स्त्री चिंतन परम्परा की प्रासंगिकता एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य


भारतीय संस्कृति अपनी विशिष्ट पहचान के कारण सदैव विश्व के लिए आदरणीय एवं वन्दनीय रही है। प्राचीन भारत की लोक कल्याणकारी भाईचारे और समन्वय की भावना ने विश्व को शान्ति, समता और अंहिसा का मार्ग दिखाया। विश्व में जगतगुरू के नाम से भारत की पहचान रही है। यहाँ के लोगों की अपनी एक अध्यात्मिक सोच रही है। कुटुम्बकम की भावना, जनमानस के लिए प्रेरणा की आदर्श रही है। इसके प्रमुख कारण यह हैं कि समाज सामाजिक सम्बन्धों का जटिल जाल होता है और इन सम्बन्धों का निर्माता स्वयं मनुष्य है। सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ही समाज में संगठन एवं व्यवस्था स्थापित करते हुए इसे प्रगति एवं गतिशीलता की दिशा में ले जाने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहा है। इसलिए पुरुष स्वःभावता अहंकारी हो गया और वह अपनी स्थिति सामाजिक परिवेश में सर्वोच्च स्तर में रखने को उत्सुक हो गया। यही मनोभाव पुरुष को वर्चस्ववाद की ओर ले गया। उसने यदि स्त्री को अधिक पढ़ी लिखी जागरूक, तर्कशील, बुद्धिमान पाया तो अपने को अन्दर ही अन्दर ख़तरा महसूस करने लगा। यही सर्वोच्चता के ख़तरे का डर एक झूठा अहंकारवाद का शिकार व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर पाया, क्योंकि पुरुष स्वभावतः अहंकारी है।

वह अपनी सामाजिक स्थिति को सर्वोच्चता में रखकर देखता है और स्त्री को निम्न स्तर पर  रखता है। यदि स्त्री अधिक पढ़ी लिखी, जागरूक, तर्कशील, बुद्धिमान है तो उसकी सर्वोच्चता को शायद ख़तरा पैदा हो जायेगा और झूठे अहंकारवाद का शिकार व्यक्ति यह सब कैसे सहन कर लेगा कि स्त्री की सामाजिक आर्थिक स्थिति उससे सर्वोच्च हो जाये या उसके बराबर। आज तक यही होता आया है और आज भी उसके भीतर यही सोलहवीं शताब्दी की सोच काम कर रही है कि स्त्री उसकी निजी सम्पत्ति है लेकिन इस सम्पत्ति की गुणवत्ता को वह कतई बढ़ाना नहीं चाहता। उसे कमजोर करके रखने में ही अपनी सुरक्षा समझता है। पुरुष के मन में यह भय असुरक्षा की भावना और स्त्री को दबाकर कुचलकर नियन्त्रण में रखने की स्त्री विरोधी दृष्टि सदियों से काम कर रही है। राजतंत्र का राजा अपने लिए सोलह हज़ार रानियाँ जुटा सकता था। प्रजातंत्र का क्लिंटन व्हाइट हाउस में मोनिका लेविंस्की से यौनाचार कर सकता है। मध्य और निम्नवर्ग भी कोई अपवाद नहीं है। कभी सौतन, कभी सहेली, कभी कजिन, कभी क्लाईंट, कभी कुलीग, कभी कुछ और, औरत के दिल में वह लगातार छेद करता आया है। अब विद्वत्जनों को सौतियाडाह एवं फीमेल जैलिसी के पुलिगो-रकीबो-डाह एवं ’मेल जैलिसी‘ को शब्दकोशीय मान्यता दे देनी चाहिए।

