कश्‍मीर: इस रात की सुबह है भी?


कश्‍मीर में शांति कैसे आए, इसका जवाब ढूंढने के लिए नई दिल्‍ली में सभी राजनीतिक दलों के नेता बैठे तो सही, लेकिन जवाब मिला नहीं। इससे पहले कैबिनेट की सुरक्षा समिति (सीसीएस) भी इस मामले में कोई निर्णय नहीं ले सकी थी। पर क्‍या यह सह नहीं है कि हल ढूंढने की यह ‘बेताबी’ अगर शुरुआत में ही दिखाई जाती तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।

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समानता किस चीज की? – अमर्त्य सेन


समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसी विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समान्ता किस चीज की होनी चाहिए।
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बहादुर सेना, कमजोर सरकार और बेबस लोग!


दिल्ली में क्या इससे कमजोर सरकार कभी आएगी ? कमजोर इसलिए क्योंकि इस सरकार के लिए देश के सम्मान, देश की जनता के जान-माल और हमारे सेना-सुरक्षा बलों की जान की कोई कीमत नहीं है। हो सकता है कि हालात इससे भी बुरे हों। किंतु अब यह कहने में कोई संकोच नहीं कि दिल्ली में इतनी बेचारी, लाचार और कमजोर सरकार आज तक नहीं आयी। थोपे गए नेतृत्व और स्वाभाविक नेतृत्व का अंतर भी इसी परिघटना में उजागर होता है। दिल्ली में एक ऐसे आदमी को देश की कमान दी गयी है जो आर्थिक मामलों पर जब बोलता है तो दुनिया सुनती है (बकौल बराक ओबामा)। किंतु उसके अपने देश में पिछले छः सालों से उसके राज में महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है किंतु वह आदमी अपने देश की महंगाई पर कुछ नहीं बोलता। परमाणु करार विधेयक पास कराने के लिए अपनी सरकार तक गिराने की हद तक जाने वाले हठी प्रधानमंत्री को इससे फर्क नहीं पड़ता कि उनकी सरकार के कार्यकाल में लोगों का जिंदगी बसर करना कितना मुश्किल है और कितने किसान उनके राज में आत्महत्या कर चुके हैं।
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गदर के 153 साल


इतिहास में सब कुछ सत्य नहीं होता। इतिहास में अधिकांशतः तथ्य होता है। पसंदीदा तथ्य को आधार मानकर अधिसंख्य इतिहासकार अपनी इच्छानुसार तर्क की मूरत गढ़ते हैं, और सच्चाई का आभास पाने के लिए अपनी-अपनी शैली में उस पर रंग-रोगन करते हैं। भारतीय इतिहास में 1857 के अध्याय के साथ ऐसा ही हुआ है। इसमें क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ—आदि प्रश्नों पर तो विवाद है ही, इसके नामकरण पर भी गहरा विवाद है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, विद्रोह, महाविद्रोह, गदर, सिपाही विद्रोह, क्रांति, महाक्रांति, सैन्य-क्रांति, महासंग्राम, विप्लव, महाविप्लव, क्रांतिकारी युद्ध, राष्ट्रीय युद्ध आदि अनेक नामों से इसे याद किया जाता है। इसकी सफलता को लेकर भी संदेह किया जाता है।
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