निगाहों के साये


जाँ निसार अख्तर एक बोहेमियन शायर थे। उन्होंने अपनी पोइट्री में क्लासिकल ब्यूटी और मार्डन सेंसब्लिटी का ऐसा संतुलन किया है कि शब्द खासे रागात्मक हो गए हैं। उन्होंने जो भी कहा खूबसूरती से कहा-
उजड़ी-उजड़ी सी हर एक आस लगे
जिन्दगी राम का वनवास लगे
तू कि बहती हुई नदिया के समान
तुझको देखूँ तो मुझे प्यास लगे

जाँ निसार अख्तर के बेशतर अश्आर लोगों की जबान पर थे और हैं भी। अदबी शायरी के अलावा उन्होंने फिल्मी शायरी भी बड़ी अच्छी की है जो अदबी लिहाज से निहायत कामयाब रहे।

जैसे-

           आँखों ही आँखों में इशारा हो गया
बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया।
या
अय दिल-ए-नादाँ
आरजू क्या है
जुस्तजू क्या है
अय दिल-ए-नादाँ

फिल्मी दुनिया में दो ही तरह के शायर मिलते हैं। एक तो वो जिन्हें फिल्म जगत शायर बना देता है दूसरे वो जो खुद शायर होते हैं और अपने दीवान के साथ फिल्म इंडस्ट्री ज्वाइन करते हैं। जाँ निसार दूसरे तरह के शायर थे। फिल्म जगत में आने से पहले ही न सिर्फ वो एक स्थापित शायर थे बल्कि उनकी कई किताबें और कई नज्में-गजलें मशहूर हो चुकी थीं।

1935-36 में तरक्कीपसन्द आन्दोलन से जुड़े एक अहम शायर थे जाँ निसार अख्तर। उनके समकालीनों में सरदार जाफरी, फैज अहमद, फैज और साहिर लुधियानवी प्रमुख थे। जाँ निसार उसी पाये के शायर थे। उनकी एक नज्म है ‘आखिरी मुलाकात’ जिसके बारे में मेरा ख्याल है कि ये पिछले पचास सालों में उर्दू में लिखी गई एक बेहद आउटस्टेंडिग नज्म है-
        मत रोको इन्हें पास आने दो
ये मुझसे मिलने आए हैं
मैं खुद न इन्हें पहचान सकूँ
कुछ इतने धुँधले साए हैं

शायर के हर इशारे के पीछे उसके जीवन का एक वाकिया छिपा है। यही इस नज्म की खूबसूरती है और ऐसी नज्म उर्दू में सिर्फ जाँ निसार अख्तर ही के पास है। जाँ निसार अख्तर साहब कमाल अमरोहवी की ‘रजिया सुल्तान’ के सोलो सांग राइटर थे। मगर जिन्दगी ने उनके साथ बेवफाई की और फिल्म के पूरी होने के पहले ही वौ जिन्दगी से रुखसत हो गए। तब जाकर कमाल साहब ने मुझे बुलाया और मैंने उस फिल्म के आखिरी दो नग्मे लिखे।

जाँ निसार अख्तर की बेगम साफिया अख्तर भी बहुत अच्छी राइटर थीं। उन्होंने एक बहुत अच्छा आर्टिकिल भी लिखा था। अपने शौहर जाँ निसार पर ‘घर का भेदी’ नाम से उसमें लिखा था कि ‘जाँ निसार, ज्यादा लिखना और तेजी के साथ लिखना बुरा नहीं, उस्तादोंवाली बात है लेकिन में चाहती हूँ कि तुम रुक-रुक के और थम-थम के लिखो।’
एक बात और, तरक्कीपसन्द शायरों को आप दो-तीन कैटगरीज में बाँट सकते हैं। एक में सरदार जाफरी, कैफी आजमी और नियाज हैदर टाइप शायर हैं। दूसरी में साहिर लुधियानवी और सलाम मछली शहरी टाइप शायर। लेकिन तीसरी कैटेगरी में कुछ ऐसे पोइट हैं जो निहायत म्यूजिकल भी हैं जैसे मजाज, जज्बी और यही जाँ निसार अख्तर। यही वजह है कि जाँ निसार फिल्मों में इतने कामयाब रहे। वो मध्यप्रदेश के एक बहुत ही रागात्मक क्षेत्र तानसेन की बस्ती ग्वालियर के निवासी थे। उनके शब्दों के ढलाव औऱ सजाव में उस नगर की रागात्मकता ही नहीं, हिन्दी और उर्दू के क्लासिकल काव्य परम्परा के जुड़ाव भी हैं। अपनी जिन्दगी अपने तौर पर जी और अपनी ही शर्तों पर सहित्य की रचना की जाँ निसार अख्तर ने।मैं विजय अकेला को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ जिन्होंने इस किताब को संपादित करके फिल्म जगत के एक महत्वपूर्ण गीतकार को पाठकों तक पहुँचाया और इस ओऱ भी इशारा किया है कि गीतकारिता में अगर साहित्य भी मिल जाए तो फिल्म-गीत भी लम्बी उम्र पा लेते हैं जैसे जाँ निसार के इस गीत ने पाई है-