परन्तु आज शिक्षित-कामकाजी, अधिकार-सजग, बौद्धिक, अर्थ-स्वतंत्र पत्नियों ने पुरुषों के लिए समस्याएँ खड़ी कर दी है। शिक्षा राजनीति खेल, धर्म, फिल्म, सेना, साहित्य, प्रशासन, मीडिया, संविधान और विज्ञान ने नए क्षितिज खोल खोल दिये हैं। अनुगामिनी एक दिन सहगामिनी बन जाएगी, आदम की पसली से जन्म लेने वाली उसके सम्मुख हकूक की बात करेगी, पौराणिक कथाओं का अध्ययन करने वाली विश्वविद्यालयों में लॉ क्लासेज लगाएगी अथवा नारीवादी नारे उछालेगी, नाखूनों से लेकर सिर के बालों तक अपने को ढककर तीर्थयात्राएँ करने वाली के प्राण ब्यूटी पॉर्लर में बस जायेंगे, बालायें अन्तरिक्ष को मुट्ठी में भर लेंगी – ऐसा पति-परमेश्वरों ने कभी नहीं सोचा था।

जैसे-जैसे समाज में नारी की निरीह स्थिति में बदलाव आया है और वह अबला से सबला बनने की तरफ़ अग्रसर हुई है, वह अपने अधिकारों के प्रति सजग और सचेत हुई है। पुरुष तंत्रात्मक समाज के बंधनों के ख़िलाफ़ उसने विद्रोह किया है। स्त्री के क्रांतिवीर तेवर से परिवार की बुनियाद हिल गयी है और पारिवारिक विघटन भिन्न-भिन्न रूपों में समाज में पसरता जा रहा है। पुरुष का परम्परागत मानस स्त्री के मौलिक अधिकारों को स्वीकार नहीं कर पाता। वह दबाना चाहता है और स्त्री अपनी गुलाम मानसिकता वाली छवि सती-साध्वी या पति-परमेश्वरी को तोड़कर अपना स्वतंत्र वजूद बनाना चाहती है। सामंती समाज में स्त्री माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, दासी आदि के रूप में थी-उसका अपना अलग वजूद नहीं था। आधुनिकता और बौद्धिकता के कारण वह अपने निज स्वरूप और अपनी भावनाओं एवं इच्छाओं के प्रति सचेत हुई है। इस सजगता से टकराहट होती है और यहीं से सम्बन्धों में दरार पड़नी शुरू हो जाती है। अभी भी पुरुष स्त्री में परम्परागत कुल लक्ष्मी/कुल वधू वाले स्वरूप को ही ढूँढता है, वह उसी का आकांक्षी है। स्त्री का आधुनिक होना उसे बर्दाश्त नहीं है उसे वह कुलटा और परिवार तोड़ने वाली आदि विशेषणों से नवाजने लगता है। उस पर चरित्र हीनता और स्वैराचार का आरोप लगाता है।

’समर्पण लो सेवा का सार‘ कहकर प्रसाद जी नारी के उसी सामंती रूप को प्रोत्साहित करते हैं जो अपनी सारी आकांक्षाओं को पुरुष के चरणों में समर्पित कर देती है। अपने व्यक्तित्व को पुरुष के ’महान‘ व्यक्तित्व में गला-घुला देती है। आधुनिक स्त्री नर-नारी समता में विश्वास करती है। जहाँ पुरुषों से वह किसी मायने में कम नहीं है। इस तथ्य को डॉ. रमेश कुन्तल मेघ भी स्वीकार करते है – “आजकल नारी की ऐतिहासिक कर्म भूमिकाएँ (गृहिणी, धात्री, जननी, उपचारिका, सेविका, दासी आदि) जो शय्या और रसोई की धुरी में केन्द्रित थी, अब बदल रही है। वह गृह के बाहर काम धन्धों को अपना रही है। और गृह के अन्दर की नीरस मजदूरी से स्वतंत्र हो रही है। गृह की धुरी के ढीला होने एक साथ ही विवाह की संस्था के अस्तित्व पर प्रश्न उठ रहे हैं अर्थात् श्रम के विभान (घरे और बाहिरे) की सामंती आधार टूट रहे हैं और नई स्त्री ’एक-यौनता की धारणा को स्वीकार कर रही हैं।”

