भारत – दस सवाल


भारत ने महाशक्ति का दर्जा पाने के लिए क़दम तो बढ़ा दिए हैं, लेकिन इस राह में बड़ी-बड़ी खाइयां हैं। इन खाइयों को पाटकर ही हम कोई दावा कर सकते हैं। खरबपति अमीरों और अरबपति नेताओं के बरअक्स देश में 84 करोड़ ग़रीब हैं। एक तरफ़ मिनरल वाटर में नहाते अमीर, दूसरी तरफ़ गड्ढे का पानी पीने को मजबूर अवाम। इस भीषण भेदभाव और इससे जुड़े या इसी तरह के हैं दस दहकते सवाल.. कुछ ही दिनों बाद हम नई सदी के नए दशक में प्रवेश कर लेंगे। गुजरते दशक ने भारत को महाशक्ति की दावेदारी दी, आने वाले समय में उसे पूरा करने की Êिाम्मेदारी है। यहां हैं वे दस चुनौतियां, जिन्हें भारत को पार करना होगा, अगर वह अपना सपना पूरा करना चाहता है, तो।

1- अमीरी-ग़रीबी की लगातार बढ़ती खाई, 2- भ्रष्टाचार, 3- राजनीतिक तिकड़म, अस्थिरता व पतन, 4- बदहाल स्वास्थ्य सुविधाएं, 5- असरदार व्यापक शिक्षा, 6- अतिवाद-आतंकवाद, 7- आंतरिक सुरक्षा, 8- सीमा विवाद-अस्थिर पड़ोस, 9- पर्यावरण, 10- सिर्फ़ चमचमाते कथित ‘इंडिया’ के ही नहीं, हाशिए पर पड़े कथित भारत के आत्मविश्वास में वृद्धि और इस महास्वप्न में साझेदारी।

सन् 1617 में अंग्रेज राजनयिक सर थॉमस रो ने जब पहली बार मुग़ल दरबार में बादशाह जहांगीर को देखा था, तो मुग्ध रह गया था। रो ने अपने संस्मरण में जहांगीर द्वारा पहने गए गहनों का विस्तार से वर्णन किया है, मसलन बादशाह ने मुर्ग़ी के अंडे से बड़ा याक़ूत पहन रखा था, उसकी बांह पर अखरोट से बड़ा मोती टंका हुआ था, उसका कमरबंद पूरी तरह सोने का था और उसकी तलवार पर बेशुमार जवाहरात लगे थे ‘जैसे मैंने अपने पूरे जीवन में नहीं देखे’।

इतिहासकार बर्नियर ने जब औरंगÊोब को देखा था, तो वह भी कुछ इसी तरह मुग्ध हुआ था। उसने लिखा, ‘मुझे नहीं लगता कि इस धरती पर किसी और राजा के पास इतनी दौलत होगी।’ 1660 में उसने औरंगÊोब की संपत्ति की तुलना करते हुए लिखा कि पूर्वी यूरोप के सबसे अमीर शासक तुर्की के ओटोमन सुल्तान और फ़ारस के राजा की संपत्तियों को मिला दिया जाए, तो भी वे औरंगजेब के ख़जाने के आगे कम दिखेंगी।

निश्चित ही, उस जमाने में कोई फोब्र्स पत्रिका नहीं थी, वरना वह हर छठे महीने दुनिया के सबसे अमीर राजाओं की एक सूची छापा करती और हिंदुस्तानी बादशाहों की अमीरी के क़िस्से गली-गली बांचे जाते। औरंगÊोब के ही जमाने में हिंदुस्तान आया फ्रांसीसी इतिहासकार ज्यां दे थेवनो इस अमीरी के बरक्स यह भी लिखता है कि हिंदुस्तान का बादशाह जितना अमीर है, उसकी रियाया उतनी ही ग़रीब। लोगों के पास खाने-पहनने को नहीं और वे आदिम तरीक़ों से अपना जीवनयापन करते हैं।

