ कम्मे मतलब राखथि । तथापि जे किछु खेत-पथार रहनि ले कोहुना के करथि । हुनक जमीनक एकटा पैघ भाग घरे लग रहनि जाहि मे साग-सब्जीक अलावा आरो बहुत किछु उपजाबथि । लेकिन एहि बेर एहेन संजोग भेल जे हुनका गाम मे जोन नहि भेटलनि । लाख खुरछारी कटलनि एको गोटे हुनका खेत मे काज करब नहि गछलकनि । ओ पत्नी सँ पुछलखिन जे कदाचित ककरो पछिला सालक बोनि तँ नहि बाँकी रहि गेलैक । परन्तु पत्नी नहि मे उत्तर देलथिन । आब गोनू पड़लाह बेस फेर मे । तथापि ओ अपन युक्ति लगौलनि । गाम मे घोषणा कऽ देलनि जे एहि बेर ओ आन गाम सँ जोन अनताह । हुनक ई घोषणा शीघ्रे पूरा गाम मे पसरि गेल । लोक कनफुसकी करय लागल जे एतनी जमीनक लेल गोनू आन गाम सँ जोन अनताह । तथापि गोनू गाम मे रहथि वा आन गाम मे गौंआक लेल ओ हरदम कौतुहलक वस्तु छलाह ।

वस्तुत: गोनू आन गाम चलि गेलाह आ घुमलाह ८-१० दिनक बाद । परन्तु हुनका संगे मे कोनो जोन नहि रहनि । ओ भोरे-भोर गाम पहुँचलाह । हुनक गाम पहुँचतहि पूरा गाम शोर भऽ गेल । कोनहुना ओ गौंआ सभ कें बुझा देलनि जे ओ एकठाम पंडिताई मे गेल छलाह आ बहुत रास दान-दक्षिणा लऽ कऽ घुमलाह अछि । दिन भरि एहि सभ मे बीति गेल । भेंट केनहार अबैत रहल आ ओ व्यस्त रहलाह । जहन संध्याक भोजनक बाद गोनू विश्रामक लेल अयलाह तँ पत्नी जिज्ञासा केलथिन जे जाहि धन दऽ अहाँ गौंआ के कहलियौ से कतय अछि ले हमहूँ तँ बुझियै ।

एहि बीच गामक किछु चोर ओही दिन हुनका घर मे चोरि करबाक योजना बनेलक आ सांझे हुनका घरक लग पास मे नुका रहल, ताकि मौका लगितहि हुनक सभटा धन पार कयल जाय । गोनू रहथि सतर्क लोक । ओ परिस्थिति के भांपि लेलनि । तें ओ पत्नी सँ कहलथिन जे हम धन बाड़ी मे गारि देने छियैक, कारण चोरबा सभक कोन ठेकान । पत्नी आग्रह केलखिन जे धन बाड़ी मे कतय अछि से हमरा कहू, परन्तु ओ कहलथिन जे यदि अहाँ के कहि देब तँ अहाँ काल्हिये सँ निकालि-निकालि के खर्च करय लागब । पत्नीक लाख यत्नक बादो गोनू बाड़ीक ओ स्थान नहि बजलाह जाहिठाम धन गाड़ल छल । अंत मे पत्नी तमसा कें सूति रहलीह आ ओहो करोट बदलि सुतबाक उपक्रम करय लगलाह ।

