मैथिली गीत

विद्यापति
अभिनव कोमल सुन्दर पात
अभिनव पल्लव बइसंक देल
अम्बर बदन झपाबह गोरि
आजु दोखिअ सखि बड़
आसक लता लगाओल सजनी
आहे सधि आहे सखि
ए धनि माननि करह संजात
कंटक माझ कुसुम परगास
कान्ह हेरल छल मन बड़ साध
कामिनि करम सनाने
कि कहब हे सखि रातुक
कुंज भवन सएँ निकसलि
कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल
के पतिआ लय जायत रे
गीत
चन्दा जनि उग आजुक
चानन भेल विषम सर रे
जखन लेल हरि कंचुअ अचोडि
जनम होअए जनु
जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे
जाइत पेखलि नहायलि गोरी
विद्यापति
जौवन रतन अछल दिन चारि
नन्दनक नन्दन कदम्बक
बटगमनी
बारहमासा
बिरह गीत
बिसरही गीत
भगता गीत
भगबती गीत
भगबान गीत
भजन
भूइयां के गीत
माधव ई नहि उचित विचार
मानिनि आब उचित नहि मान
लोचन धाय फोघायल
विबाहक गीत
षटपदी
सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ
सरसिज बिनु सर सर
ससन-परस रबसु अस्बर रे देखल धनि देह
सामरि हे झामरि तोर दहे
सैसव जौवन दुहु मिल गेल

अभिनव कोमल सुन्दर पात

अभिनव कोमल सुन्दर पात।
सगर कानन पहिरल पट रात।
मलय-पवन डोलय बहु भांति
अपन कुसुम रसे अपनहि माति।।
देखि-देखि माधव मन हुलसंत।
बिरिन्दावन भेल बेकत बसंत।।
कोकिल बोलाम साहर भार।
मदन पाओल जग नव अधिकार।।
पाइक मधुकर कर मधु पान।
भमि-भमि जोहय मानिनि-मान।।
दिसि-दिसि से भमि विपिन निहारि।
रास बुझावय मुदित मुरारि।
भनइ विद्यापति ई रस गाव।
राधा-माधव अभिनव भाव।।

अभिनव पल्लव बइसंक देल
अभिनव पल्लव बइसंक देल।
धवल कमल फुल पुरहर भेल।।
करु मकरंद मन्दाकिनि पानि।
अरुन असोग दीप दहु आनि।।
माह हे आजि दिवस पुनमन्त।।
करिअ चुमाओन राय बसन्त।।
संपुन सुधानिधि दधि भल भेल।
भगि-भगि भंगर हंकराय गेल।।
केसु कुसुम सिन्दुर सम भास।
केतकि धुलि बिथरहु पटबास।।
भनइ विद्यापति कवि कंठहार।
रस बझ सिवसिंह सिव अवतार।।

अम्बर बदन झपाबह गोरि

अम्बर बदन झपाबह गोरि।
राज सुनइ छिअ चांदक चोरि।।
घरे घरे पहरु गेल अछ जोहि।
अब ही दूखन लागत तोहि।।
कतय नुकायब चांदक चोरि।
जतहि नुकायब ततहि उजोरि।।
हास सुधारस न कर उजोर।
बनिक धनिक धन बोलब मोर।।
अधर समीप दसन कर जोति।
सिंदुर सीम बैसाउलि मोति।।
भनइ विद्यापति होहु निसंक।
चांदुह कां किछु लागु कलंक।।

आजु दोखिअ सखि बड़
आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन, बदन मलिन भेल तारो।
मन्द वचन तोहि कओन कहल अछि, से न कहिअ किअ मारो।
आजुक रयनि सखि कठि बितल अछि, कान्ह रभस कर मंदा।
गुण अवगुण पहु एकओ न बुझलनि, राहु गरासल चंदा।।
अधर सुखायल केस असझासल, धामे तिलक बहि गेला।
बारि विलासिनि केलि न जानथि, भाल अकण उड़ि गेला।।
भनइ विद्यापति सुनु बर यौवति, ताहि कहब किअ बाधे।
जे किछु पहुँ देल आंचर बान्हि लेल, सखि सभ कर उपहासे।।

आसक लता लगाओल सजनी
आसक लता लगाओल सजनी, नयनक नीर पटाय।
से फल आब परिनत भेल मजनी, आँचर तर न समाय।।
कांच सांच पहु देखि गेल सजनी, तसु मन भेल कुह भान।
दिन-दिन फल परिनत भेल सजनी, अहुनख कर न गेआना।
सबहक पहु परदेस बसु सजनी, आयल सुमिरि सिनेह।
हमर एहन पति निरदय सजनी, नहि मन बाढय नहे।।
भनइ विद्यापति गाओल सजनी, उचित आओत गुन साइ।
उठि बधाव करु मन भरि सजनी, अब आओत घर नाह।।

आहे सधि आहे सखि
आहे सधि आहे सखि लय जनि जाह।
हम अति बालिक आकुल नाह।।
गोट-गोट सखि सब गेलि बहराय।
ब केबाड पहु देलन्हि लगाय।।
ताहि अवसर कर धयलनि कंत।
चीर सम्हारइत जिब भेल अंत।।
नहि नहि करिअ नयन ढर नीर।
कांच कमल भमरा झिकझोर।।
जइसे डगमग नलिनिक नीर।
तइसे डगमग धनिक सरीर।।
भन विद्यापति सुनु कविराज।
आगि जारि पुनि आमिक लाज।।

ए धनि माननि करह संजात
ए धनि माननि करह संजात।
तुअ कुच हेमघाट हार भुजंगिनी ताक उपर धरु हाथ।।
तोंहे छाडि जदि हम परसब कोय। तुअ हार-नागिनि कारब माथे।।
हमर बचन यदि नहि परतीत। बुझि करह साति जे होय उचीत।।
भुज पास बांधि जघन तले तारि। पयोधर पाथर अदेह मारि।।
उप कारा बांधि राखह दिन-राति। विद्यापति कह उचित ई शादी।।
कंटक माझ कुसुम परगास
कंटक माझ कुसुम परगास।
भमर बिकल नहि पाबय पास।।
भमरा भेल कुरय सब ठाम।
तोहि बिनु मालति नहिं बिसराम।।
रसमति मालति पुनु पुनु देखि।
पिबय चाह मधु जीव उपेंखि।।
ओ मधुजीवि तोहें मधुरासि।
सांधि धरसि मधु मने न लजासि।।
अपने मने धनि बुझ अबगाही।
तोहर दूषन बध लागत काहि।।
भनहि विद्यापति तओं पए जीव।
अधर सुधारस जओं परपीब।।
कान्ह हेरल छल मन बड़ साध
कान्ह हेरल छल मन बड़ साध।
कान्ह हेरइत भेलएत परमाद।।
तबधरि अबुधि सुगुधि हो नारि।
कि कहि कि सुनि किछु बुझय न पारि।।
साओन घन सभ झर दु नयान।
अविरल धक-धक करय परान।।
की लागि सजनी दरसन भेल।
रभसें अपन जिब पर हाथ देल।।
न जानिअ किए करु मोहन चारे।
हेरइत जिब हरि लय गेल मारे।।
एत सब आदर गेल दरसाय।
जत बिसरिअ तत बिसरि न जाय।।
विद्यापति कह सुनु बर नारि।
धैरज धरु चित मिलब मुरारि।।

कामिनि करम सनाने
कामिनि करम सनाने
हेरितहि हृदय हनम पंचनाने।
चिकुर गरम जलधारा
मुख ससि डरे जनि रोअम अन्हारा।
कुच-जुग चारु चकेबा
निअ कुल मिलत आनि कोने देवा।
ते संकाएँ भुज-पासे
बांधि धयल उडि जायत अकासे।
तितल वसन तनु लागू
मुनिहुक विद्यापति गाबे
गुनमति धनि पुनमत जन पाबे।

