अगर इस देश के प्राणी इतने मूर्ख न होते तो मैं इन पर शासन कैसे कर पाता


बादशाह अकबर का दरबार लगा हुआ था, सारे दरबारी अपने अपने काम में व्यस्त थे कि अकबर ने बीरबल की तरफ देखते हुये कहा- बीरबल, कई दिनों से एक सवाल मुझे काफ़ी परेशान किये जा रहा है, शायद तुम्हारे पास इस सवाल का कोई जवाब हो?

बीरबल ने सर झुका कर कहा- हुज़ूर आप अपना सवाल पूछिये, मैं पूरी कोशिश करूँगा आपके सवाल का वाज़िब जवाब देने की।

अकबर ने कहा- बीरबल, मुझे ये मालूम करना है कि इस दुनिया में सबसे अधिक मूर्ख किस देश में रहते हैं?

बीरबल ने कुछ देर सोचा और कहा- हुज़ूर इस सवाल का जवाब ढूँढने के लिये मुझे संसार के सारे देशों में घूम घूम कर वहाँ के लोगों के बारे में जानकारी लेनी होगी, और यह यात्रा पूरी करने में मुझे कम से कम तीन साल तो लग ही जायेगा।

पढना जारी रखे

Advertisements

टेप जो कहते हैं


एक वक्त था जब संपादकों को देखा या सुना नहीं, केवल पढ़ा जाता था। इस ‘आइवरी टॉवर’ रवैये की बेहतरीन मिसाल 1960 के दशक के एक शीर्ष संपादक एनजे नानपोरिया थे। एक बार जब वह बाजार में खरीदारी कर रहे थे, उन्होंने पाया कि एक शख्स लगातार उन्हें देखकर मुस्करा रहा है। कौतूहलवश उन्होंने पूछा कि वह कौन है। उसने कहा, ‘मैं आपका चीफ रिपोर्टर हूं सर!’ मुमकिन है कि यह किंवदंती हो, लेकिन यह बताती है कि किस तरह गुजरे जमाने के संपादक कभी-कभार ही अपने केबिन से बाहर कदम रखते थे। आज के टेलीविजन युग में स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है, जहां संपादक-एंकर फौरन पहचान ली जाने वाली सेलेब्रिटी बन चुके हैं।

पढना जारी रखे

कश्‍मीर: इस रात की सुबह है भी?


कश्‍मीर में शांति कैसे आए, इसका जवाब ढूंढने के लिए नई दिल्‍ली में सभी राजनीतिक दलों के नेता बैठे तो सही, लेकिन जवाब मिला नहीं। इससे पहले कैबिनेट की सुरक्षा समिति (सीसीएस) भी इस मामले में कोई निर्णय नहीं ले सकी थी। पर क्‍या यह सह नहीं है कि हल ढूंढने की यह ‘बेताबी’ अगर शुरुआत में ही दिखाई जाती तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।

पढना जारी रखे

डॉ. फारुख सलीम का ख़त


हम भारतीय अपने नेताओं के बारे में चाहे जो सोचें और अपने लोकतंत्र को प्रदूषित और भ्रष्ट करने के लिए इनको कोसते रहें, शायद पाकिस्तान के लोग हमारी इन बातों से कतई इत्तफाक नहीं रखते। फौजी शासन के आंतक के साये में जी रहे पाकिस्तान के लोगों को इस बात पर शर्म महसूस होती है कि भारत ने पाकिस्तान को हर मामले में पीछे छोड़ दिया है और दुनिया में पाकिस्तान का कोई सम्मानजनक वजूद नहीं है। हमारे पाठक श्री अशोक मंगलानी ने हमें पाकिस्तान के एक जानेमाने पत्रकार डॉ. फारुख सलीम द्वारा एक पाकिस्तानी अख़बार में लिखा एक लेख भेजा है जिसमें उन्होंने इस बात को बेहद शोधपूर्ण तरीके से सामने रखा है कि आज़ादी के बाद भारत कहाँ से कहाँ पहुँच गया और पाकिस्तान अपनी पहचान तक नहीं बना पाया है।

