निगाहों के साये


जाँ निसार अख्तर एक बोहेमियन शायर थे। उन्होंने अपनी पोइट्री में क्लासिकल ब्यूटी और मार्डन सेंसब्लिटी का ऐसा संतुलन किया है कि शब्द खासे रागात्मक हो गए हैं। उन्होंने जो भी कहा खूबसूरती से कहा-
उजड़ी-उजड़ी सी हर एक आस लगे
जिन्दगी राम का वनवास लगे
तू कि बहती हुई नदिया के समान
तुझको देखूँ तो मुझे प्यास लगे

जाँ निसार अख्तर के बेशतर अश्आर लोगों की जबान पर थे और हैं भी। अदबी शायरी के अलावा उन्होंने फिल्मी शायरी भी बड़ी अच्छी की है जो अदबी लिहाज से निहायत कामयाब रहे।
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एक राजनीतिक ड्राफ्ट के मायने


कांग्रेस के पास पूंजीवादी राज्य नहीं है और आदिवासी-ग्रामीणों को लेकर जो प्रेम सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी दिखला रहे हंै, उसके पीछे खनिज संसाधनों से परिपूर्ण राज्यों की सत्ता पर काबिज होने का प्रयास है। कांग्रेस की रणनीति ओडीशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और कर्नाटक को लेकर है। चूंकि अब राज्यसत्ता का महत्व खनिज और उसके इर्द-गिर्द की जमीन पर कब्जा करना ही रह गया है, इसलिए कांग्रेस की राजनीति अब मनमोहन सरकार की नीतियों को ही खुली चुनौती दे रही है, जिससे इन तमाम राज्यों में बहुसंख्य ग्रामीण-आदिवासियों को यह महसूस हो सके कि भाजपा की सत्ता हो या मनमोहन की इकनॉमिक्स, कांग्रेस यानी सोनिया-राहुल इससे इत्तेफाक नहीं रखते।
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एंकर रिपोर्टर


जब कोई व्यक्ति टेलीफोन के परदे पर समाचार देख रहा होता है तो उसके जेहन में दो व्यक्ति अहम हो जाते हैं-एंकर और रिपोर्टर। एंकर टेलीवीजन के परदे पर पहले-पहल किसी खबर की सूचना देता है,उसके बारे में बताता है कि घटनाक्रम किस प्रकार घटित हुआ।। वास्तव में किसी महत्वपूर्ण खबर के दौरान दर्शकों के लिए यह मह्तवपूर्ण नहीं होता कि वे कौन-सा चैनल देख रहे हैं, वह महत्त्वपूर्ण खबर जिस भी चैनल पर आ रही होती है दर्शकों का रिमोट उसी पर ठहर जाता है। ऐसे में किसी भी समाचार चैनल के लिए एंकर और रिपोर्टर बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि दर्शकों को चैनल से जोड़ने का काम वही करते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि एंकर और रिपोर्टर हर परिस्थिति को सँभालने में माहिर हों।

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भारतीय संस्कृति


विश्व में अनेक संस्कृतियाँ पनपी और मिट गई। आज उनका कहीं नामोंनिशान तक नहीं है, सिर्फ उनकी स्मृति बाकी है, लेकिन भारतीय संस्कृति में है ऐसा कुछ कि वह कुछ नहीं मिटा। उसे मिटाने के बहुत प्रयास हुए और यह सिलसिला आज भी जारी है, पर कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी। भारतीय संस्कृति में आखिर क्या है, जो उसे हमेशा बचाए रखता है, जिसकी वजह से वह हजारों साल से विदेशी हमलावरों से लोहा लेती रही और इन दिनों इन पर जो हमले हो रहे हैं, उसका मुकाबला कर रही है ? आखिर कैसा है वह भारतीय संस्कृति का वह तंत्र, जिसे हमलावार संस्कृतियाँ छिन्न-भिन्न नहीं कर पातीं ? हर बार उन्हें लगता है कि इस बार वे इसे अवश्य पदाक्रांत कर लेंगी, पर हुआ हमेशा उलटा है, वे खुद ही पदाक्रांत होकर भारतीय संस्कृति में विलीन हो गईं, क्यों और कैसे ?

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