प्रगति की रफ्तार


नई दिल्ली [31 dec, 09]। दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों में अब तक जो भी विकास हुए हैं, वह प्रत्यक्ष रूप से विज्ञान और तकनीकी से जुडे़ हुए हैं या यों कहें कि वह सभी विज्ञान व तकनीक के अलग-अलग रूप में हैं। इसमें रहन-सहन, खान-पान और रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी हर चीज शामिल है। इसलिए अगर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में हुए विकास और बदलाव की बात करें तो धरती के निर्माण से लेकर अब तक इनकी संख्या अनगिनत हो चुकी है।

पिछले दो दशकों में वैश्विक विज्ञान व तकनीक की बात की जाए तो सबसे ज्यादा विकास स्पेस व कम्युनिकेशन के क्षेत्र में हुआ है। इस वैश्विक विकास में भारत का योगदान भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत में तथ्यपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोगों की शुरुआत पांच हजार साल पहले ही हो चुकी थी। अगर भारतीय विचारकों ने शून्य की खोज नहीं की होती तो आज भी हम अंकों की तुलना से अनभिज्ञ रहते।

इसके अतिरिक्त दशमलव जो गणित का विशेष अंश है, दुनिया को इससे भी भारत ने ही परिचित करवाया है। विश्व के तमाम विचारकों ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता का कई बार लोहा माना है और आगे भी मानते रहेंगे। मेडिकल के क्षेत्र में तो भारतीय विशेषज्ञों ने बड़े-बड़ों को पछाड़ दिया, माडर्न सर्जरी सिस्टम से विश्व का परिचय भारतीय चिकित्सक सुश्रुत ने ही करवाया। मध्यकाल में विज्ञान व तकनीक का क्षेत्र कुछ सुस्त जरूर पड़ा, लेकिन 20वीं सदी के प्रथम चरण में इसका पुनर्जागरण हुआ और आज हम विश्व की तीसरी बड़ी वैज्ञानिक क्षमता से लैस मैन पावर हैं।

लंबे समय तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा हमारा देश विज्ञान व वैज्ञानिकों के मामले में काफी पिछड़ गया। इस क्षेत्र में क्रांति शुरू हुई आजादी के बाद। वर्ष 1947 में जब देश को आजादी मिली तो देश में विज्ञान व तकनीक से जुड़े क्षेत्र मात्र एक करोड़ की लागत तक ही सिमटे थे। तकनीक के नाम पर देश में बिजली, ट्रेन व कुछ मिलें ही मौजूद थीं, वह भी अंग्रेजों की देन मानी जाती हैं। उस समय हमारा स्वयं का विकसित किया हुआ कुछ भी नहीं था।

आजादी मिलते ही सबसे पहला काम किया गया साइंस और टेक्नालाजी से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने का। एक करोड़ तक सीमित बजट को तीन करोड़ तक पहुंचाया गया, जो समय के साथ बढ़ता गया। भारतीय विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में असल तरक्की हुई पिछले दो दशकों में। बीते दो दशकों में ही भारत ने एक बार फिर विश्व की महाशक्तियों को यह जता दिया कि हमारे बिना आप अधूरे हैं। देश ने सबसे ज्यादा तरक्की की अंतरिक्ष विज्ञान व मेडिकल में। अमेरिका पिछले कई सालों से चांद पर पानी की तलाश में लगा हुआ था, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पा रही थी। भारतीय वैज्ञानिकों के मात्र कुछ वर्षो के प्रयास ने चांद पर पानी खोज निकाला और पूरे विश्व ने एक स्वर में भारत के इस प्रयास की सराहना की और चांद पर जीवन की तलाश के मिशन में भारत एक मजबूत दावेदार बन गया।