जब यह कहा जाता है कि इतिहास ख़ुद को दोहराता है, आभासी यथार्थ चाहे जितना बदले, मूलभूत वास्तविक यथार्थ हमेशा एक-सा बना रहता है, तो इस पर सहज ही भरोसा हो जाता है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में प्रवेश करते भारत के सामने जो चुनौतियां हैं, चार सौ साल पहले की ये बातें उन चुनौतियों की ऐतिहासिक उपस्थिति की पुष्टि करती दिखती हैं।

मोटे तौर पर अब भी हालात बदले हुए नहीं हैं। करोड़पतियों की सूची में भारत शुरुआती स्थानों पर है। 2007 में भारत में सबसे Êयादा 22.7 प्रतिशत की दर से करोड़पतियों की संख्या में इÊाफ़ा हुआ। अंबानी, मित्तल, टाटा जैसे उद्योगपति अपनी निजी परिसंपत्तियों से ही दो-चार छोटे-मोटे देश ख़रीद सकते हैं। इनकी संपत्तियां मिला दी जाएं, तो ये पश्चिमी यूरोप का एक बड़ा हिस्सा ख़रीद लें, लेकिन जैसा कि भारत में विरोधाभास का लंबा इतिहास है, ठीक इन्हीं बरसों में विश्वबैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत की 42 फ़ीसदी जनसंख्या अंतरराष्ट्रीय ग़रीबी रेखा के नीचे है, यानी वह मात्र सवा डॉलर (59 रुपए) रोज पर बसर करती है।

दुनिया के अमीरों का एक बड़ा तबक़ा भारत में रहता है, तो यह भी तथ्य है कि इस धरती पर नमक की तरह फैले ग़रीबों का एक-तिहाई हिस्सा भी भारत में ही निवास करता है। किसानों और मÊादूरों द्वारा आर्थिक कारणों से की जाने वाली आत्महत्याओं में यह देश सबसे आगे है।

कुछ दिनों बाद हम औपचारिक रूप से नई सदी के नए दशक में प्रवेश कर लेंगे। पिछले दशक ने भारत के महाशक्ति बनने के बारे में दावेदारी की, तो यह दशक उसे पूरा करने का सही समय माना जा रहा है। भारत महाशक्ति है या नहीं, बनेगा या नहीं, इस पर जब-तब रुक-रुककर बात होने लगती है। इस समय भी सहज रूप से और रिवायती तौर पर भी यह सवाल उठना लाजिमी है, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त बनने की राह में जो चुनौतियां इस सदी की शुरुआत में थीं, वे अब भी बनी हुई हैं।

अमीरी और ग़रीबी के बीच लगातार बढ़ती खाई वह सबसे बड़ी चुनौती है, जिससे आने वाले बरसों में भारत को जूझना होगा। स्वाभाविक-सा सवाल है कि जिस देश में सबसे Êयादा ग़रीब रहते हों, जहां कुपोषित शिशुओं की मृत्युदर (2007 में 46 फ़ीसदी) दुनिया में सबसे Êयादा हो, जहां पचास फ़ीसदी से Êयादा बच्चे ‘अंडरवेट’ पैदा होते हों, जहां हर साल पांच लाख महिलाएं प्रसव-पीड़ा और गर्भ-संबंधी रोगों से मर जाती हों, विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक़ जहां हर साल नौ लाख से Êयादा लोग दूषित पानी और प्रदूषित हवा के कारण मर रहे हों, जिस देश में अब भी मलेरिया को ‘एंडेमिक’ का दर्जा हासिल हो और जिसके बाद भी जिस देश में एक लाख लोगों पर महज साठ डॉक्टर रहते हों, उस देश को दुनिया का सबसे अमीर, शक्तिशाली और असरकारक देश कैसे मान लिया जाएगा?