पूँजीवाद के उदय के साथ जीवन में आधुनिकता, बौद्धिकता का प्रवेश होता है, वैज्ञानिक दृष्टि का विकास होता है, स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों की घोषणा होती है। इसके साथ ही हज़ारों सालों की बेड़ियाँ एक झटके के साथ टूट जाती हैं और स्त्री के कदम आत्म सम्मान की दिशा में बढ़ चलते हैं। स्त्री को कानूनी अधिकार मिलते हैं। सन् १९५६ ई. के पहले स्त्री का कानूनी अधिकार शून्य था। धीरे-धीरे अब उसमें बढ़ोत्तरी हो रही है और यहीं से स्त्री की अपनी स्वतंत्र पहचान बननी शुरू होती है।

स्त्री विमर्श की महीन और व्यापक जानकारी पाने के लिए विश्वस्तर पर घटने वाली चार घटनाओं को रेखांकित करना बेहद जरूरी है।

प्रथम, १७८९ की फ्रांसीसी क्रांति जिसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसी चिरवांछित मानवीय आकांक्षाओं को नैसर्गिक मानवीय अधिकार की गरिमा देकर राजतंत्र और साम्राज्यवाद के बरक्स लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के स्वस्थ और अभीप्सित विकल्प को प्रतिष्ठित किया।

द्वितीय, भारत में राजा राममोहन राय की लम्बी जद्दोजहद के बाद १८२९ में सतीप्रथा का कानूनी विरोध जिसने पहली बार स्त्री के अस्तित्व को मनुष्य के रूप में स्वीकारा।

तृतीय, सन् १८४८ ई. में सिनेका फालस न्यूयार्क में ग्रिम के बहनों की रहनुमाई में आयोजित तीन सौ स्त्री-पुरुष की सभा जिसने स्त्री दासत्व की लम्बी शृंखला को चुनौती देते हुए स्त्री मुक्ति आन्दोलन की नींव धरी।

चतुर्थ, १८६७ में प्रसिद्ध अंग्रेज दार्शनिक और चिंतक जॉन स्टुअर्ट मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में स्त्री के वयस्क मताधिकार के लिए प्रस्ताव रखा जाना जिससे स्त्री-पुरुष के बीच स्वीकारी जाने वाली अनिवार्य कानून और संवैधानिक समानता की अवधारणा को बल दिया।

संयुक्त रूप से ये चारों घटनायें एक तरफ़ से विभाजक रेखाएँ हैं जिसके एक ओर पूरे विश्व में स्त्री उत्पीड़न की लगभग एक सी यूनीवर्सल परम्परा है तो दूसरी ओर इससे मुक्ति की लगभग एक सी तड़प और अकुलाहट भरी संघर्ष कथा।

भारतीय सन्दर्भ में स्त्री-विमर्श दो विपरीत ध्रुवों पर टिका है। एक ओर परम्परागत भारतीय नारी की छवि है जो सीता और सावित्री जैसे मिथकों में अपना मूर्त रूप पाती है। दूसरी ओर घर परिवार तोड़ने वाली स्वार्थी (होम ब्रेकर) और कुलटा रूप में विख्यात पाश्चात्य नारी की छवि है जो अक्सर पुरानी फिल्मों में खलनायिका के रूप में उकेरी जाती है। साहित्य-जीवन की भावनात्मक अभिव्यक्ति होते हुए भी भावनाओं द्वारा अनुशासित नहीं होता। मूलतः वह बीज रूप में विचार से बँधा होता है जिसका पल्लवन-पुष्पन भविष्य में होता है तो जड़ों का जटिल जाल सुदूर अतीत तक चला जाता है। अपने भौतिक अस्तित्व से ऊपर उठकर विराट को महसूसने की क्षमता ही लेखक के ज्ञान और संवेदना को उन्मुक्त और घनीभूत करते हुए विजन का रूप दे डालती है। यह विजन ही मुक्तिबोध के शब्दों में ज्ञान को ’संवेदनात्मक ज्ञान‘ और संवेदना को ’ज्ञानात्मक संवेदन‘ का रूप दे रचना में वांछित बौद्धिक संयम और अनुशासन बनाए रखता है। आलोचक को धड़कते जीवन से सीधे मुखातिब होना है, एक हाथ जीवन की नब्ज पर रखकर दूसरे हाथ से जीवन को प्रतिबिम्बित करती रचनाओं की नब्ज को टटोलना है। इसका दायित्व दोहरा और चुनौती भरा है विमर्श का अर्थ है जीवन्त बहस। साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो विचार का विचार और वर्चस्व की प्राप्ति। अंग्रेज़ी में इसके लिये ’डिस्कोर्स‘ शब्द का प्रयोग किया जाता है। किसी भी समस्या या स्थिति को एक कोण से न देखकर भिन्न मानसिकताओं, दृष्टियों, संस्कारों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं का समाहार करते हुए उलट-पुलट कर देखना, उसे समग्रता से समझने की कोशिश करना और फिर मानवीय संदर्भों में निष्कर्ष प्राप्ति की चेष्टा करना। अर्थात किसी विषय पर अभी तक जो लेखन या विचार होता आया है उस पर पुनः विचार कर उसकी दशा और दिशा का मूल्यांकन करना।