इसके अतिरिक्त अंतरिक्ष विज्ञान में भारतीय वैज्ञानिकों के अन्य प्रयोग चर्चा के विषय रहे। भारत में अंतरिक्ष से जुड़े सभी प्रकार के शोध व प्रयोग इसरो के ही जिम्मे होते हैं। पिछले दो दशकों में भारतीय अंतरिक्ष संस्थान की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है चंद्रयान का निर्माण। पिछले दो दशकों में इसरो सात अलग-अलग सेटेलाइट लांच कर चुका है। इसके अलावा इसरो की विशेष उपलब्धि रही है सेटेलाइट लांचर व व्हीकल का निर्माण कर लेना। इससे पहले तक भारत सेटेलाइट का निर्माण तो कर लेता था, लेकिन इसे अंतरिक्ष में भेजने के लिए उसके पास सेटेलाइट लांचर नहीं था।

बीते दो दशकों में इसरो ने सेटेलाइट लांचर का निर्माण किया, लेकिन इसके बाद लांचर व्हीकल न होने से एक ही स्थान थुंबा से कब तक सेटेलाइट लांच किए जाते। वर्ष 1994 में इसरो पोलर सेटेलाइट लांच व्हीकल का निर्माण करके दुनिया के उन छह देशों में शामिल हो गया, जिनके पास अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी सभी जरूरी तकनीक उपलब्ध थीं। इन्हीं दो दशकों में भारत ने रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट का निर्माण किया और दुनिया की ऐसी तीसरी महाशक्ति बन गया, जिनके पास रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट की तकनीक है। इस समय भारतीय अंतरिक्ष संस्थान का पूरा ध्यान 2000 किलोग्राम भार के सेटेलाइट को अंतरिक्ष तक पहुंचाने वाला जियोसिनक्रोनस सेटेलाइट लांच व्हीकल का निर्माण करने में लगा हुआ है।

फिलहाल भारत के पास जो भी लांच व्हीकल हैं, वे 1000 से 1300 किलोग्राम भार तक सेटेलाइट उठा सकते हैं। 1988 से 1991 के बीच रिमोट सेसिंग सेटेलाइट का निर्माण कर भारत इनका व्यापारिक प्रयोग भी करने लगा। इस तकनीक से अन्य देशों के जटिल कार्यो को आसान बनाकर तकनीक का पूरा फायदा उठाया जा रहा है। इसरो की इस उपलब्धि से प्रभावित होकर अमेरिका की एक कंपनी ने भारत के साथ डाटा की मार्केटिंग संबंधी कार्य का समझौता किया है। इसके बदले भारत को बड़ी रकम प्राप्त होगी। इस सेटेलाइट के प्रयोग से इसरो ने चांद की सतह की जो तस्वीरें खींची, उन्हें 40 करोड़ रुपये में बेचा है। इन दो दशकों में भारत स्पेस साइंस के मामले में न सिर्फ दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, बल्कि इंडियन स्पेस टेक्नालाजी की मांग विश्व के कई देशों में तेजी से बढ़ रही है।

देश में इस समय 40 बड़ी प्रयोगशालाएं हैं, जो काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च द्वारा चलाई जा रही हैं। इन प्रयोगशालाओं में विज्ञान व तकनीक से जुड़े तमाम तरह के शोधों को अंजाम दिया जाता है। इसके अतिरिक्त देश में सरकारी व निजी प्रयोगशालाओं को मिलाकर कुल 2,000 छोटी-बड़ी प्रयोगशालाएं हैं। मिसाइल लांच तकनीक के मामले में भारत दुनिया के पांच प्रमुख देशों में से एक है। पिछले 20-25 सालों में भारत की तकनीकी क्षमता इतनी कुशल हो चुकी है कि विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में खर्च होने वाली रकम का कुल 15 प्रतिशत यह क्षेत्र स्वयं ही अर्जित करने लगा है।

विज्ञान व तकनीक के अन्य विकसित क्षेत्रों में दूसरा नाम आता है मेडिकल का। पिछले दो दशकों में स्पेस के अलावा मेडिकल के क्षेत्र में भी विशेष तरक्की हुई है। इलाज की नई-नई तकनीक के अलावा भारत में फार्मेसी का क्षेत्र क्रांति के दौर से गुजरा। देश के फार्मेसी उद्योग ने इन दो दशकों में दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की की। इस समय भारत का फार्मेसी उद्योग 400 करोड़ रुपये सालाना की आय अर्जित कर रहा है। अन्य देशों के मुकाबले भारत में दवाओं का निर्माण करना काफी सस्ता पड़ जाता है। इसलिए कई प्रतिष्ठित कंपनियां भारत के अतिरिक्त विदेशों में भी दवाओं का निर्यात करती हैं।