कि कहब हे सखि रातुक
कि कहब हे सखि रातुक बात।
मानक पइल कुबानिक हाथ।।
काच कंचन नहि जानय मूल।
गुंजा रतन करय समतूल।।
जे किछु कभु नहि कला रस जान।
नीर खीर दुहु करय समान।।
तन्हि सएँ कइसन पिरिति रसाल।
बानर-कंठ कि सोतिय माल।।
भनइ विद्यापति एह रस जान।
बानर-मुह कि सोभय पान।।
कुंज भवन सएँ निकसलि
कुंज भवन सएँ निकसलि रे रोकल गिरिधारी।
एकहि नगर बसु माधव हे जनि करु बटमारी।।
छोड कान्ह मोर आंचर रे फाटत नब सारी।
अपजस होएत जगत भरि हे जानि करिअ उधारी।।
संगक सखि अगुआइलि रे हम एकसरि नारी।
दामिनि आय तुलायति हे एक राति अन्हारी।।
भनहि विद्यापति गाओल रे सुनु गुनमति नारी।
हरिक संग कछु डर नहि हे तोंहे परम गमारी।।

कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल
कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल।
चरन-चपल गति लोचन लेल।।
अब सब अन रह आँचर हाथ
लाजे सखीजन न पूछय बात।।
कि कहब माधव वयसक संधि।
हेरइत मानसिज मन रहु बंधि।।
तइअओ काम हृदय अनुपाम।
रोपल कलस ऊँच कम ठाम।।
सुनइत रस-कथा थापय चीत।
जइसे कुरंगिनि सुय संगीत।।
सैसव जीवन उपजल बाद।
केओ नहि मानय जय अवसाद।।
विद्यापति कौतुक बलिहारि।
सैसव से तनु छोडनहि पारि।।
के पतिआ लय जायत रे
के पतिआ लय जायत रे, मोरा पिअतम पास।
हिय नहि सहय असह दुखरे, भेल माओन मास।।
एकसरि भवन पिआ बिनु रे, मोहि रहलो न जाय।
सखि अनकर दुख दारुन रे, जग के पतिआय।।
मोर मन हरि लय गेल रे, अपनो मन गेल।
गोकुल तेजि मधुपुर बसु रे, कत अपजस लेल।।
विद्यापति कवि गाओल रे, धनि धरु मन मास।
आओत तोर मन भावन रे, एहि कातिक मास।।
गीत
जनम होअए जनु,जआं पुनि होइ।
जुबती भए जनमए जनु कोई।।
होइए जुबती जनु हो रसमंति।
रसओ बुझए जनु हो कुलमंति।।
निधन मांगओं बिहि एक पए तोहि।
थिरता दिहह अबसानहु मोहि।।
मिलओ सामि नागर रसधार।
परबस जन होअ हमर पिआर।।
परबस होइअ बुझिह बिचारि।
पाए बिचार हार कओन नारि।।
भनइ विद्यापति अछ परकार।
दंद-समुद होअ जिब दए पार।।

चन्दा जनि उग आजुक
चन्दा जनि उग आजुक राति।
पिया के लिखिअ पठाओब पांति।।
साओन सएँ हम करब पिरीति।
जत अभिमत अभि सारक रिति।।
अथवा राहु बुझाओब हंसी
पिबि जनु उगिलह सीतल ससी।।
कोटि रतन जलधर तोहें लेह।
आजुक रमनि धन तम कय देह।।
भनइ विद्यापति सुभ अभिसार।
भल जल करथइ परक उपकार।।

चानन भेल विषम सर रे
चानन भेल विषम सर रे, भुषन भेल भारी।
सपनहुँ नहि हरि आयल रे, गोकुल गिरधारी।।
एकसरि ठाठि कदम-तर रे, पछ हरेधि मुरारी।
हरि बिनु हृदय दगध भेल रे, झामर भेल सारी।।
जाह जाह तोहें उधब हे, तोहें मधुपुर जाहे।
चन्द्र बदनि नहि जीउति रे, बध लागत काह।।
कवि विद्यापति गाओल रे, सुनु गुनमति नारी।
आजु आओत हरि गोकुल रे, पथ चलु झटकारी।।
जखन लेल हरि कंचुअ अचोडि
जखन लेल हरि कंचुअ अचोडि
कत परि जुगुति कयलि अंग मोहि।।
तखनुक कहिनी कहल न जाय।
लाजे सुमुखि धनि रसलि लजाय।।
कर न मिझाय दूर दीप।
लाजे न मरय नारि कठजीव।।
अंकम कठिन सहय के पार।
कोमल हृदय उखडि गेल हार।।
भनह विद्यापति तखनुक झन।
कओन कहय सखि होयत बिहान।।

भावार्थ : – जब भगवान कृष्ण (हरि) ने कंचुकी (वस्र) बाहर कर दिया तब मैंने अपने शरीर की लाज बचाने के लिए क्या-क्या यत्न नहीं किए। उस समय की बात का क्या जिक्र कर्रूँ, मैं तो लाज (शर्म) से सिकुड़ गई अर्थात् लाज से पाठ (लकड़ी) के समान कठोर हो गई। जलता दिपक कुछ दूरी पर था, जिसे मैं हाथ से बुझा नहीं सकी। नारी कठ जीव (लकड़ी के समान) होती है, वह लाज से कदापि मर नही सकती। कठोर आलिंगन को कौन बर्दाश्त करे, इसलिए कोमल हृदय पर हार का दाग पड़ गया। महाकवि विद्यापति उस समय का रहस्य बताते है कि कोई भी यह नहीं कह रहा था कि आज भोर (प्रात:) होगी अर्थात् रात में तो सखी, ऐसा लग रहा था, जैसे सुबह होगी ही नहीं।

जनम होअए जनु
जनम होअए जनु, जओं पुनि होइ।
जुबती भए जनमए जनु कोइ ।।
होइए जुबति जनु हो रसमंति।
रसओ बुझए जनु हो कुलमंति।।
निधन मांगओं बिहि एक पए तोहि।
थिरता दिहह अबसानहु मोहि।।
मिलओ सामि नागर रसधार।
परबस जन होअ हमर पिआर।।
परबस होइए बुझिह बिचारि।
पाए बिचार हार कओन नारि।।
भनइ विद्यापति अछ परकार।
दंद-समुद होअ जिब दए पार।।
जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे
जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे, आगरि सुबुधि सेगानि।
कनकलता सनि सुनदरि सजनि में, विहि निरमाओलि आनि।।
हस्ति-गमन जकां चलइत सजनिगे, देखइत राजकुमारि।
जनिकर एहनि सोहागिनि सजनि में, पाओल पदरथ वारि।।
नील वसन तन घरेल सजनिगे, सिरलेल चिकुर सम्हारि।
तापर भमरा पिबय रस सजनिगे, बइसल आंखि पसारि।।
केहरि सम कटि गुन अछि सजनि में, लोचन अम्बुज धारि।।
विद्यापति कवि गाओलसजनि में, गुन पाओल अवधारि।।

भावार्थ :- आज सुन्दरि को राह चलते देखा। वो बुद्धिमती थी, चालाक थी, साथ ही साथ कलकलता के समान सुन्दर भी। विधाता ने काफी सोच-विचार करने के बाद उसका निर्माण (सृजन) किया है। हथिली के चाल में चलती ह किसी वैभवपूर्ण राजकुमारी जैसी लगती है। जिसे इस तरह की सुहागिन (पत्नी) मिलेगी उसे तो मानो चारों पदार्थ मिल जाएगा। वह अपने शरीर को नीले रंग के परिधान से ढ़क रखी थी। माथ के केस का भव्य एवं कलात्मक विन्यास बनाई थी। परन्तु उस पर भी भँवर निश्चिन्त होकर अपने पंख फैलाकर बैठकर उसका रसपान कर रहा था। शेरनी के समान पतलू कमर, कमल के समान नेत्र, आह! महाकवि विद्यापति उस सुन्दरि को गुण का सागर के रुप में देखे, अत: उन्होंने इस गीत का निर्माण किया।

जाइत पेखलि नहायलि गोरी
जाइत पेखलि नहायलि गोरी।
कल सएँ रुप धनि आनल चोरी।।
केस निगारहत बह जल धारा।
चमर गरय जनि मोतिम-हारा।।
तीतल अलक-बदन अति शोभा।
अलि कुल कमल बेढल मधुलोभा।।
नीर निरंजन लोचन राता।
सिंदुर मंडित जनि पंकज-पाता।।
सजल चीर रह पयोधर-सीमा।
कनक-बेल जनि पडि गेल हीमा।।
ओ नुकि करतहिं जाहि किय देहा।
अबहि छोडब मोहि तेजब नेहा।।
एसन रस नहि होसब आरा।
इहे लागि रोइ गरम जलधारा।।
विद्यापति कह सुनहु मुरारि।
वसन लागल भाव रुप निहारि।।