यहां 70 में एक महिला मैटर्नल डेथ का शिकार होती है, जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा 7300 में से एक महिला का है। भारत का यह आंकड़ा कई बार धोखे में डाल देता है कि क्या शेयर बाÊार की उछाल, फोब्र्स की सूचियों, कारों की बिक्री, मोबाइल और कंप्यूटरों का इस्तेमाल जैसी चीजों को देखकर संपन्नता का दंभ भरते हम, दूसरी तरफ़ से एक मध्य-युगीन वर्तमान में रह रहे हैं? यह कितनी बड़ी विडंबना है कि भारत के जिस शहर दिल्ली को नई शताब्दी का शहर कहा जा रहा है, उसी के बीच देश की सबसे प्रदूषित नदी बहती है।

इतिहास गवाह है कि सुंदर नदियां, सुंदर शहरांे का निर्माण करती हैं, लेकिन दिल्ली और यमुना के मामले में गंगा ही उल्टी है। पर्यावरण और प्रदूषण देश की बड़ी, किंतु लगभग उपेक्षित समस्याओं में हैं। न सिर्फ़ संस्थाएं, बल्कि आम व्यक्ति भी अपनी-अपनी तरह से पर्यावरण के इस क़दर दोहन में लगा है कि हवा, जमीन, पानी रासायनिक प्रदूषण की जद में हैं, सूखती नदियां और कम होता भूजल अभूतपूर्व संकट की ओर ले जाएगा। अपनी वैश्विक असफलता के बाद भी कोपेनहेगन हमारे लिए कोई उम्मीद देता है?

स्वास्थ्य सुविधाओं का भी विरोधाभास देख लें कि यूके में सबसे ज्यादा भारतीय डॉक्टर प्रैक्टिस कर रहे हैं और भारत दुनिया के मानचित्र पर मेडिकल टूरिज्म के एक लोकप्रिय डेस्टिनेशन के रूप में उभर रहा है। ऐसी कई एजेंसियां और वेबसाइट्स सक्रिय हैं, जो विदेशों में विज्ञापन देती हैं कि वे कम से कम ख़र्चे में भारत में न्यूरोसर्जरी से लेकर बोन मैरो ट्रांसप्लांट करवा देंगी, साथ ही उसी पैकेज में मरीज ढेर सारे मंदिरों और समुद्रतटों को देखते हुए छुट्टियां भी मना लेगा।

चूंकि दुनिया में भारत से भी Êयादा ग़रीब देश हैं, इसलिए लोग आते भी हैं। इलाज के लिए और पढ़ाई के लिए भी। हर साल यहां से पढ़े लोगों का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में नौकरियों के लिए चला जाता है, उसके बाद भी अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों में किसी भारतीय यूनिवर्सिटी को सम्मानजनक स्थान नहीं मिलता। बुनियादी साक्षरता दर ही सठ बरसों में 12 से 66 फ़ीसदी तक पहुंच पाई है और अब भी यह साक्षरता के 84 फ़ीसदी के अंतरराष्ट्रीय मानक से कहीं पीछे है।

चीन, यहां तक कि श्रीलंका, बर्मा और ईरान भी साक्षरता दर में हमसे बहुत-बहुत आगे हैं। जिस ऱफ्तार से हमारे यहां साक्षरता बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह अनुमान है कि चौरासी फ़ीसदी तक पहुंचने में अभी हमें और चालीस साल लगेंगे। हमारे यहां चौदह हÊार में से सिर्फ़ एक विद्यार्थी उच्च शिक्षा की तरफ़ जाता है। दस करोड़ छात्रों पर साढ़े तीन लाख शिक्षक होते हैं। एक अंदाजे के मुताबिक़, एक टीचर को 220 छात्रों को पढ़ाना होता है। इस पर भी विरोधाभास यह कि महंगे स्कूलों की कोई कमी नहीं और शिक्षा एक सुयोजित-संगठित व्यवसाय की तरह हो गई है।

अमीरी और ग़रीबी के बीच की यह खाई जितनी विशाल होती जाएगी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का अंतर भी उतना ही बड़ा होता जाएगा। शानो-शौक़त से भरी जिंदगी का सबसे विडंबनात्मक असर अपनी नक़ल करवाने की अभिलाषा का होता है। जब एक वर्ग अपनी दौलत से पूरे देश की आंखों को चौंधिया रहा हो, तो बहुसंख्यक वंचित-उपेक्षित वर्ग मौक़ा हाथ लगते ही मलाई साफ़ करने के लोकप्रिय मुहावरे को चरितार्थ करने में क़सर नहीं छोड़ता। यहां एक बार फिर हम इतिहास की ओर चलते हैं।

