जब पाकिस्तान के 65 टैंक किए थे तबाह


सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सात से 11 सितंबर तक चली फिल्लौर की लड़ाई को आज भी सेना इतिहास में सबसे घातक जंग का दर्जा दिया जाता है। यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें भारतीय सेना ने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय उस समय के सबसे आधुनिक अमेरिका निर्मित पैटर्न टैंकों सहित पाकिस्तान की पूरी डिवीजन को तबाह कर दिया था।

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भारत का स्वाधीनता यज्ञ और हिन्दी काव्य


सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ का आरम्भ किया महर्षि दयानन्द सरस्वती ने और इस यज्ञ को पहली आहुति दी मंगल पांडे ने। देखते ही देखते यह यज्ञ चारों ओर फैल गया। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्यां टोपे और नाना राव जैसे योद्धाओं ने इस स्वतंत्रता के यज्ञ में अपने रक्त की आहुति दी। दूसरे चरण में ‘सरफरोशी की तमन्ना’ लिए रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव आदि देश के लिए शहीद हो गए। तिलक ने ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का उदघोष किया व सुभाष चन्द्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ का मँत्र दिया। अहिंसा और असहयोग का अस्त्र लेकर महात्मा गाँधी और गुलामी की बेड़ियां तोड़ने को तत्पर लौह पुरूष सरदार पटेल ने अपने प्रयास तेज कर दिए। 90 वर्षो की लम्बी संर्घष यात्रा के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता देवी का वरदान मिल सका।

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जन गण मन की धुन तैयार करने वाले रामसिंह का भी जन्म दिन है 15 अगस्त


रामसिंहआजादी के जश्न के साथ-साथ जन-गण मन धुन के रचियता कैप्टन राम सिंह ठाकुर के जन्मदिन को भी 15 अगस्त को धूमधाम से मनाया जा रहा है। उनके जन्मदिवस पर कौमी धुनें व संगीत को बजाने के अलावा श्रद्धांजलि स्वरूप फुटबाल प्रतियोगिता भी आयोजित करवाई जा रही है।

संगीत व कौमी धुनों से आजादी का अलख जगाकर अंग्रेजों को खदेड़ने वाले आजाद हिंद फौज के सिपाही व प्रख्यात संगीतकार राम सिंह ठाकुर का जन्म खनियारा में दिलीप सिंह ठाकुर के घर में एक फौजी परिवार में 15 अगस्त 1914 को हुआ। उनके नाना नत्थू राम ठाकुर से उन्हें शास्त्रीय संगीत सीखने की प्रेरणा मिली।
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गदर के 153 साल


इतिहास में सब कुछ सत्य नहीं होता। इतिहास में अधिकांशतः तथ्य होता है। पसंदीदा तथ्य को आधार मानकर अधिसंख्य इतिहासकार अपनी इच्छानुसार तर्क की मूरत गढ़ते हैं, और सच्चाई का आभास पाने के लिए अपनी-अपनी शैली में उस पर रंग-रोगन करते हैं। भारतीय इतिहास में 1857 के अध्याय के साथ ऐसा ही हुआ है। इसमें क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ—आदि प्रश्नों पर तो विवाद है ही, इसके नामकरण पर भी गहरा विवाद है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, विद्रोह, महाविद्रोह, गदर, सिपाही विद्रोह, क्रांति, महाक्रांति, सैन्य-क्रांति, महासंग्राम, विप्लव, महाविप्लव, क्रांतिकारी युद्ध, राष्ट्रीय युद्ध आदि अनेक नामों से इसे याद किया जाता है। इसकी सफलता को लेकर भी संदेह किया जाता है।
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पटेल,गाँधी, नेहरू एवं सुभाष


यह आम धारणा है कि सरदार पटेल कांग्रेस के तीन दिग्गजों-महात्मा गाँधी, पं. नेहरु और सुभाषचंद्र बोस के खिलाफ थे। किंतु यह मात्र दुष्प्रचार ही है। हाँ, कुछ मामलों में-खासकर सामरिक नीति के मामलों में-उनके बीच कुछ मतभेद जरुर थे, पर मनधेद नहीं होता था। परंतु जैसा कि इस पुस्तक में उद्घाटित किया गया है, सरदार पटेल ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिए जाने के प्रस्ताव पर गाँधीजी का विरोध नहीं किया था; यद्यपि वह समझ गए थे कि ऐसा करने की कीमत चुकानी पड़ेगी। इसी तरह उन्होंने प्रधानमंत्री के रुप में पं. नेहरु के प्रति भी उपयुक्त सम्मान प्रदर्शित किया। उन्होंने ही भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल में शामिल करने के लिए पं. नेहरु को तैयार किया था; यद्यपि नेहरु पूरी तरह इसके पक्ष में नहीं थे। जहाँ सुभाष चंद्र बोस के साथ उनके संबंधों की बात है, वे वरन् सन् 1939 में दूसरी बार सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने के खिलाफ थे। सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार सरदार पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल-जिनका विएना में निधन हो गया था, के अंतिम संस्कार में मदद की थी, उससे दोनों के मध्य आपसी प्रेम और सम्मान की भावना का पता चलता है।

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