ये दिल और उनकी निगाहों के साये

                मुझे  घेर  लेते  हैं  बाँहों  के  साये

विजय अकेला एक गीतकार हैं। फ़िल्म ‘कहो ना प्यार है’ और ‘कृश’ में इनके लिखे गीत काफी सराहे गए हैं।  विजय अकेला मुम्बई में रहते हैं और एफ़एम रेडियो जॉकी भी हैं। भारतवर्ष के अलावा इनकी आवाज़ खाड़ी-देशों में भी सुनने को मिलती है।  ‘निगाहों के साये’ से पहले इन्होंने आनन्द बख़्शी के गीतों का संकलन ‘मैं शायर बदनाम’ भी तैयार किया था।  जाँ निसार अख़्तर के फ़िल्मी नग़में साहिर लुधियानावी शायरी की तरह तख़्लीक़ीयत और ग़िनाइयत की बदौलत हमेशा तर-ओ ताज़ा रहेंगे। ऐसे सच्चे शायर की जगह तारीख़ में तो होती है लोगों के दिलों में भी महफ़ूज़ रहती है। – डॉ. गोपीचन्द नारंग

जाँ निसार के गीतों ने अदब और तहज़ीब का दामन कभी नहीं छोडा बल्कि इनके गीतों में शायर का जो एक अक़्स है वह कभी ग़ायब नहीं हुआ।….फ़िल्मी गीतों में भी उनकी असल शायरी की महक और ख़शबू मौजूद रही। हसन कमाल

मेरी मुसीक़ी की कामयाबी में बहुत ही अहमतरीन भूमिका निभाई थी जाँ निसार साहब की राइटिंग ने। आप ही बताइए ‘अय दिल-ए-नादाँ….’ क्या ग़ज़ब का गीत नहीं है ? यह नग़मा अपने आप में रेवोल्यूशन था रेवोल्यूशन। ख़य्याम

गोल्डेन एरा के एक उम्दा शायर थे जाँ निसार अख़्तर।आशा भोंसले

जाँ निसार अख़्तर एक बोहेमियन शायर थे। उन्होंने अपनी पोइट्री में क्लासिकल ब्यूटी और मार्डन सेंसब्लिटी का ऐसा सन्तुलन किया है कि उनके शब्द ख़ासे रागात्मक हो गए है उन्होंनें जो भी कहा ख़ूबसूरती से कहा-

उजड़ी–उजड़ी सी हर एक आस लगे

जिन्दगी राम का वनवास लगे

तू कि बहती हुई नदियों के समान
तुझको देखूँ तो मुझे प्यास लगे

जाँ निसार अख़्तर के बेशतर अश्आर लोगों की ज़वान पर थे और हैं भी।  अबदी शायरी के अलावा उन्होंने फ़िल्मी शायरी भी बड़ी अच्छी की है जो अदबी से भी निहायत कामयाब रहे। जैसे-

आँखों ही आँखों में इशारा हो गया

बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया
या
अय दिले-ए-नादाँ
आरज़ू क्या है
जुस्तज़ू क्या है
अय दिल-ए-नादाँ