भोर की ख़ुमार भरी नींद तोड़ने के लिए ’देवरानी जेठानी की कहानी‘ और भाग्यवती सरीखी-रचनाओं को निश्शंक भाव से प्रभात फेरियों का दर्जा दिया जा सकता है। समाज सुधार के सजग और सायास गढ़े उद्देश्य, पात्र, कथानक और घटनाओं से बुनी इन रचनाओं में राममोहन राय, विद्यासागर, रानाडे, महर्षि कर्वे, महर्षि दयानन्द तक के समाज सुधार आँदोलन की परम्परा, अनुगूँज और छाप साफ दिखाई पड़ती है। बाल विवाह विरोध, विधवा विवाह समर्थन, स्त्री शिक्षा (जिसकी पाठ्यक्रम अनिवार्यता स्त्रियोपयोगी विषयों जैसे सिलाई, बुनाई, कढ़ाई से अटा पड़ा है। लड़कों को दी जाने वाली विज्ञान जैसी आधुनिक शिक्षा से पूर्णतया वंचिता और आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक स्वावलम्बन पर बल आज बहुत ही साधारण और हास्यास्पद से मुद्दे जान पड़ते हैं, लेकिन उस समय इनकी अहमियत थी। सन् १८६० ई. में विद्यासागर बहुत ही मशक्कत के बाद कानूनी तौर पर लड़कियों के लिये विवाह की न्यूनतम आयु दस वर्ष करा पाये थे। सन् १८२९ ई. में बहुतेरे प्रयासों के बाद यह आयु बढ़ाकर तेरह वर्ष ही हो पाई थी। अठारह वर्ष न्यूनतम आयु का प्रावधान शारदा ऐक्ट १८५६ ई. के बाद ही सम्भव हो पाया था जबकि ’भाग्यवती‘ में श्रद्धाराम फिल्लौरी पं. उमादत्त के जरिये लड़के और लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु क्रमशः ग्यारह और अठारह का संदेश देकर वक्त से थोड़ा आगे चलने का संकेत देते हैं।