सिप्ला व डाक्टर रेड्डी ऐसी ही दो भारतीय कंपनियां हैं, जिनकी विदेशों में धूम मची हुई है। दवाओं के अलावा पिछले दो दशकों में भारतीय सर्जरी सिस्टम ने भी तेजी से प्रगति की है। विज्ञान के इस अहम हिस्से से लोगों का जीवन जुड़ा हुआ है, इसलिए इसका प्रगति करना मानवता के लिए विशेष महत्व रखता है। दो दशकों में मेडिकल टेक्नालॉजी में ऐसे आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं, जो विश्व में लोकप्रिय हुए। देश में आयुर्वेद एक बार फिर से लोकप्रियता के नए समीकरण स्थापित कर रहा है। आयुर्वेद के बढ़ते कदम व अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता ने इसे मेडिकल के महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में विकसित किया है।

मेडिकल के अलावा कम्युनिकेशन यानी संचार के साधनों में भी दो दशकों के दौरान काफी बदलाव आए हैं। आम आदमी की मुख्य जरूरतों में से एक संवाद स्थापित करने के साधनों में भी प्रगति हुई है। कम्युनिकेशन भी विज्ञान व तकनीक के विकास से बदला है, इसके साधनों में जबरदस्त क्रांति आई है। संवाद के दूरगामी साधनों में टेलीफोन का आविष्कार एक विशेष उपलब्धि माना जाता है। इस उपलब्धि में समय के साथ कुछ परिवर्तन होते चले गए, लेकिन असल बदलाव पिछले दो दशकों के दौरान ही हुआ। एक समय देश में फोन से बात करने में अच्छी-खासी रकम लग जाती थी। पिछले करीब दो दशकों में तकनीक के विकास ने इस समस्या को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब तो हर तीसरे व्यक्ति के पास मोबाइल है।

दुनिया में देश की धाक

पिछले दो दशकों में भारत में शिक्षा का स्तर इतनी तेजी से बढ़ा है कि हमने विश्व के कई ताकतवर देशों को पीछे छोड़ दिया है। आने वाले समय में यह और भी ऊंचा उठेगा। शिक्षा की जो प्रणाली आज हम देख रहे हैं, आज से कुछ वर्ष पहले यह बिल्कुल विपरीत अवस्था में थी। आज की शिक्षा की जो प्रणाली रोजगारपरक शिक्षा पर जोर देती है, कुछ दशक पहले तक शिक्षा और रोजगार का आपस में ज्यादा लेना-देना नहीं होता था।

इस समय देश का हर वर्ग ऐसी शिक्षा ग्रहण करने का हिमायती है, जो भविष्य में रोजगार के बेहतर विकल्प के रूप में विकसित हो सके। भारत में शिक्षा की विकास यात्रा और पिछले दो दशकों पर नजर दौड़ाएं तो शिक्षा का असल विकास पिछले आठ-नौ सालों में हुआ है। इससे पहले तक शिक्षा सिर्फ कुछ विशेष वर्गो की जागीर बनकर रह गई थी। उस समय शिक्षा का अधिकार सिर्फ उन्हीं लोगों के पास हुआ करता था, जिनके पास पैसा था। इसका तोड़ निकालने के लिए केंद्र सरकार ने अक्टूबर-2009 में शिक्षा का अधिकार विधेयक पेश किया और संसद से इसे मंजूरी भी मिल गई। इस विधेयक के तहत देशभर में छह से 14 साल की आयु तक के सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य कर दी गई है। यह शिक्षा पूरी तरह मुफ्त होगी। इसमें बच्चों को किताबें और मध्याह्न भोजन भी मुफ्त उपलब्ध कराया जाएगा। इस योजना के लागू होने से हमारी आने वाली पीढ़ी में कोई भी अशिक्षित नहीं रहेगा।