फ़िल्मी दुनिया में दो तरह के शायर मिलते हैं। एक तो वो जिन्हें फ़िल्म जगत शाय़र बना देता है दूसरे वो जो ख़ुद शायर होते हैं और अपने दीवान के साथ फ़िल्म इंडस्ट्री ज्वाइन करते हैं। जाँ निसार दूसरे तरह के शायर थे। फ़िल्म जगत में आने से पहले ही न सिर्फ़ वो एक स्थापित शायर थे बल्कि उनकी कई किताबें और कई नज्में-ग़ज़लें मशहूर हो चुकी थीं। 1935-36 में तरक़्क़ीपसन्द आन्दोलन से जुड़े एक अहम शायर जाँ निसार अख्तर। उनके समकालीनों में सरदार जाफ़री, फ़ैज़ अहमद फै़ज़ और साहिर लुधियानवी प्रमुख थे। जाँ निसार उसी पाये के शायर थे।

उनकी एक नज़्म है ‘आखि़री मुलाक़ात’ जिसके बारे में मेरा अपना ख़्याल है कि ये पिछले 50 सालों में उर्दू में लिखी गई एक बेहद आउट स्टेंडिंग नज़्म है-
मत रोको इन्हें पास आने दो,
ये मुझसे मिलने आए हैं
उन करोंड़ों लोगों के नाम जिन्होंने
जाँ निसार अख़्तर के गीतों को
गाया-गुनगुनाया
और
अपनी माशूक़ शहनाज़
के भी नाम
निगाहों के साये

भई जाँ निसार अख़्तर थे जाँ निसार अख़्तर

आशिक़ से बढ़के आशिक़ शायर से बढ़के शायर
जाँ निसार अख़्तर से न तो कभी मेरी कोई मुलाका़त हुई न मैंने उन्हें कभी देखा ही है। मगर ऐसा क्यूँ है कि इनसान को अपने उसी महबूब के दीदार और दर्शन सबसे ज़्यादा होते हैं जिसे वह कभी नहीं देखता ?  हाँ, मैंने देखा है जाँ निसार को। कभी उनकी साथिन सफ़िया अख़्तर के ख़तों के ज़रिए कि देखो साथी हौसला न छूटे। मैं हूँ न तुम्हारे साथ। तो कभी शाय़र निदा बताते हैं कि जाँ निसार साहिर लुधियानवी के घोस्ट राइटर थे।  कभी जाँ निसार को मैंने सरदार जाफ़री और मजरूह सुल्तानपुरी की यादों की बारात में पाया कि तरक़्कीपसन्द जमात के एक अलबेला शायर है जिसको अपनी शायरी में चीख़ते रंग पसन्द नहीं है बल्कि उसकी शायरी घर में सालन की तरह धीमी-धीमी आँच पर पकती है।’जाँ निसार का एक रूप उनके बेटे जावेद अख़्तर भी तो पेश करते हैं—डी. के गुप्ता (त्रिशूल) और अश्वनी कुमार (शक्ति) के रूप में, अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में। जहाँ बेटा, बाप से नाराज़ है। जहाँ दोनों के बीच तनाव है, टकराव है और अन्त में बाप पर बेटे की विजय है। बाप सफल तो है, मशहूर तो है मगर अपनी कारगुज़ारियों पर शर्मिन्दा भी है। उसके लिए अपने बेटे के सवालों का जवाब देना आसान नहीं है कि बाप बेटे की निगाहों से अपनी निगाहें नहीं मिला सकता।  मुझे आश्चर्य होता है कि जाँ निसार अख़्तर पर Romance  का जो एक क़ुदरती रंग सबसे ज़्यादा छाया रहा और जिसकी ही असल में सबसे ज़्यादा प्रशंसा और तारीफ़ होनी चाहिए थी कि जिसमें तसव्वुफ़ भी शामिल है उनको उस ढंग से समझने बूझने की कोशिश क्यों नहीं कि गई ? यह चेहरा क्यूँ छिपाया गया था फिर इस अख़्तर के साथ ऐसा क्यूँ किया गया ?

मैं जाँ निसार अख़्तर को इल्म और फ़िल्म दोनों क्षेत्रों का अन्यतम रुमानी शायर मानता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि शायर की ज़िन्दगी की असल लड़ाई ही Romance  को लेकर थी, Romance के लिए थी। वह जिया भी तो इसी Romance को ज़िन्दा रखने के लिए और मौत को भी गले लगाया तो इसी Romance की आबरू बचाने के लिए। Romance जाँ निसार का ओढ़ना बिछौना था, नियति थी। उनके रग-ओ-रेशों में Romance ही जैसे लहू बनके दौड़ता था। मज़े की बात तो यह है कि शायर जाँ निसार ने अपनी राष्ट्रवादी और समाजवादी शायर को भी इसी Romance के गंगाजल से सींचा है। अख़्तर की पूरी ज़िन्दगी और जाँ जैसे निसार थी उनके लिखे इन शे’रों’ पर कि-