भावार्थ :- रास्ते में चलते-चलते एक सद्य: स्नाता सुन्दरि को देखा। न जाने इस नायिका ने कहाँ से यह रुप (विलक्षण) चुराकर लाई है? गीले केस (बाल) को निचोड़ते ही जल का धार टपकने लगा। चँवर से मानो मोती का हार चू रहा हो। भीगे हुए अलक के कारण मुखमण्डल अति सुन्दर (भव्य) लग रहा था, जैसे रस का लोभी भ्रमर मानो कमल को चारों ओर से घेर लिया है। काजल सही ढ़ंग से साफ हो गया था। आंखें एकदम लाल थी। ऐसा लग रहा था जैसे कमल के पत्ते पर किसी ने मिन्दुर घोल दिया है। भीगा वस्र स्तन के किनारे में था। लग रहा था कि जैसे सोने के बेल को पाल (सर्दी) मार दिया हो। वह (वस्र) छिपा-छिपा कर अपने शरीर को देख रही थी, जैसे अभी-अभी यह स्तन मुझे अलग कर देगा, मेरा स्नेह छोड़ देगा। अब मुझे ऐसा रस नहीं मिलेगा, इसीलिए शायद शरीर पर के बहते जल के धार रो रहा था। महाकवि विद्यापति कहते हैं कि हे कृष्ण, सौन्दर्य को देखकर वस्र को नायिका से स्नेह हो गया था।

जौवन रतन अछल दिन चारि
जौवन रतन अछल दिन चारि।
से देखि आदर कमल मुरारि।।
आवे भेल झाल कुसुम रस छूछ।
बारि बिहून सर केओ नहि पूछ।।
हमर ए विनीत कहब सखि राम।
सुपुरुष नेह अनत नहि होय।।
जावे से धन रह अपना हाथ।
ताबे से आदर कर संग-साथ।।
धनिकक आदर सबतह होय।
निरधन बापुर पूछ नहि कोय।।
भनइ विद्यापति राखब सील।
जओ जग जिबिए नब ओनिधि भील।।

नन्दनक नन्दन कदम्बक
नन्दनक नन्दन कदम्बक तरु तर, धिरे-धिरे मुरलि बजाब।
समय संकेत निकेतन बइसल, बेरि-बेरि बोलि पठाव।।
साभरि, तोहरा लागि अनुखन विकल मुरारि।
जमुनाक तिर उपवन उदवेगल, फिरि फिरि ततहि निहारि।।
गोरस बेचरा अबइत जाइत, जनि-जनि पुछ बनमारि।
तोंहे मतिमान, सुमति मधुसूदन, वचन सुनह किछु मोरा।
भनइ विद्यापति सुन बरजौवति, बन्दह नन्द किसोरा।।
बटगमनी
नव जौबन नव नागरि सजनी गे
नव तन नव अनुराग
पहु देखि मोरा मन बढ़ल सजनी गे
जेहेन गोपी चन्द्राल
बाधल वृद्ध पयोनित सजनी गे
कहि गेलाह जीवक आदि
कतेक दिन हेरब हुनक पथ सजनी गे
आब बैसलऊँ जी हारि
हम परलऊँ दुख-सागर सजनी गे
नागर हमर कठोर
जानि नहिं पड़ल एहेन सन सजनी गे
दग्ध करत जीब मोर
धरम जयनाथ गाओल सजनी गे
कियो जुनि करय प्रीति
धैरज धय रहु कलावति सजनी गे
आज करत पहु रीती

फरल लवंग दूपत भेल सजनी गे
फल-फूल लुबधल डारि
खोंइछा भरि तोरल फफरा भरि तोरल
सेज भरि देल छीरियाय
फूलक धमक पहुँ जागल सजनी गे रुसि चलल परदेस
बारह बरख पर लौटल सजनी गे
ककबा लैल सनेस ओहि ककबा लय थकरब सजनी गे
रुचि-रुचि कैल सींगार
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे
पुरुषक नहिं विश्वास

लट छल खुजल बयस सजनी गे
बैसल मांझ दुआरे
ताहि अवसर पहु आयल सजनी गे
देखल नयन पसारे
एक हाथ केस सम्हारल सजनी गे
अचरा दोसर हाथे
पहु के पलंग चढि बैसल सजनी गे
तखन करथि बलजोरे
नहिं-नहिं जओं हम भाखीय सजनी गे
तओं राखथि मन रोशे
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे पुरुषक यैह बढ़ दोषे।।

तरुणि बयस मोही बीतल सजनी गे
पहुँ बीसरल मोहि नामे
कुसुम फूलि-फूलि मौललि सजनी गे
भमरा लेल
बिश्रा में
चानन बुझि हम रोपल सजनि गे
हिरदय कोरि थल देल
नयनहुँ नीर पटाओल सजनी गे
आखिर सिम्मर भेल

ई दिन बड़ दुर्लभ छल सजनी गे
देखब नन्द-दुलारे
हरियर गोबर आंगन नीयब
धुपहिं देब गमकाई
करपुर लै हम पान लगाएब
नीरमल जल पीयाई
ई दिन बड़ दुर्लभ छल सजनी गे
देखब नन्द-दुलारे
लाल पलंग हम झारि ओझाएब
रुनुकि-झुनुकि हम पहुँ घर जायब
घूँघट लेब सम्हारि
भनहि विद्यापति गाओल सजनी गे
पुरुषक नहिं विश्वासे
ई दिन बड़ दुर्लभ छल सजनी गे
देखब नन्द-दुलारे

बारहमासा
साओनर साज ने भादवक दही।
आसिनक ओस ने कार्तिकक मही।।
अगहनक जीर ने पुषक धनी।
माधक मीसरी ने फागुनक चना।।
चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल।
जेठक चलब ने अषाढ़क बेल।।
कहे धन्वन्तरि अहि सबसँ बचे।
त वैदराज काहे पुरिया रचे।।

चानन रगड़ि सुहागिनी हे गेले फूलक हार।
सेनुरा सँ संगिया भरल अछि हे सुख मास अषाढ़।।
राजा गेलाह मृग मारन हे वन गेलाह शिकार।
जोगी एक ठाढ़ अंगना में हे रानी सुनि लीय बात हमार।।
द दिय भीक्षा जोगी के हे ओ त छोड़ता द्वार।।
सावन बड़ा सुख दावन हे दु:ख सहलो ने जाय।
इहो दुख होइहन्डु रानी कुब्जी के जो कन्त रखली लोभाय।।
भादब भरम भयावन हे गरजै ढ़हनाय
सबके बलम देखि घर में हे ककरा संग जाय
आसिन कुमर आबि गेल हे कि ओ आब ने जिथि
चीढ्ढी में लीखल वियोगिया हे हजमा हाथे देब
कातिक परबहिं लागि गेल हे गोरी-गंगा-स्नान
गंगा नहाय लट झारलऊँ हे सीथ लागे उदास
अगहन सारी लबीय गेल हे फुटि गेल सब रंग धान
प्रभुजी त छथि परदेसिया हे कियो भोगत आन
पुसहिं ओसहिं गिड़ि गेल हे भीजि गेल लाम्बी-लाम्बी केस
केसब सुखाबी ओसरबा हे सीथ लागे उदास
माघहि मास चतुर्दशी हे शीब-ब्रत तोहार
घुमि-फिरि अचलऊँ मन्दिरबा हे चित लागय उदास
फागुन फगुआ खेलबितऊँ हे निरमोहिया के साथ
प्रभुजी के हाथ पीचकारी हे उड़िते अतरी गुलाब
चैतहिं बेली फूलाय गेल हे फूलि गेल कुसुम गुलाब
फूलबा के हार गुथबितहुँ हे भेजितऊँ प्रभु के सनेश
वैसाखहिं बंसबा कटबितऊँ हे रचि बंगला छेबाय
ओहि दे बंगला बीच सुतितऊँ हे रसबेनिया डोलाय
जेठहिं मास भेंट भा गोल हे पिरि गेल बारह मास
प्रभुजी त एला जगरनाथ हे कन्त लीय समुझाय।।