चोर सभ सभटा सुनिते रहय । ओ सभ आनन-फानन मे कोदारि अनलक आ धनक लोभ मे लागल बाड़ी तामय । जहन बाड़ी तमनाय लगिचा गेल तँ गोनू बहरेलाह आ आवाज लगेलाह – तों सभ पनपिआई कय कें जयबह आ कि ओहिना । ई सूनि चोरबा सभ लंक लऽ कऽ पड़ा गेल । भिनसरे पत्नी कें जगबैत गोनू कहलथिन – बीयाक जोगार अछि की नहि? पत्नी अचंभित होईत पुछलखिन जे खेत तँ तैयारे नहि अछि तँ बीयाक की करब? गोनू कहलनि जे उठू आ देखू जे बाड़ी कतेक नीक जेंका तैयार अछि । पत्नी उठलीह तँ देखैत छथि जे सत्ते बाड़ी तँ तैयार अछि । ओ गोनू कें कहलनि जे अहाँ मंगनी मे चोरबा सभ सँ पूरा बाड़ी तमबा लेलियैक । गोनू हंसैत बजलाह – जाने पहचान वला लोक सभ छल । उपजा भेलाक बाद साग-सब्जी पठा देबैक ।
गोनूक नोकर
गोनू झाक बुद्धिमत्ताक खिस्सा मिथिलाक घर-घर मे आइयो कहल-सुनल जा रहल अछि । गोनूक नोकर रहनि – वसुआ । वसुआ रहय सोझमतिया लोक आ ओकरा एहि बातक मलाल रहैक जे अपन गिरहथे जेंका ओहो चन्सगर किएक ने अछि । ओ बेर-बेर गोनू सँ आग्रह करैक – “मालिक हमरो अपन किछ गुण सिखा दिअ ताकि अहीं जेंका हमरो नाम हुअय । लोक कहैत अछि जे गोनू अपने केहेन बुधियार छथि परन्तु हुनकर नोकर वसुआ केहेन बकलेल अछि आ ई गप्प हमरा एको रत्ती नीक नहि लगैत अछि ।” गोनू ओकरा आई-काल्हि करैत टारैत रहथिन्ह । परन्तु एक दिन वसुआ अड़ि गेल जे आई हम जरुर अहाँ सँ किछु गुण सीखब । गोनू ओकरा हर लऽ कऽ खेत जाय कहलथिन्ह आ पूछि देलथिन्ह जे तों आई की जलखै करबें? “हलुआ लेने आयब गिरहथ” वसुआ जबाव देलक । “ठीक छै” कहैत गोनू ओकरा विदा केलनि आ संगहि गोनू इहो कहलनि जे समय अयला पर हम तोरा सबटा सिखा देबौक । आश्वासन पाबि वसुआ हर लऽ कऽ खेत चलि गेल । ओ खूब मोन सँ खेत जोतलक । ओकरा उम्मीद छलैक जे मालिक आई हलुआ लऽ कऽ आबि रहल छथि । तथापि गोनू जलखैक बेर मे नहि पहुँचलाह । जखन करीब एगारह बजलैक तँ एकटा बड़का बरतन माथ पर लदने गोनू हाजिर भेलाह । हुनक हाव-भाव सँ लगैन जे हो ने हो बरतन मे बहुत रास हलुआ छैक । ओ बर्तन नीचाँ रखलाह आ वसुआ कें जलखै क’ लेबाक लेल कहलथिन्ह ।

वसुआ हाथ मुँह धोलक आ बैसि गेल जलखै करय । तथापि जलखै करै सँ पहिने ओ पुछ्लक जे मालिक एतेक देरी किएक भऽ गेल? हलुआ बनबै मे देरी तँ लगिते छैक – गोनूक सोझ जबाव छल । परन्तु जखनहि गोनू बरतनक ढक्कन हटेलनि तँ वसुआ देखलक जे ओहि मे मात्र एक कौर जोकरक हलुआ छैक । ओ तामसे लाल-पीयर भऽ गेल आ बाजय लागल । तथापि गोनू ओकरा बुझबैत कहलथिन्ह जे देखह! कनिये छैक ताहि सँ की । छैक तँ कतेक नीक । खा के देखहक । वसुआ व्यर्थ मे बहस करब उचित नहि बुझलक । ओ बुझि गेल जे गोनू ओकरा आई छका देलनि अछि । ओ चुपचाप जे हलुआ छलैक से खेलक आ अपन काज मे लागि गेल ।