ये हमसे न होगा कि किसी एक को चाहें
अय इश्क़ हमारी न तेरे साथ बनेगी
या
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो
एक-सी होती है हर इक रागिनी ये मत कहो
या
सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया
जाने किसका  नाम खुदा था पीतल के गुलदानों पर
या
सोचो तो बडी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए है

…..और जब हम नज़र डालते हैं जाँ निसार के फ़िल्मी गीतों पर तो वहाँ भी यही अहसास होता है कि इस गीतकार ने अपने इन पाक-ओ-पवित्र गीतों की आत्मा को जीवित रखने के लिए, उनका मान बढा़ने के लिए बहुत कष्ट सहे हैं और बहुत कुछ सहने को तैयार हैं। गीतकार जाँ निसार अख़्तर ने लिखा था-

‘आप यूँ फ़ासलों से गुज़रते रहे
दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही
आहटों-सी अँधेरे चमकते रहे
रात आती रही रात जाती रही
आप यूँ फ़ासलों से….
आपकी गर्म बाँहों में खों जाएँगे
आपके नर्म शानों पे सो जाएँगे
मुद्दतों रात नीदें चुराती रही
आप यूँ फ़ासलों से….
या
‘अय दिल-ए-नाँदा
आरजू़ क्या है
जुस्तजु क्या है
अय दिल-ए-नादाँ
हम भटकते हैं
क्यूँ भटकते हैं
दश्त-ओ-सहरा में
ऐसा लगता है
मौज प्यासी है
अपने दरिया में
कैसी उलझन है
क्यूँ ये उलझन है
एक साया-सा
रूबरू क्या है
अय दिल-ए-नादाँ
या
ये दिल और उनकी निगाहों के साये
मुझे घेर लेते हैं बाहों के साये
ये दिल और उनकी…
धड़कते हैं दिल कितनी आज़ादियों से
बहुत मिलते-जुलते है इन वादियों से
मुहब्बत के रंगीं पनाहों के साये
ये दिल और उनकी……
या
चोरी-चोरी कोई आए…
चुपके-चुपके सबसे छुपके
ख़्वाब कोई दे जाए
चोरी-चोरी कोई आए….
मीठे-मीठे बोलों से
दिल पे ऐसा जादू डाले
खोई-खोई जाऊँ मैं
जो भी चाहे मनवाले
मुझको चूमे दिल तो झूमे
आँख मगर झुक जाए
चोरी-चोरी कोई आए….
 यह जाँ निसार अख़्तर का पहला फ़िल्म गीत संग्रह है-‘निगाहों के साये’ और इसमें जाँ निसार के कुल 248 फ़िल्म-गीतों में सिर्फ़ 151 गीतों को संकलित किया गाया है जिन्हें आप गीत कम और पुरसुकून Romance की पगध्वनियाँ कहना ज़्यादा पसन्द करेंगे। मैं तो खै़र इन्हें गुनगुनाते झरने, खनकती चू़डियाँ, सावन की बदलियाँ, खा़मोशियों की दिलकश सरगोशियाँ और पता नहीं क्या कुछ कहूँगा।  जाँ निसार अख़्तर ने फ़िल्मों में जो कुछ लिखा Correct Grammar के साथ लिखा। अपनी फ़िक्र लिखी या उनका जिक्र लिखा गीत, ग़ज़ल नज़्म और नस्त्र जैसी सारी विधाओं की परम्परा को निभाते हुए लिखा। इस बात का जिक्र यहाँ इसीलिए कर रहा हूँ क्योंकि बड़े से ब़ड़ा अदबी शायर भी जब फ़िल्मों के गीत लिखने आता है और जब उसे धुन की गिरफ़्त में बँधकर लिखना पड़ता है तो उसे अजीब-ओ-ग़रीब समझौते करने पड़ते हैं। फिर तो आलोचनाओं का जवाब भी उन्हें कुछ अंदाज में देना पड़ता है कि-‘मैंने तो जान-बूझकर नए Grammar बनाए हैं’ या ख़्यालों को भी आप Grammar के बन्धन में बाँधकर संकीर्ण करेंगे क्या ?’सच तो यह है कि अख़्तर की शायरी की जड़े इतनी गहरी हैं कि शाखों पर सब़्ज और सुनहरी कोंपलें तो उगनी ही थीं और उनमें रंग-बिरंगे, पीले-नीले फूल तो खिलने ही थे। फिर पतझड़ का मौसम तो आना ही था। वापिस बहार भी आनी ही थी। सो बहारें आती रहीं, जाती रहीं। पतझड़ भी आते रहे, जाते रहे, और  जाँ निसार अपने तख़ल्लुस अख़्तर याने सितारा की मानिन्द इल्म-ओ-फ़िल्म के आकाश पर चमकते रहे, दमकते रहे। जाँ निसार अख्तर उस मशहूर-ओ-मारुफ़ शायर मुज़्तर खै़राबादी के बेटे थे जिसका नाम सुनकर शायरी किसी शोख़ नाज़नीं की तरह इठलाती है। जाँ निसार उस शायरी के सर्वगुण सम्पन्न और मशहूर शायर सय्यद अहमद हुसैन के पोते थे जिनके कलाम पढ़ने भर ही से आप Intellectual  कहलाते हैं। हिरमाँ जो उर्दू अदब की तवारीख़ में अपना स्थान बना चुकी हैं वे जाँ निसार अख़्तर की दादी ही तो थीं जिनका असल नाम सईदुन-निसा था। अब यह जान लीजिए कि हिरमाँ के वालिद कौन थे। वे थे अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक़ खै़राबादी जिन्होंनें दीवान-ए-ग़ालिब का सम्पादन किया था और जिन्हें 1857 के सिपाही-विद्रोह में शामिल होने और नेतृत्व करने के जुर्म में अंडमान भेजा गया था। कालापानी की सजा सुनाई गयी थी।