चैत मास गृह अयोध्या त्यागल हानि से भीपति परी
अलख निरञ्जन पार उतरि गेल तपसी के वेश धरी
हो विकल रघुलाथ भये…..
कहाँ विलमस हनुमान विकल रघुलाथ भये।
धूप-दीप बिनु मन्दिर सुन्न भैल मास बैसाख चढ़ी
सीमा बीना मन्दिर भेल सुना बन बीच कुहकि रही
कहाँ विलमल हनुमान…..
जेठ वान लगे लछमन के धरनी से मरक्षि खसी
वैद्य सुखेन बताबय श्रीजमणि तब लछमन उबरी
हो विकल रघुनाथ भये…..
कहाँ विलमल हनुमान…..
राम सुमरि बीड़ापान उठायल धवलगिरि चली
मास अषाढ़ घटा-घन घहरे राम सुमरिक चली
हो विकल रघुनाथ भये…..
कहाँ विलमल हनुमान…..
साबन सर्व सुहावन रघुबन सजमनि लेख न पटी
दामिनि दमके तरस दिखाबे जब मोन सब घबरी
हो विकल रघुनाथ भये…..
कहाँ विलमल हनुमान…..
भादब परबत भोर उखारल बुन्दक मार परी
निसि अन्धयारी पंथ नहिं सूझल राम सुमरि क चली
हो विकल रघुनाथ भये…..
कहाँ विलमल हनुमान…..
आसिन मास देखे रघुबर जी देखि लथुमन हहरी
सीता सोचती सोचे रघुबरजी लछुमन सुधि बिसरी
हो विकल रघुनाथ…..
कहाँ विलमल हनुमान…..
अगहन रघुबर आशिष मांगथि हर्षित सब भई
ओहि अबसर अञ्जनिसुत अचला सब मोन हर्षित भई
हो विकल रघुनाथ भये…..
कहाँ विलमल हनुमान…..

अगहन दिन उत्तम सुख-सुन्दर घर-घर सारी समाय
रतन बयस सँ मोन सुख सुन्दर से छोड़ने कोना जायव
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
पूष कोठलिया ऊँच अटरिया, तकिया तुराय
अतर, गुलाब, सेन्ट गमकायब अतेक मजा कहाँ पाएब
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
माधक सेला सचे हूमेला जैब बिदेसर धाम
पान सुपारी जरदा खाएब घुमब शहर बजार
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
फागून फगुआ दूनू मिली खेलब घोरब रंग अबीर
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
अतर गुलाब, सेन्ट गमकाएब घोटि-घोटि धारब अबीर
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
चैतहिं बेली फुलय बनबेली, अद फुलय कचनार
सेहो फूल लोढि-लोढि हार बुनाएब भेजब पीयाजी के पास
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
बैसाखक ज्वाला करे मोन ब्योला सोने मुढी बेनिया डोलारब
कोमल हाथ सँ बेनिया डोलाएब अतेक मजा कहाँ पाएब
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
जेठहिं कान्त कतय गमाओल आयल अषाढ़क मास
लाल रे पलंगिया घरहिं ओछाएब सेवा करब अपार
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
सावन-भादब के मेघबा गरजै जुनि मेघ बरसु आजु
कोना क बालमु पार उतरताह नै रे नाव करुआर
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..
आसिन-कातिक के पर्व लगतु हैं सब सखी गंगा-स्नान
बिना बालमुजी के नीको ने लागय
पुरि गेल बारह मास
ललन ससुरारि छोड़ि कोना जाएब…..

चोआ चानन अंग लगाओल कामीनि कायल किंशगार
जे दिन मोहन मधउपुर गेलाह से दिन मास अखाढ़ रे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
उधो बारि रे बयस बीतल जाय
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
एक त गोरी बारी बयसिया
दोसर पीया परदेशिया
तेसर बून्द झलामलि बरसै
साबन अधिक कलेश
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
भादब हे सखी मरम भयाबन
दोसर राति अन्हार
लाका लौके बीजुरी चमके
ककरा मड़ैया हैब ठाढ़
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
आसिन हे सखि आस लगाओल
आस ने पुरल हमार
आसो जे पुरलन्हि कुब्जी सौतिनियाँ के
जे पाहुन रखल हमार
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
कातिक हे सखी पर्व लगत है
सब सखी गंगास्नान
सब सखी मीली गंगा नहाबीय
बीना पीया पर्व उदास
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
अगहन हे सखी सारी लबीय गेल
लबि गेल लोचन मोर
चिदई-चुनमुन सुखहिं खेपय
हम धनी बीरहा के मात
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
पुंसहिं हे सखी ओस खसथु हैं
भीजी गेल लाम्बी केस
सब रे सखी मीली सीरक भरेलऊँ
बीनु पीया जारो ने जाय
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
चैत हे सखी बेली फुलि गेल
फुलि गेल कुसुम गुलाब
ओहि फूलबा के हार गुथबितऊँ
मेजितऊँ पहुँजी के देस
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
बैसाख हे सखी गरमी लगतु हैं
सब सखी बंगला छेबाय
सब के सखी सब बंगला छबाइहो
बीनु पीया बंगला उदास
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..
जेठ हे सखी भेंट भय गेल
पुरि गेल बारह मास
हे कन्हैया के मनाय ने दीप…..

प्रीतम हमरो तेजने जाइ छी परदेशिया यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना…..
एक त साबन बीत गेल
दोसर भादब बीत गेल
तेसर बीतल जाइछै आसिन सन के मास यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना…..
कार्तिक चिठ्ठिया लीखाएब
अगहन पीया के मंगायब
पुस कुसलों ने बुझलऊँ परदेशिया यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना…..
माघ सीरक भरायब
फागून फगुआ खेलाएब
चैत चीतयो ने रहतई थीर यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना…..
बैसाख साड़ी हम रंगायब
जेठ पहीर पीया घर जायब
अखाढ़ बेनिया डोलाएब उमरेस में
धरबै जोगनीक भेष यौ ना…..
असाढ़ पुरि गेल बारह मास यौ
धरबै जोगनीक भेष यौ ना…..

बिरह गीत
सखी हम जीबन कोना कटबई
अयलाह से काल्हिये जेताह
नै साहब कान्हि सँ टिकुली
नै पहिरब चुड़ी ने बिजली
भमर सन केस अछि हमरो
सेहो बिनु तेल के रखबई
सखी हम जीबन कोना कटबई
अयलाह से काल्हिये जेताह
जहन चल अंग मे भुषण
तहन भ हम लेपबई
चमेली तेल के बदला
रुक्ख भ हम लेपबई
जखन अंगुली के आठो पर
गनै छलियई पीया अपोता
तहन माला के गोरी पर
पीया के नाम हम रटबई
जहन दिन-राति पलंगिया पर
पीया संग केलि हम केलयै
तहन बीरहा के बेदन में
पीया के नाम हम रटबई
सखी हम जीबन कोना कटबई
अयलाहे हो काल्हिये जेताह…..

बिसरही गीत
कोन मास नागपञ्चमी भेल
राम घरे-घरे बिसहरि पूजा लेल
काहुक घर बिसहरि दूध लाबा लेल
राम कहुक घर बिसहरि खीर भोजन लेल
भगता घर बिसहरि दूध लाबा लेल
राम सेबक घर बिसहरि खीर भोजन लेल
सावन मास नागपञ्चमी भेल
राम घर-घर बिसहरि पूजा लेल
जोरा छागर देब दन्त पान
राम बनहि देब घरबा करु विश्राम
बेलपत्र हरियर अरहुल लाल
राम चम्पा फूल फूलय माँ के
गला ग्रिमहार
पहीर ओढि मईया फड गेली ठाढि
राम सूर्यक ज्योति मलीन इड जाय
भनहि विद्यापति बिसहरि माय
राम सब दिन सब ठाय रहब सहाय

पीयर अंचला बिसहरि के लाम्बी-लाम्बी केस
राम अही बाहे जेती बिसहरि तरहुत देस
आंहु के सिंगार बिसहरि लाबा-दूध
राम हमर सिंगार अछि गोदी भरि पूत
तेल दे तेलिया भाई
दीप दे कुम्हार
राम बाती दे रे पटबा भैय
लेसब प्रहलाद
लागल दिया दयकि गेल बाती
राम खेलड लगली बिसहरि माय चारु पहर राति
भनहिं विद्यापति सुनु हे महेश
राम गौरी दाय के पांचो बेटी
हरथि कलेश
भगता गीत
ब्राह्मण

