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शब्द से संसार की सृष्टि, स्थिति और लय भी है। शिव का तांडवनृत्य विशाल विश्व को अपने नृत्य की ध्वनि प्रतिध्वनियों से पदाघात के नाद से ही तो नष्ट करता है। यह संसार हम और हमारा यह जीवन शब्द ही तो हैं। शब्द ही हम हैं, वे ही हमारा अस्तित्व हैं।

हिन्दी भाषा को संसार भर में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं मे से एक होने का सम्मान प्राप्त है और यह विश्व के 56 करोड़ लोगों की भाषा है। आँकड़े बताते हैं कि भारत में 54 करोड़ तथा विश्व के अन्य देशों में 2 करोड़ लोग हिंदीभाषी हैं। विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का स्थान दूसरा है। हम सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है कि हिंदी भाषा अंतरजाल की प्रमुख भाषाओं में से एक बनने की पूर्ण योग्यता रखती है और निकट भविष्य में वह अपने लक्ष्य को पूर्ण करने में अवश्य ही सफलता प्राप्त कर लेगी। आइये! हिंदी के विकास में हम सभी अपना योगदान दें और इसे अन्तर्जाल की प्रमुख भाषाओं में से एक बनने में सफल बनायें।

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Introduction to Hindi Language

हिन्दी भाषा का उद्भव और उसका विकास

“हिन्दी” वस्तुत: फारसी भाषा का शब्द है,जिसका अर्थ है-हिन्दी का या हिंद से सम्बन्धित। (शब्द हिंदी नहीं शब्द हिंद फारसी का है) हिन्दी शब्द की निष्पत्ति सिन्धु -सिंध से हुई है क्योंकि ईरानी भाषा में “स” को “ह” बोला जाता है। इस प्रकार हिन्दी शब्द वास्तव में सिन्धु शब्द का प्रतिरूप है। कालांतर में हिंद शब्द सम्पूर्ण भारत का पर्याय बनकर उभरा । इसी “हिंद” से हिन्दी शब्द बना।

आज हम जिस भाषा को हिन्दी के रूप में जानते है,वह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है,जो साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। वैदिक भाषा में वेद,संहिता एवं उपनिषदों – वेदांत का सृजन हुआ है। वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी,जिसे लौकिक संस्कृत भी कहा जाता है। संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है। अनुमानत: ८ वी.शताब्दी ई.पू.में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था। संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थ रचे गये। वाल्मीकि ,व्यास,कालिदास,अश्वघोष,भारवी,माघ,भवभूति,विशाख,मम्मट,दंडी तथा श्रीहर्ष आदि संस्कृत की महान विभूतियाँ है। इसका साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है।

संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते ५०० ई.पू.के बाद तक काफ़ी बदल गई,जिसे “पालि” कहा गया। महात्मा बुद्ध के समय में पालि लोक भाषा थी और उन्होंने पालि के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया। संभवत: यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही। पहली ईसवी तक आते-आते पालि भाषा और परिवर्तित हुई,तब इसे “प्राकृत” की संज्ञा दी गई। इसका काल पहली ई.से ५०० ई.तक है। पालि की विभाषाओं के रूप में प्राकृत भाषायें- पश्चिमी,पूर्वी ,पश्चिमोत्तरी तथा मध्य देशी ,अब साहित्यिक भाषाओं के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी,जिन्हें मागधी,शौरसेनी,महाराष्ट्री,पैशाची,ब्राचड तथा अर्धमागधी भी कहा जा सकता है।

आगे चलकर,प्राकृत भाषाओं के क्षेत्रीय रूपों से अपभ्रंश भाषायें प्रतिष्ठित हुई। इनका समय ५०० ई.से १००० ई.तक माना जाता है। अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यत: दो रूप मिलते है – पश्चिमी और पूर्वी । अनुमानत: १००० ई.के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का जन्म हुआ। आधुनिक आर्य भाषाओं में,जिनमे हिन्दी भी है, का जन्म १००० ई.के आसपास ही हुआ था,किंतु उसमे साहित्य रचना का कार्य ११५० या इसके बाद प्रारम्भ हुआ। अनुमानत: तेरहवीं शताब्दी में हिन्दी भाषा में साहित्य रचना का कार्य प्रारम्भ हुआ,यही कारण है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी को ग्राम्य अपभ्रंशों का रूप मानते है। आधुनिक आर्यभाषाओं का जन्म अपभ्रंशों के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से इस प्रकार माना जा सकता है.

संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है। ऋग्वेद से पहले भी सम्भव है कोई भाषा विद्यमान रही हो परन्तु आज तक उसका कोई लिखित रूप नहीं प्राप्त हो पाया। इससे यह अनुमान होता है कि सम्भवतः आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा ऋग्वेद की ही भाषा, वैदिक संस्कृत ही थी। विद्वानों का मत है कि ऋग्वेद की भी एक काल अथवा एक स्थान पर रचना नहीं हुई। इसके कुछ मन्त्रों की रचना कन्धार में, कुछ की सिन्धु तट पर, कुछ की विपाशा-शतद्रु के संभेद (हरि के पत्तन) पर और कुछ मन्त्रों की यमुना गंगा के तट पर हुई। इस अनुमान का आधार यह है कि इन मन्त्रों में कहीं कन्धार के राजा दिवोदास का वर्णन है, तो कहीं सिन्धु नरेश सुदास का। इन दोनों राजाओं के शासन काल के बीच शताब्दियों का अन्तर है। इससे यह अनुमान होता है कि ऋग्वेद की रचना सैकड़ों वर्षों में जाकर पूर्ण हुई और बाद में इसे संहित-(संग्रह)-बद्ध किया गया।

