स्त्री चिंतन परम्परा की प्रासंगिकता एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य


भारतीय संस्कृति अपनी विशिष्ट पहचान के कारण सदैव विश्व के लिए आदरणीय एवं वन्दनीय रही है। प्राचीन भारत की लोक कल्याणकारी भाईचारे और समन्वय की भावना ने विश्व को शान्ति, समता और अंहिसा का मार्ग दिखाया। विश्व में जगतगुरू के नाम से भारत की पहचान रही है। यहाँ के लोगों की अपनी एक अध्यात्मिक सोच रही है। कुटुम्बकम की भावना, जनमानस के लिए प्रेरणा की आदर्श रही है। इसके प्रमुख कारण यह हैं कि समाज सामाजिक सम्बन्धों का जटिल जाल होता है और इन सम्बन्धों का निर्माता स्वयं मनुष्य है। सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ही समाज में संगठन एवं व्यवस्था स्थापित करते हुए इसे प्रगति एवं गतिशीलता की दिशा में ले जाने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहा है। इसलिए पुरुष स्वःभावता अहंकारी हो गया और वह अपनी स्थिति सामाजिक परिवेश में सर्वोच्च स्तर में रखने को उत्सुक हो गया। यही मनोभाव पुरुष को वर्चस्ववाद की ओर ले गया। उसने यदि स्त्री को अधिक पढ़ी लिखी जागरूक, तर्कशील, बुद्धिमान पाया तो अपने को अन्दर ही अन्दर ख़तरा महसूस करने लगा। यही सर्वोच्चता के ख़तरे का डर एक झूठा अहंकारवाद का शिकार व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर पाया, क्योंकि पुरुष स्वभावतः अहंकारी है।
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