आपका स्वागत है हिंदी की अनोखी दुनिया “हिंदी पटल” में…


Hindi_Patal

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन, पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

हमने इक शाम चराग़ों से सजा रक्खी है, शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रक्खी है.

हिन्दी पटल का उद्देश्य – हिन्दी में विविध सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास!

शब्द से संसार की सृष्टि, स्थिति और लय भी है। शिव का तांडवनृत्य विशाल विश्व को अपने नृत्य की ध्वनि प्रतिध्वनियों से पदाघात के नाद से ही तो नष्ट करता है। यह संसार हम और हमारा यह जीवन शब्द ही तो हैं। शब्द ही हम हैं, वे ही हमारा अस्तित्व हैं।

भाषा वैज्ञानिक हमें शब्द देते हैं, लेकिन साहित्यकार उन शब्दों को चुनकर एक रचना को जन्म देते हैं। भाषा वैज्ञानिक वाक्य संरचना का ज्ञान कराते हैं, लेकिन साहित्यकार वाक्य का अर्थ सुरक्षित रखते हुए रचना में लालित्य पैदा करते हैं। भाषा वैज्ञानिक लेखन में भाषा अनुशासन का पाठ पढाते हैं लेकिन साहित्यकार किसी भी भाषायी अनुशासन से परे शब्दों के जोड-तोड के जादू से पाठक के दिलों में समा जाते हैं। भाषा और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाषा है तो साहित्य है और जब साहित्य होता है तब भाषा स्वतः ही विकासमान होती है। वर्तमान में हिन्दी भाषा दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुकी है। इस विकास का एकमात्र आधार है समन्वय। हिन्दी भाषा ने न केवल भारत की अपितु विश्व की अनेक भाषाओं के शब्दों से अपने आपको परिपूर्ण किया और आज भी अनेक शब्दों को अपने अंदर समाहित कर रही है। यदि हम हिन्दी भाषा और साहित्य के इतिहास पर दृष्टि डालें तो अनेक पहलू निकलकर आएँगे।

हिन्दी भाषा का विकास क्रम – हिन्दी साहित्य की दृष्टि से सम्वत् ७६९ से १३१८ के काल को आदिकाल की संज्ञा दी गयी है। इस काल में संस्कृत, अपभ्रंश (प्राकृत एवं पालि) एवं हिन्दी भाषा, साहित्य की भाषाएँ थीं। संस्कृत उच्च एवं राजवर्ग की, अपभ्रंश धर्म प्रसार की एवं हिन्दी लोक प्रवृत्ति की भाषा बन गयी थी। इस काल में संस्कृत में व्याकरण का अनुशासन चरम पर था इस कारण संस्कृत भाषा का विस्तार ठहर गया और धर्म प्रसार के लिए सरल भाषा का प्रयोग करने की आवश्यकता अनुभव की गयी इस कारण अपभ्रंश या प्राकृत भाषा का निर्माण होने लगा। इस काल में तुर्की, फारसी और अरबी भाषा भारत में आ चुकी थी। भारत में अनेक क्षेत्रीय भाषाएँ भी विद्यमान थीं अतः संस्कृत और प्राकृत के बाद हिन्दी भाषा तीव्रता से विस्तार लेने लगी। हिन्दी भाषा चूँकि सभी भाषाओं के मेल से बनी थी इस कारण इसमें शब्दों की प्रचुरता रही और इसी कारण यह भाषा आगे चलकर साहित्य की भाषा बनी।

हिन्दी भाषा

  • हिन्दी भाषा को संसार भर में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं मे से एक होने का सम्मान प्राप्त है और यह विश्व के 56 करोड़ लोगों की भाषा है। आँकड़े बताते हैं कि भारत में 54 करोड़ तथा विश्व के अन्य देशों में 2 करोड़ लोग हिंदीभाषी हैं।
  • नेपाल में 80 लाख, दक्षिण अफ्रीका में 8.90 लाख, मारीशस में 6.85 लाख, संयुक्त राज्य अमेरिका में 3.17 लाख, येमन में 2.33 लाख, युगांडा में 1.47 लाख, जर्मनी में 0.30 लाख, न्यूजीलैंड में 0.20 लाख तथा सिंगापुर में 0.05 लाख लोग हिंदीभाषी हैं। इसके अलावा यू.के. तथा यू.ए.ई. में भी बड़ी संख्या में हिंदीभाषी लोग निवास करते हैं। विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का स्थान दूसरा है।
  • हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है कि हिंदी भाषा अंतरजाल की प्रमुख भाषाओं में से एक बनने की पूर्ण योग्यता रखती है और निकट भविष्य में वह अपने लक्ष्य को पूर्ण करने में अवश्य ही सफलता प्राप्त कर लेगी।
  • आइये! हिंदी के विकास में हम सभी अपना योगदान दें और इसे अन्तर्जाल की प्रमुख भाषाओं में से एक बनने में सफल बनायें।

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