ऋग्वेद के उपरान्त ब्राह्मण ग्रन्थों तथा सूत्र ग्रन्थों का सृजन हुआ और इनकी भाषा ऋग्वेद की भाषा से कई अंशों में भिन्न लौकिक या क्लासिकल संस्कृत है। सूत्र ग्रन्थों के रचना काल में भाषा का साहित्यिक रूप व्याकरण के नियमों में आबद्ध हो गया था। तब यह भाषा संस्कृत कहलायी। तब छन्दस् वेद तथा लोक-भाषा (लौकिक) में पर्याप्त अन्तर स्पष्ट रूप में प्रकट हुआ।

डॉ. धीरेन्द्र वर्मा का मत है कि पतञ्जलि (पाणिनि की व्याकरण अष्टाध्यायी के महाभाष्यकार) के समय में व्याकरण शास्त्र जानने वाले विद्वान् ही केवल शुद्ध संस्कृत बोलते थे, अन्य लोग अशुद्ध संस्कृत बोलते थे तथा साधारण लोग स्वाभाविक बोली बोलते थे, जो कालान्तर में प्राकृत कहलायी। डॉ. चन्द्रबली पांडेय का मत है कि भाषा के इन दोनों वर्गों का श्रेष्टतम उदाहरण वाल्मीकि रामायण में मिलता है, जबकि अशोक वाटिका में पवन पुत्र ने सीता से ‘द्विजी’ (संस्कृत) भाषा में बात न करके ‘मानुषी’ (प्राकृत) भाषा में बातचीत की। लेकिन डॉ. भोलानाथ तिवारी ने तत्कालीन भाषा को पश्चिमोत्तरी मध्य देशी तथा पूर्वी नाम से अभिहित किया है।

परन्तु डॉ. रामविलास शर्मा आदि कुछ विद्वान्, प्राकृत को जनसाधारण की लोक-भाषा न मानकर उसे एक कृत्रिम साहित्यिक भाषा स्वीकार करते हैं। उनका मत है कि प्राकृत ने संस्कृत शब्दों को हठात् विकृत करने का नियम हीन प्रयत्न किया। डॉ. श्यामसुन्दर दास का मत है-वेदकालीन कथित भाषा से ही संस्कृत उत्पन्न हुई और अनार्यों के सम्पर्क का सहारा पाकर अन्य प्रान्तीय बोलियाँ विकसित हुईं। संस्कृत ने केवल चुने हुए प्रचुर प्रयुक्त, व्यवस्थित, व्यापक शब्दों से ही अपना भण्डार भरा, पर औरों ने वैदिक भाषा की प्रकृति स्वच्छान्दता को भरपेट अपनाया। यही उनके प्राकृत कहलाने का कारण है।’’

व्याकरण के विधि निषेध नियमों से संस्कारित भाषा शीघ्र ही सभ्य समाज की श्रेष्ठ भाषा हो गई तथा यही क्रम कई शताब्दियों तक जारी रहा। यद्यपि महात्मा बुद्ध के समय संस्कृत की गति कुछ शिथिल पड़ गई, परन्तु गुप्तकाल में उसका विकास पुनः तीव्र वेग से हुआ। दीर्घकाल तक संस्कृत ही राष्ट्रीय भाषा के रूप में सम्मानित रही।

जनसाधारण अल्प शिक्षित वर्ग के लिए संस्कृत के नियमों का अनुसरण कठिन था, अतः वे लोकभाषा का ही प्रयोग करते थे। इसीलिए महावीर स्वामी ने जैन मत के तथा महात्मा बुद्ध ने बौद्ध मत के प्रसार के लिए लोकभाषा को ही अपनी वाणी का माध्यम बनाया। इससे लोकभाषा को ऐसी प्रतिष्ठा का पद प्राप्त हुआ, जो उससे पूर्व कभी प्राप्त नहीं हुआ था।

फिर भी संस्कृत भाषा का महत्त्व कभी कम नहीं हुआ। भास, कालिदास आदि के नाटकों में सुशिक्षित व्यक्ति तो संस्कृत बोलते हैं, परन्तु अशिक्षित पात्र —विट-चेट विदूषक तथा दास-दासियाँ आदि प्राकृत में बात करते हैं। परन्तु ये सब जिन प्रश्नों के उत्तर प्राकृत में देते हुए दिखाई गए हैं, उन प्रश्नों को संस्कृत में ही पूछा गया है। इससे स्पष्ट होता है। कि जनसाधारण भी संस्कृत को अच्छी तरह समझ लेते थे, भले ही बोलने में उन्हें कठिनाई प्रतीत होती हो। पंचतंत्र में विष्णु शर्मा ने संस्कृत भाषा में ही राजकुमारों को शिक्षा प्रदान की थी। डॉ. आर.के. मुकर्जी ने कहा है, ब्राह्मण काल एवं उसके पश्चात् भी निःसन्देह संस्कृत सामान्य जनता के धार्मिक कृत्यों पारिवारिक संस्कारों तथा शिक्षा एवं विज्ञान की भाषा थी।’’ सरदार के.एम. पणिक्कर ने कहा है संस्कृत विश्व की संस्कृति और सभ्यता की भाषा है जो भारत की सीमाओं के पार दूर-दूर तक फैली हुई थी।’’

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