इतिहासकार थेवनो औरंगजेब की सेना के बारे में लिखता है कि उसके पास तीन लाख घुड़सवार थे, लेकिन वे सिर्फ़ काग़जों पर थे। जब भी मुग़ल सेना कहीं आक्रमण के लिए जाती, तो इससे आधे सैनिक ही मैदान पर होते थे। दरअसल, उसके मनसबदारों ने लगभग आधे सिपाहियों को भर्ती ही नहीं किया था, वे काग़जों में उन्हें मौजूद दिखा उनकी तऩख्वाह गड़प जाया करते थे। इतिहास में भ्रष्टाचार के कई उदाहरण मिलते हैं और यहां इसका उल्लेख इसकी ऐतिहासिकता की ओर संकेत-भर के लिए है। लेकिन पिछले बरसों में भ्रष्टाचार के जो मामले दिखाई देते हैं, वे बंगाल के पहले गवर्नर-जनरल लॉर्ड वॉरेन हेस्टिंग्स पर लगे आरोपों से भी ज्यादा संजीदा, गहरे और व्यापक जान पड़ते हैं। हेस्टिंग्स पर मुक़दमे के दौरान आरोप पढ़ने में ही दो दिन से ज्यादा का व़क्त लग गया था।

आम मान्यता है कि भारत में भ्रष्टाचार की जड़ दरअसल सत्ता-पिरामिड के ऊपरी सिरे पर है, जिसका फल नीचे-नीचे तक फैला हुआ है। भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार के अनगिनत उदाहरण हैं और आम तौर पर यह याद रख पाना मुश्किल होता है कि आख़िर किस नेता पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल 179 देशों की सूची में भारत को 85वें नंबर का भ्रष्ट देश मानती है। इस देश के पचास फ़ीसदी लोगों ने जीवन में एक से ज्यादा बार सरकारी द़फ्तरों या सार्वजनिक संस्थानों में, अपने हाथ से रिश्वत दी है।

इसकी रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत की अंतरराज्यीय सीमाओं पर हर साल सिर्फ़ ट्रक ड्राइवर ही अपने ट्रकों के सुचारु आवागमन के लिए पांच अरब डॉलर, यानी क़रीब 23,042 करोड़ रुपए रिश्वत देते हैं। यह देश के मंझोले कारपोरेट घरानों की परिसंपत्ति के बराबर है।

भारतीय ब्यूरोक्रेसी अपनी रिश्वतख़ोरी के लिए पूरी दुनिया में बदनाम है। वह, सिर्फ़ एशिया में ही, सिंगापुर, थाईलैंड, ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन की ब्यूरोक्रेसी के मुक़ाबले न केवल कम असरकारक है, बल्कि उसके साथ काम करने को दुनिया की कई एजेंसियों ने ‘एक धीमी और दर्दनाक प्रक्रिया’ कहा है। ग़रीब देशों में अनाज के बोरे रवाना करने वाला यह देश क्या यह जानकर शर्मसार न हो जाता होगा कि बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में ग़रीबों में बंटने वाले सब्सिडाइज्ड अनाज का 70 से 80 फ़ीसदी हिस्सा ‘संपन्न’ अफ़सरान ही डकार जाते हैं? देश में भ्रष्टाचार जिस स्तर पर पहुंच गया है, उसने शैक्षिक संस्थानों, पुलिस, न्यायपालिका, सिविल सेवाओं, राजनीति जैसे क्षेत्रों, जो कि किसी भी राष्ट्र-राज्य का मेरुदंड होती हैं और उसके विकास का पूरा जिम्मा उठाती हैं, को चिंताजनक रूप से संदिग्ध बना दिया है।

सॉ़फ्ट पावर से सुपर पावर
सदियों पहले भारत ने हिंसक युद्ध के जरिए दुनिया पर धाक नहीं जमाई थी, बल्कि हमने अपनी सभ्यता-संस्कृति केबल पर दिलों को जीता था। आज भी हमारा देश अपने सॉ़फ्ट पावर की मदद लेकर सुपर पावर बन सकता है। हमारी ये कोमल, मगर असरदार शक्तियां हैं- योग, खान-पान, फिल्में, नृत्य, संगीत और प्राचीन दर्शन..

