तेलंगाना: फैसले के दूरगामी खतरों पर विचार जरूरी


जल्दीबाजी में अलग तेलंगाना राज्य की मांग मानकर केंद्र ने ऐसे अंतहीन रास्ते पर कदम बढ़ा दिए हैं जिसकी परणिती अंततः कई राज्यों की मांग के रूप में सामने आएगी। फैसले के पीछे माना जा रहा है के चंद्रशेखर राव का अनशन प्रमुख वजह थी। हालांकि राज्य में ही इस मु्द्दे के प्रति एकराय नहीं थी अन्यथा आंध्रप्रदेश को दो टुकड़ों में तोड़ने के फैसले के खिलाफ 105 विधायकों ने अपने इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष किरणकुमार रेड्डी को नहीं भेजे होते। इनमें कांग्रेस के 52, तेलुगु देशम के 42 और प्रजा राज्यम पार्टी के 11 विधायक शामिल हैं। इनके साथ विजयवाड़ा से कांग्रेस सांसदों- लगादापति राजगोपाल, अनंत वेंकटरामी रेड्डी और टीडीपी के सांसद मैसूरा रेड्डी ने भी लोकसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा भिजवाया है। इनके अलावा आंध्रप्रदेश विधानपरिषद में कांग्रेस के 34 और तेलुगु देशम के 120 सदस्यों ने भी इस्तीफा दिया हैं।

ये सभी विधायक तेलंगाना के तटीय और रायलसीमा क्षेत्रों से हैं। केंद्र पर इस तरह का दबाव बनाने के पीछे इस तरह माना जा सकता है कि केंद्र ने जल्दीबाजी में बिना अन्य दलों से चर्चा किए ही उक्त कदम उठा लिया है। देश में इस समय पृथक बुंदेलखंड,गोरखालैंड राज्य बनाने के लिए मांग चल रही है। इस फैसले से इन आंदोलनों को बल मिलेगा। वहां से भी अनशन का रास्ता अपनाए जाने जैसा कदम उठाए जाने के संकेत मिल रहे हैं। गोरखालैंड आंदोलनकारियों की तरह से तो कहां भी गया है कि वे भी राव के रास्ते पर चलेंगे। ऐसे में माना जा सकता है कि फैसले पर एक बार पुनर्विचार आवश्यक है।

दूरगामी खतरेः

छोटे राज्य के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि इससे विकास की रफ्तार तेज होती है। मूल निवासियों के लिए रोजगार के ज्यादा मौकों का सृजन होता है। क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा स्थानीय विकास में काम आती है। सांस्कृतिक रूप से निवासियों में एकरूपता होने से एकता की भावना रहती है। लेकिन इन बातों के अलावा देखें तो कई दूरगामी खतरे भी इस प्रवृति में सन्निहित हैं। क्या पृथक राज्यों की मांगें देर सवेर देश का एकता के लिए घातक तो नहीं बनने जा रही है।

इसके आलावा स्थानीय क्षुद्र राजनीति, संकीर्ण क्षेत्रवाद को इससे बढ़ावा तो नहीं मिलेगा। क्योंकि अगर ऐसा होता है तो बहुमत के अभाव में बनने वाली मिलीजुली केद्र सरकार के समय इन राज्यों के छोटे-छोटे दलों के विभिन्न मुद्दों पर ब्लैकमेल के संभावनाएं भी बनती हैं। कुल मिलाकर सारी स्थितियां देश के लिए घातक हो सकती हैं। इस कारण इन बातों पर विचार करना जरूरी है।

… तो विकल्प क्याः

राष्ट्रीय स्तर पर एक कमीशन बनाया जाए जो इस तरह के मुद्दे पर तार्किकता के साथ विचार करे। इसमें सभी दलों के अलावा प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी शामिल किया जाए। आंध्र के दलों से चर्चा के बाद आमराय से इस मुद्दे का फैसला किया जाए। देश के अन्य बड़े लेकिन पिछड़े क्षेत्रों में विकास के लिए सही नीति बनाई जाए ताकि आगे इस तरह की मांग नहीं उठें। जो राज्य वास्तव में बड़े हैं, लेकिन विकास की रफ्तार में पिछड़ रहे हैं, केवल उन्हीं के संबंध में इस तरह की मांगों पर गौर किया जाए।

अनुज खरे डिप्टी एडीटर, भास्कर डॉट कॉम

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