समानता किस चीज की? – अमर्त्य सेन


समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसी विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समान्ता किस चीज की होनी चाहिए।

इस केंद्रीय प्रश्न ‘समानता किस चीज की ?’ का जवाब खोजने के क्रम में प्रोफेसर सेन मनुष्यों के भारी विविधताओं को केन्द्र में रखते हैं। अपंग व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, कालाजार प्रभावित इलाकों में रखते हैं। अपंग व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, कालाजार प्रभावित इलाकों में रहने वाले आदिवासी या स्वेच्छ या सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनता की सेवा करने वाले सामाजिक कार्यकर्त्ता- सभी उनकी नजर में रहते हैं और मनुष्यों का कुछ खास भला होते नहीं देखते। उनका केंद्रीकरण आमतौर पर भिन्न-भिन्न लक्ष्यों के लिए प्रयास करने की मानवीय स्वतंत्रता पर और खासतौर पर विविध मूल्यों को अर्जित करने की अलग-अलग व्यक्तियों की सामर्थ्य पर है।

स्वतंत्रता और समानता को लेकर आपके विचार चाहे जो भी हों और प्रोफेसर सेन की विचारों से उनकी कोई संगति बैठती हो या न बैठती हो पर इससे कोई संदेह नहीं कि इस विश्लेषण से गुजरने के बाद आपकी सोच का दायरा बढ़ चुका होगा।

समानता किस चीज की ?

यहाँ मेरा तर्क है कि समानता के विश्लेषण और आकलन का केंद्रीय प्रश्न है ‘समानता किस चीज की ?’ मेरा कहना यह भी है कि सामाजिक व्यवस्था की नैतिकता के प्रति जो भी दृष्टिकोण समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं, लगभग उन सबकी एक साझी विशेषता यह है कि वे किसी-न-किसी वस्तु की समानता की माँग करते रहे हैं- ऐसी किसी वस्तु की जो उस विशेष सिद्धांत में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। केवल समान-आयवादी ही (अगर इस शब्द के प्रयोग की इजाजत हो तो) समान आयों की और समान-कल्याणवादी के सामने स्तरों की माँग नहीं करते, बल्कि शास्त्रीय किस्म के उपयोगितावादी भी सभी को उपयोगिताओं को समान भारमान देने का आग्रह करते हैं और शुद्ध स्वाधीनतावादी भी अधिकारों और स्वाधीनताओं की एक पूरी श्रेणी को लेकर समानता का तकाजा करते हैं। किसी-न-किसी बुनियादी अर्थ में वे सभी ‘समानतावादी’ हैं जो किसी ऐसी वस्तु की समानता के जोरदार पक्षधर हैं जो हरेक को प्राप्त होनी चाहिए और जो खुद उनके अपने विशेष दृष्टिकोण के लिए नाजुक अहमियत रखती है। संघर्ष को समानता के ‘पक्ष’ और ‘विपक्ष’ का संघर्ष समझना (जैसाकि ग्रंथों में अकसर पेश किया जाता है) किसी के किसी केन्द्रीय तत्त्वों को अनदेखा करने के बराबर होगा।
मेरा तर्क यह भी है किसी महत्त्वपूर्ण अर्थ में समानतावादी होने की यह साझी विशेषता किसी-न-किसी स्तर पर हरेक संबद्ध व्यक्ति के प्रति समान चिंता की आवश्यकता से जुड़ी हुई है। उसके अभाव में किसी भी प्रस्ताव की समाजाकि विश्वसनीयता जाती रहेगी।

केन्द्रीय समानता और व्युत्पन्न समानता

प्रश्न ‘समानता किस चीज की ?’ की केन्द्रीय भूमिका यह संकेत देती है कि विभिन्न धाराओं के विवादों को हम इसी आधार पर समानता की माँग जानी चाहिए। क्रिया किस चीज को मानते हैं जिसके आधार पर समानता की माँग जानी चाहिए। फिर यही माँगें दूसरे सामाजिक निर्णयों की प्रकृति को मर्यादित करती हैं। एक चर (वैरिएबुल)* के आधार पर समानता की माँग का मतलब यह होता है कि वह सिद्धांत-विशेष किसी दूसरे चर के सिलसिले में विषमतावादी हो सकता है क्योंकि दोनों में विषमतावादी हो सकता है क्योंकि दोनों परिप्रेक्ष्यों के बीच टकराव ऐन मुमकिन है।

