निगाहों के साये


जाँ निसार अख्तर एक बोहेमियन शायर थे। उन्होंने अपनी पोइट्री में क्लासिकल ब्यूटी और मार्डन सेंसब्लिटी का ऐसा संतुलन किया है कि शब्द खासे रागात्मक हो गए हैं। उन्होंने जो भी कहा खूबसूरती से कहा-
उजड़ी-उजड़ी सी हर एक आस लगे
जिन्दगी राम का वनवास लगे
तू कि बहती हुई नदिया के समान
तुझको देखूँ तो मुझे प्यास लगे

जाँ निसार अख्तर के बेशतर अश्आर लोगों की जबान पर थे और हैं भी। अदबी शायरी के अलावा उन्होंने फिल्मी शायरी भी बड़ी अच्छी की है जो अदबी लिहाज से निहायत कामयाब रहे।
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गणेश शंकर ’विद्यार्थी‘ का अद्‌भुत ‘प्रताप’


साहित्य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्ति की ज्वाला क्रान्तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ’विद्यार्थी’ साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्तम्भ थे, जिनके अखबार ’प्रताप’ ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना।

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टेप जो कहते हैं


एक वक्त था जब संपादकों को देखा या सुना नहीं, केवल पढ़ा जाता था। इस ‘आइवरी टॉवर’ रवैये की बेहतरीन मिसाल 1960 के दशक के एक शीर्ष संपादक एनजे नानपोरिया थे। एक बार जब वह बाजार में खरीदारी कर रहे थे, उन्होंने पाया कि एक शख्स लगातार उन्हें देखकर मुस्करा रहा है। कौतूहलवश उन्होंने पूछा कि वह कौन है। उसने कहा, ‘मैं आपका चीफ रिपोर्टर हूं सर!’ मुमकिन है कि यह किंवदंती हो, लेकिन यह बताती है कि किस तरह गुजरे जमाने के संपादक कभी-कभार ही अपने केबिन से बाहर कदम रखते थे। आज के टेलीविजन युग में स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है, जहां संपादक-एंकर फौरन पहचान ली जाने वाली सेलेब्रिटी बन चुके हैं।

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कश्‍मीर: इस रात की सुबह है भी?


कश्‍मीर में शांति कैसे आए, इसका जवाब ढूंढने के लिए नई दिल्‍ली में सभी राजनीतिक दलों के नेता बैठे तो सही, लेकिन जवाब मिला नहीं। इससे पहले कैबिनेट की सुरक्षा समिति (सीसीएस) भी इस मामले में कोई निर्णय नहीं ले सकी थी। पर क्‍या यह सह नहीं है कि हल ढूंढने की यह ‘बेताबी’ अगर शुरुआत में ही दिखाई जाती तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।

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जब पाकिस्तान के 65 टैंक किए थे तबाह


सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सात से 11 सितंबर तक चली फिल्लौर की लड़ाई को आज भी सेना इतिहास में सबसे घातक जंग का दर्जा दिया जाता है। यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें भारतीय सेना ने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय उस समय के सबसे आधुनिक अमेरिका निर्मित पैटर्न टैंकों सहित पाकिस्तान की पूरी डिवीजन को तबाह कर दिया था।

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एक राजनीतिक ड्राफ्ट के मायने


कांग्रेस के पास पूंजीवादी राज्य नहीं है और आदिवासी-ग्रामीणों को लेकर जो प्रेम सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी दिखला रहे हंै, उसके पीछे खनिज संसाधनों से परिपूर्ण राज्यों की सत्ता पर काबिज होने का प्रयास है। कांग्रेस की रणनीति ओडीशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और कर्नाटक को लेकर है। चूंकि अब राज्यसत्ता का महत्व खनिज और उसके इर्द-गिर्द की जमीन पर कब्जा करना ही रह गया है, इसलिए कांग्रेस की राजनीति अब मनमोहन सरकार की नीतियों को ही खुली चुनौती दे रही है, जिससे इन तमाम राज्यों में बहुसंख्य ग्रामीण-आदिवासियों को यह महसूस हो सके कि भाजपा की सत्ता हो या मनमोहन की इकनॉमिक्स, कांग्रेस यानी सोनिया-राहुल इससे इत्तेफाक नहीं रखते।
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सफलता की राह अपने ही भीतर है


Adhyatmआज सफलता की होड़ में लोग कहां-कहां भाग रहे हैं। जिसे जहां जगह मिल जाए वहीं प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। भौतिक सफलता की दौड़ हमें जब मंजिल पर पहुंचाती है तो साथ ही अशांति और कुछ छूट जाने का भाव भी दे जाती है। ये मानवीय कमजोरी है कि हम सफलता के मार्ग हमेशा बाहर की ओर ही खोजते हैं, सफलता के साथ शांति चाहिए तो इसका मार्ग आपके भीतर से होकर गुजरेगा।

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जन गण मन की धुन तैयार करने वाले रामसिंह का भी जन्म दिन है 15 अगस्त


रामसिंहआजादी के जश्न के साथ-साथ जन-गण मन धुन के रचियता कैप्टन राम सिंह ठाकुर के जन्मदिन को भी 15 अगस्त को धूमधाम से मनाया जा रहा है। उनके जन्मदिवस पर कौमी धुनें व संगीत को बजाने के अलावा श्रद्धांजलि स्वरूप फुटबाल प्रतियोगिता भी आयोजित करवाई जा रही है।

संगीत व कौमी धुनों से आजादी का अलख जगाकर अंग्रेजों को खदेड़ने वाले आजाद हिंद फौज के सिपाही व प्रख्यात संगीतकार राम सिंह ठाकुर का जन्म खनियारा में दिलीप सिंह ठाकुर के घर में एक फौजी परिवार में 15 अगस्त 1914 को हुआ। उनके नाना नत्थू राम ठाकुर से उन्हें शास्त्रीय संगीत सीखने की प्रेरणा मिली।
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