इनती करै छी हे ब्राह्मण मिनती करै छी
मिनती करै छी हे ब्राह्मण
कल जोरि करै छी परिणाम
धरम के दुअरिया हो ब्राह्मण
दाता दीनानाथ
कल जोरि करै छी परिणाम
अहर पंछ बीतलै हो ब्राह्मण
पहर पंथ बीतलै
ब्राह्मण छचिन्ह देबता
कल जोरि करै छी परिणाम
छप्पन कोरि देबता हो ब्राह्मण
धरम के दुअरिया
कल जोरि करै छी परिणाम
छप्पन कोरि देबता हो ब्राह्मण
रोकहि छी धरम के दुआरि
गाढ़ बिपत्ति परलै हो ब्राह्मण
बानहि घुमड लगतइ
कल जोरि करै छी परिणाम
अबला जानि खेलई छी हो ब्राह्मण
दाता दीनानाथ कल जोरी करै छी परिणाम
हँसइ खेलाबह हो ब्राह्मण, खैलालै चौपाड़ि
कल जोरि करै छी परिणाम
सुमिरन केलमै हो दाता दीनानाथ

भैरव

इनती करै छी भैरवनाथ
मिनती करै छी
हो भैरब कल जोरि करै छी परणाम… हे
हो भैरब…..
खेल धुप देखाबय हो भैरब,
हो भैरव एकबाली…..
भैरव दुआरि छी हो धरमक दुभारि
हो ओ ओ ओ ओ…..
डनिया जोगनीया भैरबनाथ
जाल तोरड लगतै
हो भैरब कल जोरि करै छी परणाम…..
कालरुप खलई छी हो भैरब
नीपै छी दुआरि हे हे…..ए
खेल-धुप करबै हो भैर बनाय डनीया जोगनीया
कल जोटि करै…..हे हे हे हे
कियै तूं लिखलैं बइमनमा रे
कहलो ने जाइये हे
गुण के लीयों ने सम्हारि यौ…..
डानि जकां खेलई छी भैरबनाथ
सुमिरन देलयै दाता रे दीनानाथ के
अहर पल बीतलै हो भैरब
पहर पल बीतलै
दाता दीनानाथ हो…..
हौ भैरबनाथ कल जोरि करै…..
चोर जकां खेलई छी भैरबनाथ
अबला हो सती कमला माय हे
जैरक बात भैरब एकबाली
हो भैरब कल जोरि…..
गलो नहि चलै हो भैरबनाथ डनिया जोगनिया
हो साबर मन्त्र मारिहइ सम्हारि कइ
साबरा मन्त्र जनि हे रे बौआ दाता दीनानाथ
हो भैरब कल जोरि…..

भगबती

गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
कते गुण सिखलऊँ परदेस में
आगे हमरा के छोड़लैं तीरहुत देस में गे
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गुनमा सिखौंलैं गे मईया
अपन दरबार में गे…..
आ कतइ जाक बैसलैं गे मिशचीनमा
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे मैया गे सैह मोन छलउ गे मैया
गुणमा नई सिखबीतैं
आब गाछ चढ़ाकइ छ जकां मारै छ्ैं
गे अम्मा बुढ़ी मईया
तेजबऊ परनमा तीरहुत देस में
गे अम्मा बुढ़ी मईया
आई तेजई छी गे मईया
आई तेजई छी गे परनमा
अपने बैसलैं कोन राज में
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
सोरिये के घेर में गे मईया
नूनमा जे खीलबितै गे
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
अबियऊ गे मईया अबियऊ तीरहुत देस में
कोना क हेतई बालकडे गुहरिया गे
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे मईया कोना घर में कनै छै हमरा मईया
कोन घर में कनै छै बहिनीया
आगै कोने घर में कनै छै भगता इसतीरीया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
आगे गोसाडनिक घर में माई जे कानै छै
ओसरा कानै गै बहीनीया
कोने चार कानै भगता इसतीरीया गे
गे अम्मा बुढ़ी मईया
गे अम्मा बुढ़ी मईया
भगबती गीत
दया करु एक बेर हे माता
कृपा करु एक बेर
जहियाँ सँ माता आहाँ घर अयलऊँ
दुख छोड़ि सुख नहिं भेल
हे जननी दया करु एक बेर
हे जननी…..
जहिया सँ माता सुख देखइ लगलऊँ
नग्र में भइ गेल शोर
हे जननी…..
कोने फुल ओढ़न माँ के
कोन फुल पहिरन
कोने फुल सोलहो सिंगार
हे जननी दया करु एक बेर
हे जननी…..
बेली फुल ओढ़न माँ के
चमेली फुल पहिरन
अरहुल फुल सोलहो सिंगार
हे जननी…..
हे जननी दया…..
पहिरी-ओढि काली कहवर गेली
कुरय लगली अबला गोहारि
हे जननी…..
हे जननी दया करु…..

कोने फुल फुलनि माँ के आधी-आधी रतिया
हे जगतारिण माँ के…..
कोने फुल फुलनि भिनसरिया
हे जगतारिण माँ के…..
बेली फुल फुलनि माँ के आधी-आधई रतिया
हे जगतारिण माँ के…..
चमेली फुल फुलनि भिनसरिया
हे जगतारिण माँ के…..
पहिर-ओढि काली गहवर ठाढि भेली
करय लगली अबला के गोहारि
हे जगतारिण माँ के…..

जगदम्ब अहीं अबिलम्ब हमर
हे माय आहाँ बिनु आश ककर
जँ माय आहाँ दुख नहिं सुनबई
त जाय कहु ककरा कहबै
करु माफ जननी अपराध हमर
हे माय आहाँ बिनु आश ककर
हम भरि जग सँ ठुकरायल छी
माँ अहींक शरण में आयल छी
देखु हम परलऊँ बीच भमर
हे माय आहाँ बिनु आश ककर
काली लक्षमी कल्याणी छी
तारा अम्बे ब्रह्माणी छी
अछि पुत्र-कपुत्र बनल दुभर
हे माय आहाँ बिनु आश ककर
जगदम्ब…..

भगबती चरनार बन्दिति की महा महिमा निहारु
भगबती वनरुप काली हुललि रण में भय कराली
भगबती दैरु बिपत्ति में
सिन्धु सँ हमरा उबारु
भगबती चरनार बन्दिति की महा महिमा निहारु
कटीय असुर सीर खप-खप
चाटि शोणित लाल-लप-लप
हारि छल रहलाह हमर गण
विकलता के क्रम निहारु
भगबती चरनार बन्दिति की महा महिमा निहारु
फूल जल चन्दन चढ़ेलऊँ
बीनती जय संगीत गयलहुँ
भगबती चरनार बन्दिति की महा महिमा निहारु

हे जननी आहाँ जन्म सुफल करु
पूजा करब हे अम्बे
जशोदा-नन्दिनि त्रिभुवन वन्दिनि
असुर निकन्दनि हे देबी
हे जननी…..
पूजा करब…..
पुष्प-कमल पर चरण बिराजै
माया दृष्टि करु हे देबी
हे जननी…..
पूजा करब…..
आँचर पसारि हम पुत्र मंगै छी
आब ध्यान दिय हे अम्बे
हे जननी…..
पूजा करब हे देबी

जयति जय माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके
सघन घन सँ मुक्ति कुन्तल भाल शोभित चण्डिके
जयति जय माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके
हार मुण्डक हृदय शोभित श्रवण कुण्डल मण्डिते
जयति जय माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके
बिकट आशन घोर बदने चपल रसने कालिके
खर्ग खप्पर करहिं शोभित भति प्रण के पालिके
जयति जय माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके
घनन-घन-घन नूपूरु गुञ्जित कपल पद लट राजिते
दीप अभय वरदायिनी माँ जयति जय अपराजिते
जयति जय माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके
सघन घन सँ मुक्ति कुन्तल भाल शोभित चण्डिके

भजै छी तारिणी सब दिन कियै छी दृष्टि के झपने
जयन्ति मंगला काली शिबा-शिव नाम थीक अपने
ने जानी नाम ने भ्रम सँ कदाचित् दोसरो सपने
भजै छी तारिणी सब दिन कियै छी दृष्टि के झपने
कहब हम जाय ककरा सँ अपन दुख दीनता थपने
शरण एक अछि अहिंक अम्बे होयत की आन लग कनने
कयह जगदीश सब दिन सँ भगत प्रतिपालिका अपने
भजै छी तारिणी सब दिन कियै छी दृष्टि के झपने