पढना जारी रखे

टीवी न्यूज चैनल के लिए तत्काल चाहिए


शीघ्र ही शुरु होने जा रहे हिन्दी के एक न्यूज़ चैनल के लिए देश के गाँव-गाँव से लेकर शहरों के गली मोहल्ले तक टीवी रिपोर्टर यानी टीवी पर खबरें देने वाले संवाददाताओं की आवश्यकता है, जो अपने शहर या मोहल्ले में होने वाली घटनाओं की रिपोर्टिंग कर सके।

आवेदक के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है, कोई भी थोड़ा पढा-लिखा आवेदन दे सकता है। लेकिन आवेदक को शहर के अपारधियों से लेकर पुलिस वालों से अच्छे संबंध होना चाहिए, ताकि उसे अपराध जगत की खबरें आसानी से मिल सके। अगर आवेदक खुद ब्लैकमैलिंग, चोरी, लूट बलात्कार जैसे अपराध में जेल जा चुका है या किसी दुश्मन द्वारा फँसाया जा चुका है तो उसके आवेदन पर तत्काल विचार किया जाएगा।

पढना जारी रखे

समानता किस चीज की? – अमर्त्य सेन


समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसी विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समान्ता किस चीज की होनी चाहिए।
पढना जारी रखे

बहादुर सेना, कमजोर सरकार और बेबस लोग!


दिल्ली में क्या इससे कमजोर सरकार कभी आएगी ? कमजोर इसलिए क्योंकि इस सरकार के लिए देश के सम्मान, देश की जनता के जान-माल और हमारे सेना-सुरक्षा बलों की जान की कोई कीमत नहीं है। हो सकता है कि हालात इससे भी बुरे हों। किंतु अब यह कहने में कोई संकोच नहीं कि दिल्ली में इतनी बेचारी, लाचार और कमजोर सरकार आज तक नहीं आयी। थोपे गए नेतृत्व और स्वाभाविक नेतृत्व का अंतर भी इसी परिघटना में उजागर होता है। दिल्ली में एक ऐसे आदमी को देश की कमान दी गयी है जो आर्थिक मामलों पर जब बोलता है तो दुनिया सुनती है (बकौल बराक ओबामा)। किंतु उसके अपने देश में पिछले छः सालों से उसके राज में महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है किंतु वह आदमी अपने देश की महंगाई पर कुछ नहीं बोलता। परमाणु करार विधेयक पास कराने के लिए अपनी सरकार तक गिराने की हद तक जाने वाले हठी प्रधानमंत्री को इससे फर्क नहीं पड़ता कि उनकी सरकार के कार्यकाल में लोगों का जिंदगी बसर करना कितना मुश्किल है और कितने किसान उनके राज में आत्महत्या कर चुके हैं।
पढना जारी रखे

एंकर रिपोर्टर


जब कोई व्यक्ति टेलीफोन के परदे पर समाचार देख रहा होता है तो उसके जेहन में दो व्यक्ति अहम हो जाते हैं-एंकर और रिपोर्टर। एंकर टेलीवीजन के परदे पर पहले-पहल किसी खबर की सूचना देता है,उसके बारे में बताता है कि घटनाक्रम किस प्रकार घटित हुआ।। वास्तव में किसी महत्वपूर्ण खबर के दौरान दर्शकों के लिए यह मह्तवपूर्ण नहीं होता कि वे कौन-सा चैनल देख रहे हैं, वह महत्त्वपूर्ण खबर जिस भी चैनल पर आ रही होती है दर्शकों का रिमोट उसी पर ठहर जाता है। ऐसे में किसी भी समाचार चैनल के लिए एंकर और रिपोर्टर बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि दर्शकों को चैनल से जोड़ने का काम वही करते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि एंकर और रिपोर्टर हर परिस्थिति को सँभालने में माहिर हों।

पढना जारी रखे