देश का राजनीतिक परिदृश्य ब्यूरोक्रेसी के मुक़ाबले कोई बेहतर नहीं है। घोटाले, दल-बदल, जनप्रतिनिधियों की ख़रीद-बिक्री, रातोरात अमीर बन जाने और बहुधा बेदाग़ बरी हो जाने के बेशुमार उदाहरणों ने दुनिया के सामने भारतीय राजनेता को ‘भ्रष्ट, लालची, अराजक, अपराधी, अवसरवादी और किसी भी स्तर तक गिर जाने वाला’ चेहरा प्रदान किया है। मधु कोड़ा जैसे नेताओं की कमी नहीं है, जिन्होंने महÊा कु़छ वर्षो में अरबों रुपए की कमाई कर डाली। एक चौथाई से Êयादा सांसदों पर हत्या, बलात्कार, आगजनी, अतिक्रमण, भ्रष्टाचार और इमिग्रेशन ट्रैफ़िक के आरोप हैं।

राजनीति एक उद्योग का दर्जा पा चुकी है और इसमें निवेश का अर्थ सौ गुना लाभ पाने की आकांक्षा है। एक अनुमान के मुताबिक़, इस साल हुए लोकसभा चुनाव में दस हÊार करोड़ रुपए ख़र्च किए गए, जो कि वर्ष 95-96 में भारत में हुए विदेशी निवेश के बराबर है। सीधा-सा गणित है कि एक पार्षद, विधायक या सांसद चुनाव जीतने के लिए अगर एक करोड़ रुपए का निवेश करेगा, तो वह उसका कई गुना लाभ भी कूतना चाहेगा। भारतीय राजनीति के मूल्यहीन व पतनशील होने में एक बड़ा कारण यह भी है। जब संसद में नोट लहराए गए थे, तो उस समय देश की जनता और विदेश की तथाकथित महाशक्तियों के सामने क्या संदेश गया होगा?

बिकने के लिए हर घड़ी तैयार इन नेताओं से, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, किसी भी क़िस्म की डील पर हस्ताक्षर करवा लिए जाएं? पिछले दिनों मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार पी. साईनाथ ने इस साल के चुनावों पर नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कई चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत किए थे। भारत की संसद में करोड़पति नेताओं की संख्या दोगुनी हो चुकी है। 2004 में 154 सांसद करोड़पति थे, इस साल 306 सांसद करोड़पति। 543 सांसदों की कुल संपत्ति 28 अरब रुपए के आसपास है।

64 केंद्रीय मंत्री मिलकर पांच अरब रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। इस साल 3,437 उम्मीदवार ऐसे थे, जिनकी घोषित संपत्ति दस लाख रुपए से कम थी और इनमें से सिर्फ़ 15 ही चुनाव जीत पाए। अगर आप पांच करोड़ रुपए या उससे Êयादा की संपत्ति के मालिक हैं, तो आपके चुनाव जीतने की संभावनाएं 75 गुना बढ़ जाती हैं। अगर आप पचास लाख के भी मालिक हैं, तो भी आपकी जीत की संभावनाएं 43 गुना Êयादा हैं। भारतीय लोकतंत्र के साठ साल के इतिहास में आज से पहले तथ्यात्मक रूप से यह धारणा कभी इतनी साफ़ नहीं हुई थी कि चुनाव जीतने का सीधा संबंध आपकी धन-शक्ति से है।

यह उस देश की स्थिति है, जहां 83.6 करोड़ लोग अब भी बीस से साठ रुपए पर जी रहे हैं, जो देश भूख का आकलन करने वाले ग्लोबल हंगर इंडेक्स की 88 देशों की सूची में 66वें नंबर पर है, जिंबाब्वे से सिर्फ़ एक सीढ़ी ऊपर, जो ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में बोलीविया, बोत्सवाना और कांगो से भी नीचे 132वें नंबर पर है, उस देश में खरबपति उद्योगपतियों की ही नहीं, अरबपति राजनेता की संख्या भी तेÊाी से बढ़ रही है।