दू-चारि दिनक बाद फेर वसुआ पहुँचल दोसर खेत मे हर लऽ कऽ । ओहो आब नियारि लेने छल जे गोनू सँ बदला जरूर लेत । ओहि दिन ओ कनिके दूर मे लगातार हर जोतैत रहल । जखन गोनू जलखै लऽ कऽ अयलाह तँ बेस तमसेलाह जे तों भिनसर सँ एतबे खेत किएक जोतलें । आब वसुआ हुनका बुझबय लागल – “मालिक! बेसक हम कम्मे खेत जोतलहुँ अछि परन्तु देखियौक जे कतेक सुन्दर जोतलौं अछि । माटि कें कतेक मेंही कऽ देलियैक अछि । गर्दा-गर्दा भऽ गेल अछि एतेक दूरक खेत ।” गोनू वसुआक गप्प सुनैत रहलाह आ चुप्प रहलाह । जखन वसुआक गप्प खतम भऽ गेल तँ ओ ओकरा गला लगा लेलाह आ आशीर्वाद देलनि जे एहिना बुधियार बनल रह । वसुआ बुझि गेल जे ओहि दिनक हलुआ वला घटना मालिक हमरे बुझेबाक वास्ते कयने रहथि । आब गोनुए सदृश हुनक नोकर वसुआ सेहो बुधियार भऽ गेल आ शीघ्रे ओकर नाम परोपट्टा मे पसरि गेलैक ।
फेर छकायल चोर
गोनू रहथि सतर्क आ बुद्धिमान लोक । अपन बुद्धिमत्ता आ विद्वताक बल पर ओ सदैव मिथिलाक राजदरवार मे आदर पाबथि आ यदा-कदा इनाम सेहो । ताहि सँ सौसें ई हल्ला रहैक जे गोनू झा लग बहुत रास संपत्ति छैन आ तें इलाकाक नामी-गिरामी चोर सभ हुनका घर मे चोरि करबाक प्लान बनेलक । चोरि आ सेहो गोनूक घर मे, छल तँ मुश्किल काज, तथापि एकबेर पूरा भऽ गेने बहुत रास धन प्राप्तिक आशा रहैक आ तें चोर सभ एहि दिशा मे काज करब शुरू कयलक ।

सभ सँ पहिने तीन-चारि चोरक एकटा दल कें एकर काज सौंपल गेल आ प्लानक अनुसार ओ सभ साँझ पड़ितहि हुनका दलान पड़हक एकटा पैघ झुड़मुट मे नुका रहल आ राति हेबाक इंतजार करय लागल । परंतु सतर्क गोनू साँझ मे दलान पर अबितहि बूझि गेलाह जे दालि मे जरूर किछु कारी छैक । ओ स्थिरचित्त भऽ एहि समस्या पर विचार केलनि आ अपना पत्नी के दलान पर बजाय, झूठ-मूठ पतरा देखय लगलाह । ओहि दिनक ग्रह दशा पर विचार करैत ओ बजलाह – आजुक ग्रह अपन सभ पर बड़ खराब अछि । पत्नी सशंकित होइत ग्रहक निवारणक उपाय सभ पूछय लगलथिन्ह । ओ पुन: पोथी-पतरा उन्टेलाह आ थोड़ेक कालक उधेर-बुनक पश्चात ई निष्कर्ष निकाललाह जे आई जँ पश्चिम दिस (जेम्हर झुड़मुट मे चोर सभ नुकायल रहय) १०८ टा ढ़ेपा फेकल जाय, तँ ग्रह शान्त भऽ सकैत अछि । जँ ढ़ेपा नम्हर फेकल जाय तँ ग्रहक शान्ति आर तीव्रता सँ भऽ सकैत अछि । पत्नी गोनूक एहि ग्रह शांतिक उपाय सँ सहमति जतेलनि । पुन: गोनू बजलाह जे अहाँ ढ़ेपा आनू आ हम फेकैत छी । फेर की छल शुरू भऽ गेलाह दुनू प्राणी । पत्नी नम्हर-नम्हर ढ़ेपा आनय लगलीह आ गोनू ओकरा पश्चिम दिस फेकय लगलाह, जेम्हर चोर सभ झुरमुट मे नुकायल छल । ढ़ेपा कखनो चोरक नाक पर लगैक तँ कखनो ओकरा सभक कपार पर । गोट पचासेक ढ़ेपा गोनू फेकने हेताह की हुनक पत्नी हर्दा बाजि देलखिन जे आब हमरा बुते नहि होयत ढ़ेपा आनल । ताहि पर गोनू बजलाह जे अहाँ कें ढ़ेपा अननाइ पार नहि लगैत अछि आ ओहि झुरमुट मे नुकायल माहानुभाव सभ सभटा ढ़ेपाक मारि खेलाक बादो एको बेर सगबगेलाह अछि नहि । एत्ते सुनितहि चोर सभ बूझि गेल जे गोनू बाबू हमरा सभ कें देखि लेलनि । ओ सभ झुड़मुट सँ बाहर निकलैत गेल आ आत्मसमर्पण कऽ देलक । ओ सभ पर्याप्त मारि खा चुकल छल आ तें गोनू ओकरा सभ कें माफ कऽ देलनि ।