बारह बरष पर काली जेती नैहर
बारह बरष पर माता जेती नैहर
माहे बिनु रे कहारे कोना जेती
लाले-लाले डोलिया में सबजे रंग ओहरिया हे
माहे लागि गेल बतसो कहारे
एक कोष गेली काली दूई कोष गेली हे
माहे तेसर कोष लागल पीयासे
ओहार उठाये काली चारु दीसी त्कथि
माहे कतहु ने लागल बजारे
जांघिया के चीरी काली शोणित पिलनि
माहे राखल जगत्र कर माने
भनहि विद्यापति सुनू माता काली हे
माँ हे सरा सँ दहब रक्षपाले।

जनम भूमि अछि मिथिला सम्हारु हे माँ
कनि आबि अपन नैहर निहारु हे माँ
माँ बच्चे सँ महिमा जनई छी
अम्बे-अम्बे कट हरदम रटई छी
शक्तिशाली अपन महिमा देखाऊ हे माँ
कनि आबि अपन नैहर निहारु हे माँ
अछि बीच भंवर में नाब डुबल
ओकर कियौ ने खबनहारी हे माँ
कनि आबि अपन नैहर निहारु हे माँ
अछि बालक आहाँके दुआरे पर ठार
ओकर विद्या के भरि दीप भण्डार हे माँ
कनि आबि अपन नैहर निहारु हे माँ

लाले-लाले आहुल के माला बनेलऊँ
गरदनि लगा लीचड माँ
हे माँ गरदनि लग लीचड माँ
हम सब छी धीया-पूता आहाँ महामाया
आहाँ नई करबै त करतै के दाया
ज्ञान बिनु माटिक मुरति सन ई काया
तकरा जगा दिया माँ
लाले-लाले आहुल के माला बनेलऊँ
गरदनि लगा लीचड माँ
कोठा-अटारी ने चाही हे मइया
चाही सिनेह नीक लागै मड़ैया
ज्ञान बिनु माटिक मुरुत सन ई काया
तकरा जगा दिया माँ…..
आनन ने चानन कुसुम सन श्रींगार
सुनलऊँ जे मइया ममता अपार
भवन सँ जीवन पर दीप-दीप पहार भार
तकरा हटा दिय माँ…..
लाले-लाले आहुल के माला बनेलऊँ
गरदनि लगा लीचड माँ
सगरो चराचर अहींकेर रचना
सुनबई अहाँ नै त सुनतै के अदना
भावक भरल जल नयना हमर माँ
चरनऊ लगा लीचड माँ…..
लाले-लाले आहुल के माला बनेलऊँ
गरदनि लगा लीचड माँ

क्यों देर करती श्रीभवानी मैं तो बुद्धिक हीन हे माँ
दाँत झक-झक हँसछि खल-खल
मुख में पाकल पान हे माँ
दमसि बैसलि असूर दलमे काटथि मुण्ड हमार हे माँ
बाम करकट लेल खप्पर
दहिना हाथ तलवार हे माँ
दमसि बैसलि असूर दलमे काटथि मुण्ड हमार हे माँ
क्यों देर करती श्रीमवानी मैं तो बुद्धिक हीन हे माँ
कहथि काली सुनू हे दुर्गे
अब त करीय उबार हे माँ
तीन लोक के मातु दुर्गा दिय अभय बरदान हे माँ
क्यों देर करती श्रीमवानी मैं तो बुद्धिक हीन हे माँ

दिय भक्ति के दान जगदम्बे हम जेबै कतइ हे अम्बे
पुत्र गलती अनेको करै छई ओकरा माता ने एकौ धरै छै
दिय-दिय सहारा हे अम्बे हम जेबइ करइ हे अम्बे
दिय भक्ति के दान जगदम्बे हम जेबै कतइ हे अम्बे
नैया डुबल छै बीच भँवर में
हमरा शक्ति नहि छै कमर में
दिय-दिय सहारा हे अम्बे हम जेबइ करइ हे अम्बे
दैरल-दैरल अयलऊँ हे अम्बे
करिमऊ हमरा माफ हे जगदम्बे
दिय भक्ति के दान जगदम्बे हम जेबै कतइ हे अम्बे

सासु रुसल मैया हम्मर काली एली काली
सासु कोने कारण रुसलै गे मोरा मैया काली
अब नैहरा लेने जाय हे मैया काली
बीचहिं में मिललई रे दैवा जमुना नरी हे मैया काली
नदी धार बीचहिं में मिललई रे दैवा दजमुा नदी
नहिं छै नैया गे मईया काली
नैया जे बनेबई गे मैया काली
चानन के छाबि का हे काली
बनेबई हे करुमारि हे मैया काली
मैया नाब चढि क हे काली
ओहि चढि उतरब जमुना पार हे मईया काली
कोने नैया खबई हे मलहबा कोने भसियाबई
हे काली नदी धार
पार उतरब हे मैया काली
जमुना नदी के नदी धार

भगबान गीत
हरी के मोहनी मुरतीया में मोन लागल हे सखी
छाती छबि में भेल विभोर
जहिना बिलखथि चन्द्र-चकोर
हमरा जुलमी नजरिया केलक पागल हे सखी
हरी के मोहनी मुरतीया में मोन लागल हे सखी
मोहन मृदु-मृदु मुस्कान
मुख लागल मृदु बान
कारी केसिया में अंखियां ओझराएल हे सखई
हरी के मोहनी मुरतीया में मोन लागल हे सखी
सोचन कोमल कुमल समान
जहिना नील गगन केर तान
कारी केसिया में अंखिया ओझरायल हे सखी
हरी के मोहनी मुरतीया में मोन लागल हे सखी

भजु राधे कृष्णा गोकुल में अबध-बिहारी
द्वापर में रही जनम लीये हैं त्रेता कंस पछारी
पाँव धुबति आहिल्या तर गयी कुबाजापति गिरधारी
भजु राधे कृष्ण…..
कहाँ रामके धनुष बीराजे कहाँ मटुक सीर भारी
कोन भाग में सीता बीराजे कहाँ राधा प्यारी
भजु राधे कृष्ण…..
इहाँ रामके धनुष बीराजे वहाँ मटुक बड़ भारी
बामा भागमें सीता बीराजे दहिना राधा प्यारी
भजु राधे कृष्णम गोकुल में अबध-बिहारी
घघन क्रोटि मेघ बरिसन लागे रक्षा करु गिरधारी
एकहुँ बुन्द नहिं पड़य मथुरा में
इन्द्र बैसल हीय हारी
भजु राधे कृष्ण…..
सूतल देबकी सूतन सुत-नन्दन रक्षा करु गिरधारी
उग्रसेन के राज दियो हैं काल कंस के मारी
भजु राधे कृष्ण…..
कहाँ के हरी दधी बेयतु हैं कहाँ के ब्रजनारी
लुटि-लुटि कहै कृष्ण कन्हाई अब जुनि करीय उघारी
भजु राधे कृष्ण…..
रावन मारि राम गृह आजोल
कृष्ण कहे धनबाजि
भजु राधे कृष्ण गोकुल में अवध बिहारी

भजन
तीलक लगौने धनुष कान्ह पर टूटा बालक ठाढ़ छै
घुमि रहल छै जनकबाग में फूल तोरथ लेल ठाढ़ छै
श्याम रंग जे सबसँ सन्नर से सबहक सरदार छै
नाम पुछई छै राम कहै छै अबध के राजकुमार छै
धनुष प्रतीज्ञा कैल जनकजी के पूरा केनीहार छै
देस-देस के नृप आबि कढ धनैत अपन कघर छै
कियो बीर नहि बुझि पड़ै जछि तँ जनक के धिक्कार छै
एतबा सुनतहिं बजला लक्ष्मण ई कोन कठि पहार छै
बुझबा में नहिं अयलन्हि जनक कें एहि ठाम शेषावगर छै
चुटकी सँ मलि देब धनुष के ई त बड़ निस्सार छै
उठि क विश्वामित्र तखन सँ रा के करैत ठाढ़ छै
जखनहिं राम उठोलन्हि धनुष मचि गेल जय-जय कार छै
धन्य राम छथि धन्य लखनजी जानैत भरि संसार छै
साजि सखी के संग सीयाजी हाथ लेने जयमाल छै
तीलक लगौने धनुष कान्ह पर टूटा बालक ठाढ़ छै

सबरी के बैर सुदामा के तण्डुल
रुचि-रुचि भोग लगाबायन
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..
दुर्योधन के घर मेवा त्यागि प्रभु
साग विदुर घर पाबायन
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..
ग्याल-बाल जब डूबन लागै प्रभु
हरिजी के नाम उचारायण
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..
गज और ग्राह लड़ै जल भीतर
लड़लि-लड़लि गज हारायण
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..
नाक-कान जब डूबन लागै प्रभु
हरिजी के नाम उचारायण
हरिजी के नाम पुकारायन
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..
गज के हेर सुनय यदुनन्दन
पांव पैदल उठि धाबायन
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..
नारायण के चरण-कमल पर
सुमरि-सुमरि भन पारायण
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..
ग्राह के आहि गजराज उबारे स्वामी
भक्तवत्सल कहलाबायन
शिब नारायण-नारायण-नारायण…..