शायर की बेगम का नाम साफ़िया सिराज-उल-हक़ था, जिसका नाम भी उर्दू अदब में उनकी किताब ‘ज़ेर-ए-नज़र’ की वजह से बड़ी इज़्ज़त के साथ लिया जाता है। और साफ़िया के भाई थे मजाज़। उर्दू शायरी के सबसे अनोखे शायर।
आज के मशहूर विचारक डॉ. गोपीचन्द्र नारंग ने तो इस ख़ानदान के बारें में यहाँ तक लिख दिया है कि इस खा़नदान के योगदान के बग़ैर उर्दू अदब की तवारीख़ अधूरी है।

मिर्ज़ा दाग़ देहलवी के शागिर्द जनाब नारायण प्रसाद मेहर को शायरी में अपना उस्ताद मानने वाले जाँ निसार अख़्तर ने 1947 के सितम्बर महीने में मज़हवी दंगों की वजह से पहले ग्वालियर के कॉलेज के उर्दू के प्रोफ़ेसर की नौकरी छोड़ी फिर भोपाल गए और वहाँ पर कुछ अरसा हमीदिया कॉलेज में उर्दू के प्रोफे़सर रह और अन्ततः 1948 में उस नौकरी से भी इस्तीफ़ा देकर मुम्बई चले आए। वस्तुतः उन दिनों कांग्रेस सरकार ने तरक़्क़ीपसन्द शायर-अदीबों को उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में ख़ासा परेशान करना शुरु कर दिया था। पक़ड़-पकड़ कर जेल में डालना शुरु कर दिया था।
इधर 1947-48 में मुम्बई फ़िल्म-इंडस्ट्री धीरे-धीरे प्रगतिशील साहित्यकारों का एक ऐसा वतन बनती जा रही थी जिस वतन में उन्हें रचनात्मक सुकून और शोहरत हासिल हुई जा रही थी।…और इसके एवज में अपनी नई तरह की पोइट्री कहानी, संवाद और निर्देशन से ये जोशीले नौजवान फ़िल्म जगत में ऐसे-ऐसे कारनामे अंजाम दिए जा रहे थे कि आज भारतवर्ष  ही नहीं बल्कि पूरा विश्व उस Golden Era पर नाज़ करता है।
आज क्या नहीं है हमारे पास ? तकनीक है पैसा है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण है मगर वैसे जज़्बों के नहीं होने की वजह से पूरा का पूरा फ़िल्म-आन्दोलन दिशाहीन-सा हो गया है।