मारि खेलाक बाद कतेको मास धरि चोर सभ शांत रहल । तथापि एकबेर फेर गोनूक घर मे चोरि करबाक प्रोग्राम बनेलक । एहि बेर ओ सभ साँझे नहि जा कें राति मे जेबाक प्रोग्राम बनेलक । अनहरिया राति रहैक आ गोनू कें अपनी घरक बाहर किछु खड़बड़ सुनेलनि । ओ भाँपि गेलाह जे पुन: चोर सभ आबि गेल अछि । ओ पत्नी दिस तकलनि । परन्तु ओ तँ निश्चिंत भऽ फोंफ कटैत छलीह । गोनू हुनका जानि-बूझि के चुट्टी काटि लेलनि । ओ तमसाइत उठलीह आ लगलीह गोनू पर बाजय । चोर सभ साकांक्ष भऽ गेल आ दुबकि गेल । परन्तु गोनू तँ ओकरा सभ कें फेर छकेबाक जोगार सोचि रहल छलाह । पत्नी कें शांत करैत गोनू बजलाह जे एकटा जरूरी खबरि अहाँ कें नहि कहने रही तें उठबय पड़ल । पत्नी पुछलखिन जे एहन कोन जरूरी खबरि छैक जे ताहि लेल हमरा एत्ते जोर सँ चुट्टी काटि लेलहुँ । गोनू पत्नी कें हाथ सँ कम जोर सँ बजबाक इशारा केलनि आ पुछ्लनि जे बंगौर (बाँगक बीया) कतय अछि । पत्नी कहलखिन जे ओ तँ ओसारे पर अछि । गोनू बेस चिंतित्त भेलाह आ बजलाह जे बंगौरक दाम प्रति सेर पाँच टाका भऽ गेलैक अहाँ एहन चीज कें ओहिना ओसारा पर छोड़ि देलियैक । आब तँ चोर लैये लेत । काल्हिये तँ आठ अन्ने सेर छल आ आई पाँच टके सेर भऽ गेल । चोरो सभ सभटा सुनिते छल आ ओ सभ फटाफट अन्हारे मे जेना-तेना बंगौर तकलक आ तुरन्त निपत्ता भऽ गेल ।

गोनू कें ई अनुमान छलनि जे चोर सभ बंगौर के बेचक हेतु आई हाट पर जरुर आनत । आ तें ओ सबेरे सकाल हाट पर पहुँचि गेलाह । किछु अपरिचित चेहरा कें बंगौर बेचैत देखि ओकर भाव पुछलनि । ओ सभ पाँच टके सेर कहलक । गोनू बूझि गेलाह जे इएह महाशय सभ राति मे हमरा ओतय गेल छलाह । ओ प्रकट होइत बजलाह जे ई दाम तँ राति मे रहैक आ एखन तँ मात्र आठ अन्ने सेर अछि । ई सुनितहि चोर सभ कें सन्देह भेलैक जे कदाचित गोनू हमरा सभ कें चीन्हि गेलाह आ सभ बेरा-बेरी कें ओतय सँ घसकय लागल । एकबेर फेर चोर सभ कें छकेबा मे गोनू सफल भेलाह ।
गोनूक ढ़ाकी
जहिना गोनूक नाम तहिना हुनक आ हुनक भायक बीच भेल बँटवारा । गोनूक बढ़ैत प्रतिष्ठा सँ हुनक भाय बड़ जरथि आ सगरो दुष्प्रचार करथि जे भाय हमरा संग अन्याय करैत छथि । बात बढ़ैत-बढ़ैत बढ़ि गेल । लोक सभ सेहो एहि झगड़ा मे यदा-कदा घी ढारथि । ताहि द्वारे बात बढ़ि के भिन्न-भिनाउज धरि आबि गेल । गोनू अपन भाय भोनूक ठीक सँ देखभालो करथि आ हरदम हुनकर बर-बेगरता मे ठाढ़ रहथि । ओ भोनू के बहुत बुझेबाक प्रयास केलनि जे ओ लोक के कहल मे नहि आबथि आ शांत रहथि, लोक सभ हुनका दुनू भायक बीच मे दरारि फारय चाहैत अछि आदि । तथापि भोनू नहि मानलथि । हारि के गोनू भिन्न-भिनाउज पर राजी भेलाह ।