सदी का वर्क बदलने पर हिन्दी साहित्य में उभरने वाला स्त्री-विमर्श इतना जड़, उपदेशात्मक और इकहरा नहीं रह गया था। लेकिन यह भी तय है कि उनका रेखांकन अब भी पुरुष और परिवार के संदर्भ में ही किया जाता था। इसकी प्रमुख वजह थी सामाजिक राजनीति जीवन में पुरुष नायकों के साथ स्त्रियों की प्रत्यक्ष भागीदारी। प्रारम्भ में समाज सुधारकों के परिवारों की स्त्रियाँ प्रादेशिक स्तर पर आम जनता के उद्बोधन का मंत्र फूंकने आगे बढ़ाई गई थीं, वक्त के साथ उन्होंने दो उल्लेखनीय कार्य किये। प्रथम, वैयक्तिक तौर पर परिवार के पुरुष अनुशासन, दिशा निर्देशन से मुक्त हो स्वायत्त सत्ता महसूस की। दूसरे, अपनी आवाज को संगठित कर अखिल भारतीय पहचान देने की कोशिश की। सन् १८१७ ई. में ’वीमेंस इंडियन एशोसिएशन‘ की स्थापना, सन् १९२५ ई. में ’नेशनल काउंसिल ऑव वूमैन इन इंडिया‘ की स्थापना और सन् १९२७ ई. में ’अखिल भारतीय महिला परिषद्‘ का अस्तित्व में आना अपने आप में ऐतिहासिक और क्रान्तिकारी घटनायें थीं। जिनकी अनुगूँज आज भी स्वतंत्र भारत के संविधान और कानून में सुनी जा सकती हैं। सन् १९४६ ई. में ’अखिल भारतीय महिला परिषद्‘ द्वारा प्रस्तुत अधिकारों और कर्तव्यों के चार्टर में वर्णित कुछ माँगों को भारतीय संविधान में ज्यों का त्यों स्थान दिया गया। जैसे धारा ४४ के अन्तर्गत लिंग, जाति धर्म के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक क्षेत्र में भेदभाव न किया जाना। धारा १६ के अन्तर्गत लिंग, जाति, धर्म के आधार पर सरकारी नौकरियों और दफ्तरों में भेदभाव न किया जाना। इसने स्त्री को अपनी चिर-पोषित ’अबला‘ छवि को तोड़कर एक नये जुझारू व्यक्तित्व और रचनाशील भूमिका में आविर्भूत होने के लिये प्रेरित किया। सामाजिक उथल-पुथल के इस दौर में हिन्दी कथा साहित्य भी नारी की स्वायत्तता और स्वतंत्र चेतना को शिद्दत से चित्रित करता रहा। लेकिन विडम्बना यह रही कि इस बिन्दु पर आकर लेखक निर्वेयक्तिक नहीं रह पाया। उसका पुरुष अहं या संस्कार, जो भी कहें स्त्री की इस आत्मनिर्भर विचारवान संघर्षशील छवि को स्वीकार नहीं पाया।

हिन्दी के अति आरम्भिक उपन्यासों का उद्भव स्त्री-चेतना से ही हुआ, यह एक अटल सत्य है। स्त्री चेतना के बीज मन्त्र से हिन्दी के अति आरम्भिक उपन्यास अनुप्राणित रहे हैं और इनका प्रारम्भिक उद्देश्य स्त्री चेतना की सर्वप्रथम प्राथमिकता में स्त्री शिक्षा निहित है। प्रथम गद्य रचना ’देवरानी जेठानी की कहानी‘ से स्पष्ट है कि अशिक्षिता और मूर्ख महिलाएँ परिवार के जीवन को अत्यन्त दुःखद और शिक्षित महिलाएँ नरक तुल्यघर को स्वर्ग जैसा सुखद बना देती हैं। “हिन्दी में उपन्यास की रचना का श्रीगणेश स्त्री शिक्षा निमित्त ही हुआ था। इस स्त्री शिक्षा के मूल में स्त्री चेतना ही है। ’देवरानी जेठानी की कहानी‘, ’बामा शिक्षक‘, ’भाग्यवती‘ और ’सुन्दर शीर्षक‘ परीक्षागुरु-पूर्व उपन्यासों में स्त्री चेतना ही मूलाधार है। आधुनिक काल में प्रेमचंद की निर्मला कितनी पच्चीकारी करके सामाजिक कुरीतियों की पृष्ठभूमि में निर्मला के जरिये औसत भारतीय स्त्री की आँसू भरी अनूठी तस्वीर गढ़ने की कोशिश की गई है। उसे तोड़कर सुधा के रूप-रंग-रेखा विहीन चरित्र की आउटलाइंस दिलोदिमाग पर हावी हो जाती है। निर्मला की पीड़ा और दीनता के सेलीब्रेशन से ज्यादा सुधा के चरित्र का आकस्मिक एवं अविश्वसनीय टर्न कहीं ज्यादा ज़रूरी लगता है। दूसरा उदाहरण ’गोदान‘ की मालती के रूप में लिया जा सकता है जिसके पर कतरने के प्रयास में बेचारे प्रेमचंद पसीने-पसीने हो गये हैं। मालती यानी सुशिक्षित, स्वतंत्रचेता आत्मनिर्भर प्रोफेशनल युवती जो पुत्र की तरह घर के दायित्वों को सँभाले है। और मित्र की तरह पुरुष मंडली में घूमती है। वर्जनाओं और कुण्ठाओं से मुक्त एक स्वस्थ व्यक्ति की तरह। उसकी यह पारदर्शी उन्मुक्तता ’मेहतानुमा‘ पुरुषों के लिये खतरा है। इसलिये वे खिसियाकर फतवेबाजी करने लग जाते हैं- “स्त्री में जब पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है।”

