गणेश शंकर ’विद्यार्थी‘ का अद्‌भुत ‘प्रताप’


साहित्य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्ति की ज्वाला क्रान्तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ’विद्यार्थी’ साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्तम्भ थे, जिनके अखबार ’प्रताप’ ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना।

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कश्‍मीर: इस रात की सुबह है भी?


कश्‍मीर में शांति कैसे आए, इसका जवाब ढूंढने के लिए नई दिल्‍ली में सभी राजनीतिक दलों के नेता बैठे तो सही, लेकिन जवाब मिला नहीं। इससे पहले कैबिनेट की सुरक्षा समिति (सीसीएस) भी इस मामले में कोई निर्णय नहीं ले सकी थी। पर क्‍या यह सह नहीं है कि हल ढूंढने की यह ‘बेताबी’ अगर शुरुआत में ही दिखाई जाती तो हालात यहां तक नहीं पहुंचते।

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एक राजनीतिक ड्राफ्ट के मायने


कांग्रेस के पास पूंजीवादी राज्य नहीं है और आदिवासी-ग्रामीणों को लेकर जो प्रेम सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी दिखला रहे हंै, उसके पीछे खनिज संसाधनों से परिपूर्ण राज्यों की सत्ता पर काबिज होने का प्रयास है। कांग्रेस की रणनीति ओडीशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और कर्नाटक को लेकर है। चूंकि अब राज्यसत्ता का महत्व खनिज और उसके इर्द-गिर्द की जमीन पर कब्जा करना ही रह गया है, इसलिए कांग्रेस की राजनीति अब मनमोहन सरकार की नीतियों को ही खुली चुनौती दे रही है, जिससे इन तमाम राज्यों में बहुसंख्य ग्रामीण-आदिवासियों को यह महसूस हो सके कि भाजपा की सत्ता हो या मनमोहन की इकनॉमिक्स, कांग्रेस यानी सोनिया-राहुल इससे इत्तेफाक नहीं रखते।
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सफलता की राह अपने ही भीतर है


Adhyatmआज सफलता की होड़ में लोग कहां-कहां भाग रहे हैं। जिसे जहां जगह मिल जाए वहीं प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। भौतिक सफलता की दौड़ हमें जब मंजिल पर पहुंचाती है तो साथ ही अशांति और कुछ छूट जाने का भाव भी दे जाती है। ये मानवीय कमजोरी है कि हम सफलता के मार्ग हमेशा बाहर की ओर ही खोजते हैं, सफलता के साथ शांति चाहिए तो इसका मार्ग आपके भीतर से होकर गुजरेगा।

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डॉ. फारुख सलीम का ख़त


हम भारतीय अपने नेताओं के बारे में चाहे जो सोचें और अपने लोकतंत्र को प्रदूषित और भ्रष्ट करने के लिए इनको कोसते रहें, शायद पाकिस्तान के लोग हमारी इन बातों से कतई इत्तफाक नहीं रखते। फौजी शासन के आंतक के साये में जी रहे पाकिस्तान के लोगों को इस बात पर शर्म महसूस होती है कि भारत ने पाकिस्तान को हर मामले में पीछे छोड़ दिया है और दुनिया में पाकिस्तान का कोई सम्मानजनक वजूद नहीं है। हमारे पाठक श्री अशोक मंगलानी ने हमें पाकिस्तान के एक जानेमाने पत्रकार डॉ. फारुख सलीम द्वारा एक पाकिस्तानी अख़बार में लिखा एक लेख भेजा है जिसमें उन्होंने इस बात को बेहद शोधपूर्ण तरीके से सामने रखा है कि आज़ादी के बाद भारत कहाँ से कहाँ पहुँच गया और पाकिस्तान अपनी पहचान तक नहीं बना पाया है।

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समानता किस चीज की? – अमर्त्य सेन


समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसी विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समान्ता किस चीज की होनी चाहिए।
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बहादुर सेना, कमजोर सरकार और बेबस लोग!


दिल्ली में क्या इससे कमजोर सरकार कभी आएगी ? कमजोर इसलिए क्योंकि इस सरकार के लिए देश के सम्मान, देश की जनता के जान-माल और हमारे सेना-सुरक्षा बलों की जान की कोई कीमत नहीं है। हो सकता है कि हालात इससे भी बुरे हों। किंतु अब यह कहने में कोई संकोच नहीं कि दिल्ली में इतनी बेचारी, लाचार और कमजोर सरकार आज तक नहीं आयी। थोपे गए नेतृत्व और स्वाभाविक नेतृत्व का अंतर भी इसी परिघटना में उजागर होता है। दिल्ली में एक ऐसे आदमी को देश की कमान दी गयी है जो आर्थिक मामलों पर जब बोलता है तो दुनिया सुनती है (बकौल बराक ओबामा)। किंतु उसके अपने देश में पिछले छः सालों से उसके राज में महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है किंतु वह आदमी अपने देश की महंगाई पर कुछ नहीं बोलता। परमाणु करार विधेयक पास कराने के लिए अपनी सरकार तक गिराने की हद तक जाने वाले हठी प्रधानमंत्री को इससे फर्क नहीं पड़ता कि उनकी सरकार के कार्यकाल में लोगों का जिंदगी बसर करना कितना मुश्किल है और कितने किसान उनके राज में आत्महत्या कर चुके हैं।
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भारतीय संस्कृति


विश्व में अनेक संस्कृतियाँ पनपी और मिट गई। आज उनका कहीं नामोंनिशान तक नहीं है, सिर्फ उनकी स्मृति बाकी है, लेकिन भारतीय संस्कृति में है ऐसा कुछ कि वह कुछ नहीं मिटा। उसे मिटाने के बहुत प्रयास हुए और यह सिलसिला आज भी जारी है, पर कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी। भारतीय संस्कृति में आखिर क्या है, जो उसे हमेशा बचाए रखता है, जिसकी वजह से वह हजारों साल से विदेशी हमलावरों से लोहा लेती रही और इन दिनों इन पर जो हमले हो रहे हैं, उसका मुकाबला कर रही है ? आखिर कैसा है वह भारतीय संस्कृति का वह तंत्र, जिसे हमलावार संस्कृतियाँ छिन्न-भिन्न नहीं कर पातीं ? हर बार उन्हें लगता है कि इस बार वे इसे अवश्य पदाक्रांत कर लेंगी, पर हुआ हमेशा उलटा है, वे खुद ही पदाक्रांत होकर भारतीय संस्कृति में विलीन हो गईं, क्यों और कैसे ?

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