आब गौंआँ सभ अलगे चालि देबय लागल । ओ भोनू के बुझेलक जे गोनू के कोन कमी छनि । हुनका तँ रोज राज-दरबार सँ किछु ने किछु भेटिते रहैत छनि । तें तों कहून जे घर मे जे धान अछि से सभटा हमरा दऽ दिअ । फेर भोनू पड़ि गेलाह गोनूक पाछू । गोनू तरे-तर सबटा भाँज-पता लगा लेलाह जे एहि काज मे के सभ सह दऽ रहल अछि आ ओ के अछि जे हमरा दुनू भाय मे भिन्न-भिनाउज हेबाक नौबत आनि देलक अछि । हुनका सभ के छ्केबाक लेल आ भाय के ठीक रस्ता पर अनबाक ले गोनू एकटा प्लान बनेलनि ।

भिन्न-भिनाउज पर ओ राजी तँ छलाहे, ओ गौंआँ सभक बैसार करेलनि । दुनू भाय के अलग करेबा मे जनिका सभक भूमिका छलनि तिनका सभ के गोनू विशेष रूप सँ पंचैती मे बजेलनि आ तें जेना की आशा छल, पंच लोकनि ई निर्णय देलनि जे अहाँ घर मे उपलब्ध सभटा धान भोनू के दऽ दियौ, कारण अहाँ के कोन कमी अछि, रोज दरबार सँ किछु ने किछु भेटिते रहैत अछि । पहिने बैसार मे ओ अनुनय-विनय केलनि जे बाप-दादाक अरजल खेत सँ जे किछु धान आदि भेल अछि, से आधा-आधा बँटेबाक चाही । परन्तु ओ पंच लोकनि जे भोनू के सनकबैत रहथिन से एहि पर राजी नहि भेलखिन आ जोर देलखिन जे सभटा धान भोनू के दऽ दियौ । गोनू के ई बात उचित नहि बुझेलनि जे सभटा धान भोनू के दऽ दियै आ हमरा काल्हिये सँ बेसाह लागय । आ तें गोनू प्रस्ताव देलनि जे हमरा आँगन मे राखल ढ़ाकी सँ एक ढ़ाकी धान दऽ देल जाय आ शेष धान भोनू राखथि । भोनू के भड़कावय वला पंच एहि बात पर राजी भऽ गेलाह ।

फेर की छल । लोकक सोझे मे ढ़ाकी मे धान देब शुरू कयल गेल । ढ़ाकी मे धान देल जाइक आ पता नहि ओ धान कतय चलि जाय । ढ़ाकी हरदम खालीक खाली । धान देनहार थाकि गेल परन्तु ढ़ाकी नहि भरल । लोक के आश्चर्य लगैक । अंत मे लोक सभ ढ़ाकी उठेलक तँ देखैत अछि ओकर नीचाँ मे बड़का टा खाधि । लोक सभ आश्चर्यचकित रहि गेल आ गोनू पर छल करबाक दोषारोपण करय लागल ।

गोनू बजलाह – आखिर अहाँ लोकनि भोनू के भड़काय के हमरा घर मे भिन्न-भिनाउज कराइये देल आ हमरा अपन पुरषाक अड़जल खेतक धान सँ सेहो वंचित करबाक बहुत प्रयास कयल । जँ हमचाहितौं तँ अहाँ सभक पंचैतीक मोताबिक आई एक ढ़ाकी धान लऽ सकैत छलहुँ, तथापि भोनूक कोनो हक के मारब हमर ध्येय नहि अछि ।

एतबा सुनितहि भोनू गोनूक पायर पर खसि पड़ल आ भाय सँ भिन्न हेबाक विचार के तिलांजलि दऽ देलक आ ताहि दिन सँ गोनूक ढाकी पूरा मिथिलांचल मे नामी भऽ गेल ।

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