ऐसे देश की राजनीतिक स्थिरता कितने दिनों तक संदिग्ध होने से बची रहेगी? गठबंधन सरकारों की अस्थिरता और समझौतापरस्त नीतियों ने इन हालात में इÊाफ़ा ही किया है। दुनिया के मानचित्र में महाशक्ति के रूप में स्थान पाने का सपना हमने जिन राजनेताओं के हवाले किया है, उनका ऐसा सामाजिक-आर्थिक व्यवहार इस स्वप्न को पूरा करने में कितनी मदद करेगा?

ऐसी लोभी और अस्थिर राजनीतिक स्थितियों के बीच अगर धार्मिक अतिवाद, आयातित-घरेलू आतंकवाद, और आंतरिक सुरक्षा के मसले उठते हों, तो क्या आश्चर्य होगा। आतंकवाद से निपटने में भारतीय राज्य लगभग असफल मुक़ाम पर है। देश का 40 फ़ीसदी हिस्सा किसी न किसी रूप में आतंकवादी हिंसा को झेल रहा है, यह आंकड़ा गृह-युद्ध की स्थिति से कोई ख़ास अलग दृश्य नहीं बनाता।

पिछले साल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने यह स्वीकार करके चौंका दिया था कि देश में 800 से Êयादा आतंकवादी सेल सक्रिय हैं। लगातार हो रहे हमले, पूरब का रेड कॉरीडोर सार्वजनिक स्मृति में ताÊा है। उस पर अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। इसी तरह अस्थिर पड़ोस और सीमा विवाद की घटनाएं भी हमारे सामने लगातार आ रही हैं।

चीन का अरुणाचल और लद्दाख में घुस आना, पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा व कश्मीर विवाद भारतीय क्षेत्र की अंदरूनी शांति को लगातार चुनौती देती रहेंगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को लगातार सवालों की मिसाइलें झेलनी होंगी, क्योंकि अपनी स्वभावगत सीमाओं के कारण आक्रामक छवि अख्तियार करना हमारे लिए मुश्किल ही होता है।

एक बड़ी ताक़त के रूप में भारत की संभावना पर विश्वास करने वाले समाजशास्त्री लेखक और केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने पिछले दिनों कहा था कि यदि भारत अपनी सैन्य और आर्थिक क्षमताओं में सॉ़फ्ट पावर को जोड़ दे, तो उसकी राह काफ़ी आसान हो जाएगी। सॉ़फ्ट पावर से उनका आशय हॉलीवुड, एमटीवी और मैकडोनाल्ड जैसे तत्वों से था। उनका मानना है कि अमेरिका ने इन तत्वों का प्रयोग अपने सॉ़फ्ट पावर के रूप में किया और इनके Êारिए पूरा दुनिया का सांस्कृतिक एकरूपीकरण किया।

भारत के टीवी सीरियल्स अफ़गानिस्तान में ख़ूब देखे जाते हैं, बॉलीवुड इस्तांबुल से लेकर सेनेगल तक में लोकप्रिय है, योगा को पूरी पश्चिमी दुनिया ने अपना लिया है, भारतीय खानपान और रेस्तरां यूके में हाथोहाथ लिए जाते हैं, भारतीय आईटी-कर्मियों की साख पूरी दुनिया में बनी है, ये सब भारत के सॉ़फ्ट पावर हैं, जिनका अधिकाधिक उद्धरण हमें देना चाहिए।