कहते हैं कि एक सदी की क़िस्मत सँवारने के लिए सिर्फ़ एक ही शायर का होना काफ़ी होता है। लेकिन उस दौर में सब थे-साहिर, मजरूह, शकील, कैफ़ी, शैलेन्द्र और जाँ निसार अख़्तर मुम्बई आकर पहले एक महीने तो इस्मत चुग़ताई के यहाँ रहे और अपना Struggle  शुरु किया। यह बात 1948 की है और इसी साल उर्दू के इस प्रोफ़ेसर की पहली फ़िल्म मिली-‘शिकायत’। संगीतकार थे राशिद आत्रे और गीत के बोल थे-

कोलतार में रंग दे पिया मोरी चुन्दरिया
इसे मुहम्मद रफ़ी, दुर्रानी, खा़न मस्ताना ने गाया था। और फिर आई ‘आरज़ू’। फिर ‘खेल’, फिर ‘अनारकली’। जाँ निसार अख़्तर की तमाम फ़िल्मों की लिस्ट भी इस किताब के आख़िरी भाग में शामिल है। तो एक बार जब ‘अनारकली’ हिट हुई और उसका गीत अवाम ने सुना-
आ जान-ए-वफ़ा आ
कहते हैं किसे प्यार ज़माने को दिखा दे
दुनिया की नज़र इश्क़ के क़दमों पे झुका दे
और ख़ाततौर पर गीत का तीसरा अन्तरा सुना-
दीवाना महब्बत का कहीं डर के रुका है
दरबार में शाहों के कहीं इश्क़ झुका है
ख़ुद इश्क़ के दरबार में शाहों को झुका दे
आ जान-ए-वफा़ आ…तो फ़िल्मी हलक़ों में जाँ निसार अख़्तर के लिए खुलकर वाहवाही निकली। और जाँ निसार सबकी निगाहों में आ गए और छा गए।
आज रोशन का साथ मिला तो कल आप सी. रामचन्द्र के साथ हुए तो परसों एन. दत्ता के। लेकिन जिस एक संगीतकार ने आपसे सबसे ज़्यादा आशिक़ी की वे थे ओ.पी. नैयर।…और ओ.पी. नैयर की शोहरत उन दिनों मुम्बई और फ़िल्म-जगत में क्या थी यह वही जानते हैं जो उस जमाने के हैं।
अख़्तर की Life के कुछ सर्वश्रेष्ठ गीत संगीतकार ख़य्याम के साथ भी हैं। खै़र, ‘अनारकली’ के बाद ‘बाराती’, ‘बाप रे बाप’ ‘यास्मीन’ और ‘छू मन्तर’ फिर आई ‘सी, आई. डी.’ और फिर नया अन्दाज़’। एक तरफ़
आँखों ही आँखों में इशारा हो गया
बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया….(सी.आई.डी.)
की धूम थी तो दूसरी ओर
मेरी नींदों में तुम
मेरे ख़्वाबों में तुम
हो चुके हम तुम्हारी
महब्बत में गुम…(नया अंदाज़ )
गीत की। जाँ निसार अख़्तर को भारतीय सिनेमा ने अपना बना लिया था। जाँ निसार के साथ अगर ट्रैजडी थी तो बस यही कि इनको अब तक solo lyric writing का अवसर नहीं मिल रहा था। एक-दो फ़िल्मों को छोड़कर।…और अफ़सोस ! यह सिलसिला इनके career में अन्त तक चला। अपनी पूरी ज़िन्दगी में गीतकार ने 80 फ़िल्मों में सिर्फ़ 10 फ़िल्में Solo lyric writer के तौर पर की।बात चली है तो बताऊँ कि कैसे एक फ़िल्म को सही तरीके़ से handle करने के लिए सिर्फ़ एक ही डायरेक्टर का होना अच्छी बात है उसी समय असल में उसी एक गीतकार को यह पता होता है कि उसने उस फ़िल्म को अपने पिछले गीत के ज़रिए किस lyrical  मोड़ पर छोड़ रखा था और अगले गीत को उसी lyrical सूत में मिलाते हुए किस मोड़ तक ले जाना है।  अलावा इसके, जब भी एक फ़िल्म में एक से ज्या़दा गीतकार हुए हैं इतिहास ने गवाही दी है कि इनके गीत उनके नाम से मंसूब हुए और उनके गीत इनके नाम से।  यह सच है कि फ़िल्म-जगत में असल जादू जोड़ियों का चलता है। यहाँ भी अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता।  जाँ निसार की जोडी़ फ़िल्मों में उस ओ.पी. नैयर के साथ जमी जो और भी गीतकारों के संग जोड़ियाँ बनाकर काम करते थे। फिर अचानक ओ.पी. नैयर इनसे और ये ओ.पी. से रूठ से गए और 1960 के बाद दोनों ने संग-संग कभी काम नहीं किया। नैयर के अलावा इन्हें 9 फ़िल्मों में ख़्य्याम और 7 फ़िल्मों में सी, अर्जुन का साथ मिला।