सीताराम सँ मिलान कोना हैत
रे अन्देशबा लागि रही
राधे-श्याम सँ मिलान कोना हैत
रे अन्देशबा लागि रही
पैरो सँ तीर्थ कहियो ने कयलऊँ
कलजोरि किछु ने दाने
मुख सँ राम कहियो ने रलटऊँ
मोरा मोन भरल गुमाने
रे अन्देशबा लागि रही
सीता-राम सँ…..
हरी मिलत हैं बहुत भाग्य सँ
अधिक कठिनक बात
रे अन्देशबा लागि रही
कथी केर दीप कथी केर बाती नरय लागत दिन राति
जारि गेल दीप मिझा गेल बाती
मुरख रहल पछताय
रे अन्देशबा लागि रही
सीता-राम सँ मिलान कोना हैत रे
रे अन्देशबा लागि रही

भजन कबीर नीर्गुण

सबरी के अंगना में साधु-संत अयलखिन्ह
उठि सबरी नोर हे चरण हे पखाड़ि
सबरी चन्द्रामृत हे लेलखिन्ह लय-लय भवन छेतार
सबरी के अंगना में साधु-संत अयलखिन्ह
उठि सबरी नोर रे बहाय…..
माय तोरा हांटऊ सबरी
बाप तोरा बरजऊ है
आहे छोड़ू सबरी
साधु-सन्त साथ
सब समाज मिलि कड एक मत केलकिन्ह
राम एकमत केलकिन्ह
आहे सबरी के दियौ बनबास
झालि खजुरिया सबरी
आब काँखि जाबि लेलकई
काँकि दाबि लेलकई
भजन करैते रमि हे जाई
माय तोरा बरजऊ सबरी
बाप तोरा बरजऊ हे
छोड़ू सबरी साधु-सन्त के साथ
हिली लीयौ मिली हे लीयौ
संग के सखी सब
आहे भजन करैते रमि हे जाय
साहेब कबीर गेलन्हि नीरगुणिया हे
सन्तो भाई जानि लीयौ ने बिचारि
आब सन्तो भैया लीयौ ने बिचारि

कोने नगरिया एलइ बरियतिया सुनु मोर साजन हे
कोने नगरिया भड गेल शोर सुन मोरा साजन हे
कै लाख हाथी आबै कै लाख धोरबा
सुनु मोरा साजन हे…..
कै लाख पैदल बरियतिया
सुनु मोरा साजन हे…..
एक लाख हाथ आबै
सवा लाख छोड़बा
सुनु मोरा साजन हे…..
सबा लाख पैदल बरियतिया
सुनु मोरा साजन हे…..
कथिये चढ़ल आबै
कथिये चढ़ल आबै
दशरथ रसिलबा
सुनु मोरा साजन हे…..
कथिये चढ़ल आबै
लक्षुमन राम
सुनु मोरा साजन हे…..
हाथिये चढ़ल आबै
दशरथ रसिलबा
सुनु मोरा साजन हे…..
घोड़बे चढ़ल लक्षमण राम
सुनु मोरा साजन हे…..

भूइयां के गीत
कोने लोक आहे भूईयां लकड़ी चुनै छी आहे राम
कोने जे बन-बन में गुनी रमबै छी हो आहे राम
कोने वन में आहो भूइयां लकड़ी चुनै छी हाथे राम
आहो राम लकड़ी चुनै छई हो आहो राम
कोने हे वन में गुनिया रमाबै छी हो आहे राम
कछी लेल आहो भूइयां लकड़ी चुनै छह आहे राम
कथी लेल भईया बाबा गुनिया बाबा रमबई छै हाय राम
लड्डू लोये दादा धुनियां रमबई छै हाये राम
कथी भेलई, कियाएक भेलई घरैतीन आहो राम
आहो राम घरके घरैतीन आहो राम
राम चल लगलै भूइयां मैया अपने नगरिये हाये राम
घड़ी एक चलई पहर बेरा बीतलई हाये राम
राम पहुँच गेलइ भूइयां जोगिया नगरिये हाये राम
एक दीश करै भूइयां दूध स्नान में हाय राम
एक दीश चढ़ाबै भूइयां अपन लडू हाय राम

हई कुसुम बेली चढ़ई ताके मईया गे सुरेसरी
महावीर हो कतेक दूर चल अइली हो
महाबीर हो कतेक आबै बड़ी हो बात
कहमा बसेबई बाबू हो आजन हो बाजन
महाबीर हो कहमा बसेबइ हो बड़ी बात
महादेब हो कहमा बसेबई हो बरियात
दुआरे बसेबई आजन हो बाजन
महाबीर हो दुअरे बसेबई बरियात
किये पानी देबई हम आजन हो बाजन
महादेब हो किये पानी देबई हो बरियात
किये भोजन देबई हम आजन हो बाजन
महादेब हो किये भोजन देबै हो बरियात
दालि भात देबै हम आजन हो बाजन
महादेब हो चूरे दही देबई बरियात

माधव ई नहि उचित विचार
माधव ई नहि उचित विचार।
जनिक एहनि धनि काम-कला सनि से किअ करु बेभिचार।।
प्रनहु चाहि अधिक कय मानय हदयक हार समाने।
कोन परि जुगुति आनके ताकह की थिक तोहरे गेआने।।
कृपिन पुरुषके केओ नहि निक कह जग भरि कर उपहासे।
निज धन अछइत नहि उपभोगब केवल परहिक आसे।।
भनइ विद्यापति सुनु मथुरापति ई थिक अनुचित काज।
मांगि लायब बित से जदि हो नित अपन करब कोन काज।।
मानिनि आब उचित नहि मान
मानिनि आब उचित नहि मान।
एखनुक रंग एहन सन लागय जागल पए पंचबान।।
जूडि रयनि चकमक करन चांदनि एहन समय नहि आन।
एहि अवसर पिय मिलन जेहन सुख जकाहि होय से जान।।
रभसि रभसि अलि बिलसि बिलसि कलि करय मधु पान।
अपन-अपन पहु सबहु जेमाओल भूखल तुऊ जजमान।।
त्रिबलि तरंग सितासित संगम उरज सम्भु निरमान।
आरति पति मंगइछ परति ग्रह करु धनि सरबस दान।।
दीप-बाति सम भिर न रहम मन दिढ करु अपन गेयान।
संचित मदन बेदन अति दारुन विद्यापति कवि भान।।

भावार्थ : – हे नायिका! अब अर्थ इतना भी रुसना-फुलना उचित नहीं है। इन बातों को अब छोड़ भी दो। देखो तो, ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे कामदेव अपने पांच बाणों के साथ जग चुके हों। रात कितना आकर्षक लग रहा है। चारों तरफ स्पष्ट दिखाई दे रहा है (शुक्ल पक्ष अपनी चढ़ाव में जो है)। इससे अच्छा (उपयुक्त) पला भला और क्या हो सकता (अभिसार के लिए) है। इस मनोनुकूल क्षण में प्रियतम से मिलन का जो आनन्द मिलता है उसका अनुभव (अनुमान) वही कर सकता है, जिसने ऐसे पल को कभी भोगा है। भँवर रस से हुए मदमत होकर कली को तोर रहा है, मधुपान कर रहा है। दोनों तरफ से कहीं कोई अवरोध नहीं है। अर्थात् सभी अपने-अपने प्रियतम की भूख मिटा चुके हैं, केवल तुम्हारा प्रियतम अभी तक भूखा है। तुम्हारे नाभि के ऊपर में लहर तरंगित है। संगम पर अवस्थित दोनों स्तन (छाती) शिव-शम्भु के समान लग रहे हैं। इस तरह के अवसर पर तुम्हारा प्रियतम आर्त होकर खड़े हैं। तुमसे कुछ मांग रहा है- याचक मुद्रा में। हे मानिनि (नायिका), तुम ऐसे पल में अपना सर्व दान कर दो। अब भी अपने मन को दृढ़ करो। इस चंचल मन का क्या भरोसा! यह तो दीपक के बाती जैसे हमेशा काँपता रहेगा। महाकवि विद्यापति ऐसी स्थिति का बोध कराते हुए कहते हैं कि कामेच्छा अत्यधिक मात्रा में एकत्रित हो जाने पर बहुत कष्ट देता है।