प्रेमचंद जो भी हों (मेहता या पुरुष) सर्जक के रूप में समाज को ’कुलटाओं‘ का रोल मॉडल अपनी रचनाओं के जरिये नहीं दे सकते थे। इसलिये मालती की ऊर्जा और तेजस्विता को ’चैनेलाइज‘ करते हुये उसे समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के बृहत्तर आयामों से जोड़कर विपरीत दिशा की ओर मोड़ देते हैं।

महादेवी वर्मा के अनुसार – “हमें न किसी पर जय चाहिये न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुत्व चाहिये, न किसी पर प्रभुता ! केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिये जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेगीं।” (शृंखला की कड़ियां, अपनी बात से- महादेवी वर्मा)। अपनी सीमाओं के चलते प्रेमचंद भले ही युगानुरूप स्त्री की बदलती छवि अपनी रचनाओं से नहीं उकेर सके, लेकिन उन्हीं के समकालीन जैनेन्द्र ने निर्भीकतापूर्वक उसे मानवीय  अस्मिता से दीप्त अवश्य किया, असल में हिन्दी कथा-साहित्य में यहीं से पहली बार स्त्री-विमर्श एक गम्भीर और मानवीय-चिंता के रूप में नये आयाम और ऊँचाइयाँ लेने लगता है। कभी-कभी लगता है वह इंग्लैण्ड रिटर्न्ड मालती ही थी जो मेहता और प्रेमचन्द्र द्वारा थोपे गये कानूनों, वर्जनाओं, अनुशासनों के बीच भी अपने वजूद को पूरी ऊँचाई और फैलाव दे पाई। कोई सामान्य स्त्री होती तो शायद कल्याणी (उपन्यास-कल्याणी) की तरह स्वतन्त्रता और वर्जना, अस्मिता और पति सापेक्ष पत्नी की परतंत्र भूमिका के निरंतर द्वंद्व तले पिसे आत्मपीड़न और हिस्टीरिया की शिकार हो जाती है। यह ठीक है कि प्रेमचंद की तरह जैनेन्द्र के यहाँ सामाजिक सरोकार अपनी तमाम स्थूलता और व्यापकता में उपस्थित नहीं हैं, लेकिन ’पत्नी‘ कहानी की सुनंदा और ’त्यागपत्र‘ की मृणाल, अज्ञेय रचित ’रोज‘ की मालती ’नदी के द्वीप‘ की रेखा भी क्या बहुत गहराई से उस व्यवस्था को प्रश्न चिन्हित नहीं कर देती जो स्त्री को तिल भर भी स्पेस देने को तैयार नहीं?