हमारे देश में फ़िल्में बहुत लोकप्रिय हैं। फ़िल्में यहाँ सबकी समझ में खूब आती हैं मगर फ़िल्म-जगत का खेल किसी को समझ में नहीं आता। एक जुमले में बात यह है कि फ़िल्मों को इतने अच्छे-अच्छे गीत देनेवाले जाँ निसार को फ़िल्म-जगत ने वह सम्मान नहीं दिया, वह इज़्ज़त नहीं बख़्शी जिसके वे हक़दार थे। ज़िन्दगी जाँ निसार के अज़ीजों-साहिर, मजरूह शकील, शैलेन्द्र और कैफ़ी पर तो मेहरबान थी, मगर जाँ निसार पर नहीं। अख़्तर अक्सर गर्दिश में ही रहा।  बाद के वर्षों में आनन्द बख़्शी के नाम का भी डंका बजा और सिक्का चला मगर फ़िल्मी जगत ने जाँ निसार को एक दिन का बादशाह भी नहीं बनाया। उनकी ‘नीरी’ और ‘रज़िया सुल्तान’ के गीत ख़ूब hit हुए मगर तब तक शायर का जनाज़ा उठ चुका था। ‘नूरी’ का title track को आज भी rimix सुनने वालों की पहली पसन्द है।

फ़िल्म-जगत वह जगत है जहाँ हर पल एक आस-सी बँधी रहती है। जीते-जी ही नहीं मौत के बाद भी। यहाँ इनसान अपनी ज़िन्दगी की बरबादी का तमाशा ख़ुद ही देखता रहता है। आग लगी रहती है और उसमें सबकुछ जलता रहता है अगर ज़िन्दगी अक्सर जाँ निसार से रूठी-रूठी-सी रही तो उन्होंने भी इसे मनाने की कोई कोशिश नहीं की। जो बिगड़ा उसे जैसे और भी बिगड़ने दिया, सँवारा नहीं। जैसे किसी बात को लेकर ठन-सी गई हो दोनों में। हाँ, अपने ग़म को कम करने के लिए इस शहर के बारे में इतना ज़रूर लिखा-

ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझको सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हमने तेरा कर्ज़ उतारा ही न हो
शर्म आती है कि उस शह में हम हैं कि जहाँ
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो

लेकिन ज़िन्दगी चाहे मन से गुज़रे बेगम से, एक दिन तो ग़ुजर ही जाती है। हमारी खुशी या नाराज़गी से या फिर हमारी सफलता या विफलता से ज़िन्दगी की रफ़्तार में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। और फिर हमारे गुज़रने के बाद ज़माना एक तरफ हमारे तजुरबों से सबक़ लेता है दूसरी तरफ़ ढूँढता है हमारे सरमाये को।

12 बरस की उम्र में अपनी पहली ग़ज़ल कहने वाले जाँ निसार 1939 ई. के अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के गोल्ड मेडेलिस्ट एम.ए. थे। 18 अगस्त 1976 ई. को दिल के दौरे की वजह से इस जहान-ए-फ़ानी को खै़रबाद कहने वाले जाँ निसार का आबाई वतन भी ख़ैराबाद ज़िला सीतापुर था। 8 फ़रवरी 1914 को ग्वालियर में पैदा हुए थे। जाँ निसार  की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई ग्वालियर ही में हुई थी। सातवीं में थे जब आपने अपनी पहली ग़ज़ल कही थी। इस ग़ज़ल पर आपने अपने अब्बा हुज़ूर जनाब मुज़्तर खै़राबादी से इस्लाह ली थी। 1934 में आपने इंटरमीडिएड की परीक्षा पास की थी और फिर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पहले 1937 में उर्दू में बी.ए. किया फिर 1939 में एम.ए.।

-विजय अकेला

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