मिसाल के लिए बहुत सारी वस्तुओं पर समान अधिकारों की माँगे करने वाला स्वाधीनतावादी अगर अपने विचारों के प्रति ईमानदार है तो वह आयों की समानता पर जोर नहीं दे सकता। इसी तरह उपयोगिता की हर इकाई के लिए समान भगवान* की माँग करने वाला उपयोगितावादी अगर अपने विचारों के प्रति ईमानदार है तो वह स्वतंत्रताओं के अधिकारों की भी समानता का तकाजा नहीं कर सकता है। (ठीक इसी कारण से वह विभिन्न व्यक्तियों को प्राप्त उपयोगिताओं के समग्र स्तरों की समानता का आग्रह भी नहीं कर सकता।) जिसे हम ‘केंद्रीय सामाजिक कार्यकलाप समझते हैं उसमें समानता की इच्छा करने वालों के साथ हमें दूरस्थ ‘परिधियों’ पर विषमता को भी स्वीकार करना पड़ता है। विवादों का विषय अंतत: केंद्रीय सामाजिक व्यवस्था का निश्चय होता है।

अपरिहार्य माँगें और गौण विशेषताएँ

वास्तव में प्रश्न ‘समानता किस चीज की ?’ के उत्तर दिए जाते हैं वे ही सामाजिक व्यवस्था के विभिन्न नैतिक सिद्धांतों के वर्गीकरण के आधार भी होते हैं। वर्गीकरण का यह सिद्धान्त प्रत्येक दृष्टांत में यह स्पष्ट करता है कि अपरिहार्य विशेषताएँ कौन-कौन  सी हैं और कौन से संबंध महज गौण या आकस्मिक हैं। मिसाल के लिए एक स्वाधीनतावादी इसी तकाजे को केंद्रीय समझता है। कि वैयक्तिक स्वाधीनताओं की किसी विशेष श्रेणी पर सबका समान अधिकार हो। तो फिर एक स्वाधीनतावादी के रूप में वह आयों की समानता पर एतराज नहीं करेगा, बशर्ते कि कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण ऐसी समानता प्राप्त हो सके। लेकिन अगर परिस्थितियाँ भिन्न हों तो वह स्वाधीनताओं की समानता का पक्ष लेगा, न कि आयों की परिस्थितिजन्य समानता का।

इस सिलसिले में विलर्ड क्वाइन ने हाल ही में मुझे सुझाव दिया कि मैं इन दो के बीच तुलना के प्रायस करूँ : (1) सामाजिक व्यवस्था के नीतिशास्त्र के लिए वर्गीकरण का वह सिद्धांत जो उन समानताओं पर आधारित है जिनको (वास्तविक संबंधों के रूपांतरण की दशा में) बचा लिया जाता है; और (2) वर्गीकरण के वे सिद्धांत जो फेलिक्स क्लाइन के ज्यामितिक संश्लेषण प्रयास में (उनकी रचना एर्लांगेर प्रोग्राम में) प्रयुक्त हुए हैं और जिनका आधार किसी अंतराल की वे विशेषताएँ हैं जो रूपांतरणों के किसी विशेष समूह के लिए अपरिहार्य हैं। मेरा खयाल है कि यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सामान्य संबंध पाया जाता है जो काफी ज्ञानवर्धक साबित हो सकता है, हालाँकि मैंने प्रस्तुत पुस्तक में इस संबंध की छानबीन नहीं की है।

मानवीय विविधता और असंबदंध समानताएँ

व्यावहारिक स्तर पर प्रश्न ‘समानता किस चीज की ?’ का महत्त्व मानव की वास्तविक विविधता की देन है, और इसीलिए एक चर के आधार पर समानता की माँग, सिर्फ सिद्धांत में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी, किसी और चर के आधार पर समानता की माँग से टकराती हैं। अपनी आंतपिक विशेषताओं (जैसे आयु, लिंग, सामान्य, योग्यताओं, विशेष वस्तुओं के स्वामित्व, सामाजिक पृष्ठभूमियों, परिवेशजन्य स्थितियों आदि) के मुआमले में भी हमारे बीच भारी विविधताएँ मौजूद हैं। ठीक यही विविधता है जिसके कारण एक क्षेत्र में समानता का आग्रह करते हुए हमें किसी और क्षेत्र में समानता की माँग को अस्वीकार करना पड़ता है।

इस तरह प्रश्न ‘समानता किस चीज की ?’’ के तात्त्विक महत्त्व का संबंध व्यापक मानवीय विविधता के अनुभवसिद्ध तथ्य से है। समानता की जो सैद्धान्तिक और व्यावहारिक-पड़ताले पहले से मौजूद एकरूपता की मान्यता से शुरू होती हैं (जिसमें यह मान्यता भी शामिल हैं कि ‘सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं’), वे समस्या के एक अहम पहलू को समझने से वंचित रहती हैं। मानव विविधता कोई दोयज दर्जे की समस्या नहीं है (कि उसे अनदेखा कर दिया जाए; उसे ‘बाद में कभी’ देख लिया जाए); यह समानता में हमारी रुचि का एक बुनियादी पहलू है।

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