स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में बाधक होने के कारण विवाह संस्था के प्रति पूर्णतया अनास्थावान होते हुये भी विवाह द्वारा मिलने वाली सामाजिक, मानसिक, आर्थिक सुरक्षा से उसे हमेशा निर्णायक रूप से दुर्बल बनाया। फलतः गालियों और आँसुओं के जरिये अपने आवेश और आक्रोश की ’पनीली‘ अभिव्यक्ति और फिर पुरुषों तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के समक्ष विकल्पहीन समर्पण। उदाहरण के लिये शशिप्रभा शास्त्री के ’नावें‘, एवं ’सीढ़ियाँ‘ उपन्यास, मृदुला गर्ग का ’उसके हिस्से की धूप‘ मँजुल भगत का ’अनारो‘ कुसुम अंसल का ’उसकी पंचवटी‘, ’उषा प्रियंवदा का ’पचपन खम्भे लाल दीवारें‘ और ’रुकोगी नहीं राधिका‘, मन्नू भण्डारी का ’आपका बन्टी‘। अमृता प्रीतम (रसीदी टिकट), इस्मत चुगताई (लिहाफ), कृष्णा सोबती (सूरजमुखी अधेरे के, मित्रों मरजानी) ममता कालिया (बेघर), प्रभा खेतान (छिन्न-मस्ता, पीली आँधी), राजी सेठ (तत्सम), मेहरुन्निसा परवेज (अकेला पलाश) कुसुम अंसल (अपनी अपनी यात्रा) मृणाल पाण्डेय (लड़कियाँ), अलका सरावगी कलिकथा-बाया बाइपास), नासिरा शर्मा (ठीकरे की मंगनी, शाल्मली), दीप्ति खण्डेलवाल (प्रतिधिनयाँ, देह की सीता) आदि लेखिकायें स्त्री विमर्श को सुविचारित रूप में कथा साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत कर रही हैं। स्त्रियों के बहुआयामी जीवन की विसंगतियों और विडम्बनाओं को कतरा-दरकतरा निचोड़ता हुआ रेशा-दर-रेशा बुनता हुआ यह कथात्मक साहित्य उनकी ज़िन्दगी के अंधेरे कोनों में सूर्य रश्मियों की भाँति घुसकर आर-पार देखने का जोखिम उठा रहा है।

कृष्णा सोबती की नारी स्थूल दृष्टि में देखने पर कामनाओं द्वारा संचालित विशुद्ध देह के स्तर पर जीवन जीती नारी है, लेकिन जरा सी गहराई में उतरते ही वह स्त्री अस्मिता की ऊँचाइयों को छूने के प्रयास में जिन मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था व्यक्त करती हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है। मित्रो और रत्ती के जरिये वर्जनात्मक स्त्री को उन्होंने पहले-पहल हिन्दी कथा साहित्य में इंट्रोड्यूस किया, वह पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ नब्बे के दशक में कर्मक्षेत्र में उतरी है। इसके विपरीत यह नारी बनी-बनाई कसौटियों को तोड़ने या उन पर स्वयं कसने के तनाव भरे द्वन्द्व से मुक्त होकर समाज में अपनी पुख्ता पहचान बनाने के लिये विशेष रूप से आग्रहशील हुई है। मंदा (इदन्नमम), सारंग (चाक) और कदम बाई (अल्मा कबूतरी) इसकी उदाहरण हैं। आखिरी दशक के हिन्दी कथा साहित्य की स्त्री तमाम कोशिशों के बाद सहचर पुरुष को उतना मानवीय नहीं बना सकी, लेकिन अपने लिये आत्म सम्मानूपर्वक जीवन जीने का रास्ता तलाश सकी है। मेहरुन्निसा परवेज ने निश्चित रूप से स्त्री लेखन की जरूरत को स्पष्ट किया है कि नारी के मौन को शब्द नारी ही दे सकती है। उसके दुःख को औरत ही समझ सकती है। वह ही पहचान सकती है। औरत के शरीर पर अंकित घावों के निशानों को। पुरुष के लिये अब तक वह क्या थी? ’नारी तुम केवल श्रद्धा हो‘। रमणी, प्रेयसी, रूमानी ख्याल, यादों की सुन्दरी! लेकिन स्त्री ने ही स्त्री की देह पर अंकित खूनी घावों के निशानों को दिखाया है कि किस प्रकार वह उत्पीडत, उपेक्षित है।