लोचन धाय फोघायल
लोचन धाय फोघायल हरि नहिं आयल रे।
सिव-सिव जिव नहिं जाय आस अरुझायल रे।।
मन कर तहाँ उडि जाइ जहाँ हरि पाइअ रे।
पेम-परसमनि-पानि आनि उर लाइअ रे।।
सपनहु संगम पाओल रंग बढाओलरे।
से मोर बिहि विघटाओल निन्दओ हेराओल रे।।
सुकवि विद्यापति गओल धनि धइरज धरु रे।
अचिरे मिलत तोर बालमु पुरत मनोरथ रे।।

विबाहक गीत
मचिये बैसल तोहें राजा हेमन्त ॠषि
सुनु आहाँ बचन हमार गे माई
गौरी कुमारी कते दिन रहता
ई नहिं उचित विचार गे माई
एतबा बचन जब सुलनि हेमन्त ॠषि
आबछु पण्डित गुनि देथु धीया के बियाह गे माई
एक पोथी ताकल पण्डित
दोसर पोथी तकलन्हि
तेसर पोछी तकलन्हि पुरान गे माई
ओही जंगल में जोगी एक बैसल
तिनका सँ हेतन्हि बियाह गे माई
आरही बन सँ खरही कटाओल
बृन्दावन बिंट बांस गे माई
देब पीतर मिलि मण्डप छारल
होबड लागल गौरी के बियाह गे माई
एक दिश बैसलाह नारद ब्राह्मण
दोसर दिश गौरी के ब्प गे माई
बाधक छाल पर बैसलाह महादेव
होबड लागल गौरी के बियाह गे माई
कन्यादान कम उटलाह हेमन्त ॠषि
सोती जकाँ झहरनि नोर गे माई
कियै जि खेलऊँ बेटी कियै जे पहिरलौं
कथी लेल भेलऊँ विरान गे माई
खीर जे खेलऊँ बाबा चीर पहिरलऊँ
सिन्दुरा लै भेलौं विरान गे माई

अयलऊँ हे बड़का बाबा
नगरा तोहार हे
अयलऊ हे सब बाबा
नगरा तोहार हे
बिलह हे सब बाबी
सिनुरा पीठार हे
अयलऊँ हे सब काका
नगरा तोहार हे
बिलहहे सब काकी
सिनुरा पीठार हे
अयलऊँ हे अप्पन बाबा
नग्र तोहार हे
बिलह हे अप्पन अम्मा
सिनुर पीठार हे
माथ चुमी-चुमी
दियड ने आशीष हे
जीबड हे दुलहीन
लाख बरीस हे
षटपदी
बहुले भाँति वणिजार हाट हिण्डए जवे आवथि।
खने एके सवे विक्कणथि सवे किछु किनइते पावथि।
सव दिसँ पसरू पसार रूप जोवण गुणे आगरि।
बानिनि वीथी माँडि वइस सए सहसहि नाअरि।
सम्भाषण किथु वेआजइ तासओ कहिनी सब्ब कह।
विक्कणइ वेसाइह अप्प सुखे डीठि कुतूहल लाभ रह।
सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ
सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ।
रोपि पेम बिज अंकुर मूड़ल बांढब कओने उपाइ।।
तेल-बिन्दु दस पानि पसारिअ ऐरान तोर अनुराग।
सिकता जल जस छनहि सुखायल ऐसन तोर सोहाग।।
कुल-कामिली छलौं कुलटा भय गेलौं तनिकर बचन लोभाइ।
अपेनहि करें हमें मूंड मूडाओल कान्ह सेआ पेम बढ़ाइ।।
चोर रमनि जनि मने-मने रोइअ अम्बर बदन भपाइ।
दीपक लोभ सलभ जनि घायल से फल पाओल घाइ।।
भनइ विद्यापति ई कलयुग रिति चिन्ता करइ न कोई।
अपन करम-दोष आपहि भोगइ जो जनमान्तर होइ।।

सरसिज बिनु सर सर
सरसिज बिनु सर सर बिनु सरसिज, की सरसिज बिनु सूरे।
जौबन बिनु तन, तन बिनु जौबन की जौक पिअ दूरे।।
सखि हे मोर बड दैब विरोधी।
मदन बोदन बड पिया मोर बोलछड, अबहु देहे परबोधी।।
चौदिस भमर भम कुसुम-कुसुम रम, नीरसि भाजरि पीबे।
मंद पवन बह, पिक कुहु-कुहु कह, सुनि विरहिनि कइसे जीवे।।
सिनेह अछत जत, हमे भेल न टुटत, बड बोल जत सबथीर।
अइसन के बोल दुहु निज सिम तेजि कहु, उछल पयोनिधि नीरा।।
भनइ विद्यापति अरे रे कमलमुखि, गुनगाहक पिय तोरा।
राजा सिवसिंह रुपानरायन, रहजे एको नहि भोरा।।

ससन-परस रबसु अस्बर रे देखल धनि देह
ससन-परस रबसु अस्बर रे देखल धनि देह।
नव जलधर तर चमकय रे जनि बिजुरी-रेह।।
आजु देखलि धनि जाइत रे मोहि उपजल रंग।
कनकलता जनि संचर रे महि निर अवलम्ब।।
ता पुन अपरुब देखल रे कुच-जुग अरविन्द।
विकसित नहि किछुकारन रे सोझा मुख चन्द।।
विद्यापति कवि गाओल रे रस बुझ रसमन्त।
देवसिंह नृप नागर रे, हासिनि देइ कन्त।।

भावार्थ :- हवा के स्पर्श से वस्र नीचे गिर गया, इसीलिए धनि (नायिका) के शरीर (देह) को देख पाया। ऐसा लगा जैसे मेघ के अन्दर से बिजली चमक उठा हो। आज मैंने नायिका के जाते देखा जिसे देखकर मेरे अन्दर अनुराग उमड़ आया। उसको देखकर मुझे ऐसा लगा कि पृथ्वी पर कोई कनकलता भ्रमण कर रही हो। पुन: एक आश्चर्य देखा कि उस कनकलता में स्तन-युगल रुपी कमल विद्यमान था, परन्तु वह खिला हुआ नहीं था। नहीं खलने का कारण था- सामने में मुख रुपी चान्द। अर्थात् कमल सूर्य के समक्ष खिलता है परन्तु चन्देरोरयय होते ही बव्द हो जाता है। महाकवि विद्यापति इक पद को गाते हुए कहते हैं कि इसका रस-मर्म कोई रसिक ही समझ सकता है। हामिनीदेवी के पतिदेव राजा देवसिंह बहुत बड़े रसिक हैं।
सामरि हे झामरि तोर दहेह
सामरि हे झामरि तोर दहे।
कह कह कासँए लायलि नहे।।
निन्दे भरल अछि लोचन तोर।
कोमल बदन कमल रुचि चारे।।
निरस धुसर करु अधर पँवार।
कोन कुबुधि लुतु मदन-भंडार।।
कोन कुमति कुच नख-खतदेल।
हा-हा सम्भु भागन भेय गेल।।
दमन-लता सम तनु सुकुमार।
फूटल बलय टुटल गुमहार।।
केस कुसुम तोर सिरक सिन्दूर।
अलक तिलक हे सेहो गेल दूर।।
भनइ विद्यापति रति अवसान।
राजा सिंवसिंह ईरस जान।।

सैसव जौवन दुहु मिल गेल
सैसव जौवन दुहु मिल गेल। श्रवनक पथ दुहु लोचन लेल।।

वचनक चातुरि नहु-नहु हास। धरनिये चान कयल परकास।।

मुकुर हाथ लय करय सिंगार। सखि पूछय कइसे सुरत-विहार।।

निरजन उरज हेरत कत बेरि। बिहुँसय अपन पयोधर हेरि।।

पहिले बदरि सम पुन नवरंग। दिन-दिन अनंग अगोरल अंग।।

माधव देखल अपरूब बाला। सैसव जौवन दुहु एक भेला।।

विद्यापति कह तुहु अगेआनि। दुहु एक जोग इह के कह सयानि।।

मैथिली गीत&rdquo पर एक विचार;

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