सोचने वाली बात यह है कि पिछले दस बरसों में भारत ने जीडीपी दर वाली अर्थव्यवस्था के साथ इन सबको जोड़कर ही महाशक्ति की दावेदारी पाई है। इनसे दावा तो बन गया, लेकिन उसे पूरा करने के लिए जिन हार्डकोर वैल्यूज की तरफ़ ध्यान देना है, वह भारत के हिस्से में अभी बाक़ी है। चीन इन मामलों में हमसे काफ़ी आगे निकल चुका है और बीजिंग का ओलंपिक, मेड इन चाइना का व्यापक जाल, सर्वाधिक संपन्न शहरों की सूची में बढ़ता उसका एकाधिकार, चाइनीज क्वीजीन जैसे सॉ़फ्ट पावर के साथ आर्थिक सफलताओं, सैन्य बल, अंतरराष्ट्रीय दबदबे के साथ इस दशक में उसने सुपरपावर की ओर अपनी राह Êयादा विश्वस्त तरीक़े से बनाई है। भारत को अभी थोड़ा इंतेजार और ढेर सारा काम करना होगा।

इस दशक की चुनौतियों में उसे सर्वोच्च प्राथमिकता आय के भयंकर असंतुलन और अमीरी-ग़रीबी की बढ़ती खाई को रोकने को देनी होगी। और चूंकि पूरी दुनिया के स्तर पर यह खाई तेÊाी से बढ़ रही है, इसे कम करने के लिए एक बहुत महत्वाकांक्षी, पारदर्शी तरीक़ा अपनाना होगा।

यही क्या कम विडंबना है कि भारतीय मीडिया, बुद्धिजीवियों और समाज ने इस खाई को लगभग वैध व अवश्यंभावी मान लिया है, यह कहते हुए कि एक हिस्सा इंडिया है, दूसरा हिस्सा भारत है। एक ही देश के अंदर दो देश बना देने की यह स्वीकारोक्ति जितनी हास्यास्पद है, उससे कहीं ज्यादा शर्मनाक कि जो अमीर हैं, वे अमीर ही रहेंगे और जो ग़रीब हैं, उन्हें अमीर होने का सपना देखना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि अमीरों का देश इंडिया उनके लिए है ही नहीं, वे अपने भारत में ख़ुश रहें।

रघुवीर सहाय का एक किरदार है- हरचरना, जो कि एक कविता में इस तरह आता है- ‘राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता है, फटा सुथन्ना पहने जिसके गुन हरचरना गाता है।’ कहना न होगा कि जब तक यह हरचरना फटा सुथन्ना पहनने को अभिशप्त रहेगा, ‘हमारे भारत’ के महाशक्ति-स्वप्न को वैधता नहीं मिल पाएगी; भले ‘आपका इंडिया’ कितना भी बड़ा सॉ़फ्ट पावर बन जाए।

लेकिन, किंतु, परंतु..

2007 में भारत में सबसे Êयादा 22.7 प्रतिशत की दर से करोड़पतियों की संख्या में इजाफ़ा हुआ।..परंतु विश्वबैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत की 42 फ़ीसदी जनसंख्या अंतरराष्ट्रीय ग़रीबी रेखा के नीचे है। भारत दुनिया के मानचित्र पर मेडिकल टूरिज्म के एक लोकप्रिय डेस्टिनेशन के रूप में उभर रहा है।..लेकिन देश के लोगों के लिए प्रति एक लाख आबादी पर महज साठ डॉक्टर हैं।  हर साल भारत से उच्च शिक्षित लोगों के एक बड़े हिस्से को विदेशों में अच्छी नौकरियां मिलती हैं।..किंतु हमारे यहां बुनियादी साक्षरता दर महÊा 66 फ़ीसदी है, जो 84 फ़ीसदी के अंतरराष्ट्रीय मानक से बहुत पीछे है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स की 88 देशों की सूची में हम 66वें नंबर पर हैं और ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में 132वें नंबर पर।..बावजूद इसके कई राज्यों में ग़रीबों में बंटने वाले सब्सिडाइÊड अनाज का 70 से 80 फ़ीसदी हिस्सा अफ़सर ही डकार जाते हैं। फिलहाल देश के 306 सांसद करोड़पति हैं और 543 सांसदों की कुल संपत्ति 28 अरब रुपए के आसपास है।..लेकिन दुनिया में सबसे Êयादा ग़रीब भी हमारे ही देश में बसते हैं।

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