निजी सुखों की झोंक में क्या व्यक्ति समाज को बदरंग भविष्य नहीं देगा? ये कल्चर स्पर्म बैंक, सरोगेटेड मदर, ह्यूमन क्लोनिंग की सम्भावनाएँ, समलिंगी सम्बन्धों के प्रति बढ़ती आसक्ति। इन पर गम्भीरता पूर्वक पहली बार दो टूक राय उठाने का जोखिम उठाया गया है मृदुला गर्ग ने ’कठ गुलाब‘ उपन्यास में। मृदुला गर्ग मानती हैं कि पुरुष अनादि काल से प्रकृति का अनवरत दोहन और स्त्री का मानसिक शोषण करता आया है जिसके चलते आज धरती और स्त्री दोनों बंजर हो गई हैं। दुलार और स्नेहिल स्पर्श से दोनों लहलहा सकती हैं। बशर्ते पुरुष डूबकर उनकी परिचर्या में जुट जाए। आने वाला समय यदि बीहड़ और बंजर है तो हुआ करे, उर्वर सम्भावनाओं के बीज तो मुट्ठी में बंद हैं। उपन्यास का आस्थावादी स्वर तमाम वैज्ञानिक पेचीदगियों से मुठभेड़कर अंततः मनुष्यता का जयघोष करता है। इक्कीसवीं सदी का स्त्री-विमर्श का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण ’दीवार में एक खिड़की रहती थी‘ में देखा जा सकता है। विपिन के समरूप यहाँ रघुबर है और पत्नी सोनाली के आने से वह कार्य अपने स्तर पर तथा सोनाली के उपयोग के आधार पर करता है और सम्पूर्ण सृष्टि जैसे उसकी अभ्यर्थना में व्यवस्थ और नत हो जाती है।

डॉ. निर्मला अग्रवाल की माने तो यह कथा लेखन मुक्ति का मार्ग खोजती हुई आधुनिक स्त्री के जीवन के विविध पहलुओं को परत-दर-परत बड़ी ताकत के साथ उजागर करता है। यौन सम्बन्धों को लेकर स्त्री देह की शुचिता का प्रश्न हो, अपने व्यक्तित्व की स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने की छटपटाहट हो, पुरुष की हवस का शिकार होती हुई स्त्री का प्रतिक्रियावादी आक्रोश हो, विवाहेत्तर या विवाह पूर्व पर पुरुष से दैहिक सम्बन्ध बनाने की बात हो या फिर स्वेच्छाचारी भी पति से किनारा करने का साहस हो, गरज यह है कि बहुत से मिथक जो समाज ने स्त्री के लिये रचे हैं, स्वच्छन्द और स्वायत्त होती हुई महानगरीय स्त्री के बिना किसी अपराध बोध के वे किस प्रकार टूट रहे हैं।

इसलिये आज जरूरी हो उठा है कि जो कुछ भी उपलब्ध है – समाज या परम्परा के रूप में, संस्थाओं, इतिहास और संस्कार के रूप में – उसका बेबाक भाव से मूल्यांकन किया जाये, वर्ग-वर्ण आदि लौकिक भेदों से ऊपर उठकर व्यक्ति को समाज तथा समाज को व्यक्ति के सन्दर्भ में पढ-गुनकर उन्हें निरंतर ग्रो करने के लिये भरपूर स्पेस दिया जाये। स्त्री लेखिकाओं के लेखन के केन्द्र में स्त्री की भयावह समस्यायें हैं। पितृसत्तात्मक मर्यादाओं की तीखी आलोचना है जिसने स्त्री समाज का खुलादमन किया है।  पाश्चात्य स्त्रीलेखन की बात करें तो मेरी बॉल स्टोन क्राफ्ट, बेटी फ्रेडन, सिमोन दो बुआ, जर्मेन गियर, बलारा जेट किंग की कलमें स्त्री विमर्श पर अजीब शक्ल अख्तियार कर रही हैं वहीं भारतीय स्त्री लेखन में कृष्णा सोबती का लेखन हो अथवा महाश्वेता देवी का, मन्नू भण्डारी का लेखन हो अथवा आशापूर्णा देवी का या इस्मत चुगताई का अथवा गगन गिल का, चित्रा मुद्गल का लेखन हो अथवा मेहरुन्निसा परवेज का उसमें स्त्री मुक्ति के लिये जो फीड बैक आ रही है वह अवश्य स्त्री समाज की चेतना का विकास कर सकेगी। हालाँकि इस दिशा में एक कंकटाकीर्ण लम्बी, बीहड़ यात्रा तय करनी है।

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