इस समय देशभर से प्रतिवर्ष 30 लाख ग्रेजुएट तैयार होकर निकल रहे हैं। यह संख्या चीन के बाद विश्व में सबसे ज्यादा है। इस समय देश के मेडिकल संस्थानों में 11 हजार सीटें हैं, जिसमें से 5,300 सीटें सरकारी मेडिकल संस्थानों की हैं। एक समय इन सीटों की संख्या मात्र 500 से 550 तक ही हुआ करती थीं यानी देश में डाक्टरों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ रही है। मेडिकल के अलावा देश में मौजूद आईआईटी और इंजीनियरिंग कालेजों में कुल 30 हजार सीटें हैं यानी देश को हर साल 30 हजार इंजीनियर मिल रहे हैं। प्रोफेशनल तैयार करने के मामले में हम सिर्फ चीन से पीछे हैं।

शिक्षा में आए चमत्कारी बदलावों ने देश के उद्योग जगत में नई जान डाल दी है। टाटा, रिलायंस, बिरला, विप्रो, इन्फोसिस जैसी भारतीय कंपनियों ने पूरे विश्व में धूम मचा रखी है। इन कंपनियों को अन्य देशों की तरह मैन पावर के लिए विदेशियों का मुंह नहीं देखना पड़ रहा है। नई से नई तकनीक को अपनाने और इसे प्रयोग में लाने के लिए भारतीय तकनीकी कुशल कर्मचारी उपलब्ध हैं। देश का मेहनती और तेज दिमाग से लैस युवा वर्ग इन उद्योगों की जान है। भारत का उद्योग जगत जिस तेजी से तरक्की कर रहा है, उससे तो यही प्रतीत होता है कि आने वाले समय में विश्व की कई नामी-गिरामी कंपनिया भारतीय कंपनियों का हिस्सा होंगी और यह चमत्कार होगा सिर्फ शिक्षा के बल पर।

विश्व परिदृश्य में भारतीय शिक्षा की मजबूती को लेकर प्रसिद्ध हस्तियां भी अपनी-अपनी राय व्यक्त करती रही हैं। वर्ष 2007 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारतीय शिक्षा का लोहा मानते हुए अमेरिकी नागरिकों को चेतावनी दे डाली थी। उन्होंने कहा था, ‘अगर हमारी शिक्षा का यही हाल रहा तो भारत हम पर कब्जा कर लेगा। इसलिए शिक्षा पर ध्यान दें।’ विश्वभर के विचारक इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि पिछले दो दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था बूम के दौर से गुजर रही है। भारतीय शिक्षा प्रणाली आंधी-तूफान की गति से आगे बढ़ रही है। आज की तारीख में अमेरिका के डाक्टरों में 40 प्रतिशत भारतीय हैं। अमेरिका का स्वर्ग माना जाने वाला सिलिकॉन वैली में 30 प्रतिशत भारतीय प्रोफेशनल हैं।

अमेरिकी उद्योग जगत को आगे बढ़ाने में 15 भारतीयों का हाथ है और इसका सीधा श्रेय भारतीय शिक्षा को जाता है। इन सभी तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय शिक्षा तकनीक में अब तक जो भी बदलाव हुए हैं, उनसे हमारी शिक्षा गंभीर हो रही है।

जागरण

Advertisements

4 विचार “प्रगति की रफ्तार&rdquo पर;

  1. संगीता पुरी कहते हैं:

    इस नए ब्‍लॉग के साथ नए वर्ष में हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. अच्‍छा लिखते हैं आप .. आपके और आपके परिवार वालों के लिए नववर्ष मंगलमय हो !!

  2. आयुर्वेद पर ही शोध तो मैं कर रही हूँ
    इतने बड़े -बड़े रोगों की इतनी छोटी -छोटी और सरल दवाएं हैं कि आप कल्पना नहीं कर सकते
    खैर… जब जीरो दिया मेरे भारत ने………………

एक उत्तर दें

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s